आरक्षण में समाज (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Aug 21, 2025

राजनीति के बाग़ में चुनाव की बहार फिर से आई हुई थी। पार्टियों के अस्थायी चुनावी कार्यकर्ता रात को साथ में चियर्स करते हुए, लोकतंत्र की तारीफ़ करने में मस्त थे। बात होते होते आरक्षण पर पहुंचनी ही थी, पहुंची और पहुंचकर ठहर गई। एक बोला, आरक्षण ने बेड़ा गर्क कर दिया। दूसरा बोला हमारे भाईचारे को निगल लिया है। तीसरे ने कहा अब तो सिर्फ राजनीति है आरक्षण की नदियां तो हमेशा से देश में बह रही है।  

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उसी युग में अंग्रेज़ पधारे और सबसे सफल फार्मूले ‘डिवाइड एंड रूल’ के माध्यम से नाक में दम कर दिया, देश की धन दौलत, अमूल्य धरोहरें बटोर लीं और ‘ब्रिटिश रिज़र्व’ की स्थापना की। फिर आया हमारे अपने अंग्रेजों का युग, जिन्होंने जाति और धर्म आधारित राजनीतिक सांचा ईजाद किया जो अब सुविधा बन चुका है। उनका ‘रिज़र्वेशन वृक्ष’ अवसरानुसार उपजाऊ खाद और सिंचाई करने से ‘रिज़र्वेशन शूल वटवृक्ष’ बन गया है। कैसे, कैसे बना, एक बुद्धू ने पूछा. बताया, पत्नी, साली, बेटा, बेटी, भाई, बहन, चाचा भतीजा, दोस्त, चमचों को फायदे और पद भेंट किए। 

उन्होंने इस ‘राजनीतिक आरक्षण मेला’ में खूब घोटाले किए। हत्याएं करवाई, दिवालिया योजना, मूर्ति युग लाकर ज़िंदा को बुत बना दिया और बुतों की टहलसेवा की। लोकतंत्र को लोभतंत्र में तब्दील कर दिया। उन्होंने लाठी, बन्दूक, नोट और धर्म के बल पर ‘शक्ति आरक्षण योजना’  भी लांच की जो हिट रही। हमारे पालिसी निर्माताओं ने हिट अंग्रेज़ी शैली ‘डिवाइड एंड रूल’ पुन लांच करते हुए नए नियमों के अनुसार, जाति एंव धर्म के आधार पर सभी देशवासियों को बेहतर तरीके से बांट किया।  

अपने अग्रजों का ईमानदारी से अनुसरण करते हुए दूसरे नेताओं व अनेताओं ने भी देश की खूब सेवा की। गरीबों और अमीरों के बीच के बढ़ते फासले को हमेशा के आरक्षित कर यह साबित कर दिया कि देश के नायकों के पास सब कुछ करने का अधिकार है। राजनीतिज्ञों ने सखा नौकरशाहों से हाथ मिलाकर सामयिक सोच व उत्कृष्ट बुद्धिमत्ता के दम पर अनगिनत योजनाओं का धन अपनी कुर्सी के आकार के मुताबिक आरक्षित कर दिया। यह पैसा बिल्कुल वहीं पहुंचा जहां के लिए मंगाया गया था। ज़रा सी भी चूक नहीं हुई। इस कार्यक्रम में कर्मठ व समर्पित कार्यकर्ताओं ने बेहद सहयोगी व सक्रिय भूमिका निभाई। मेहनत से लबरेज़ इस कार्यक्रम को ‘पालिटिकल- ब्यूरोक्रेट- कांट्रेक्टर- कम्बाईन रिज़र्व’ कह सकते हैं।  

काफी देर से सुन रहे एक जागरूक कार्यकर्ता ने बताया कि उनकी पार्टी ने राजनीतिक आरक्षण परम्परा के अनुसार इस बार भी जाति, सम्प्रदाय और धर्म के आधार पर चुनावी टिकट बांटे हैं। इसे चुनाव में जीत सुनिश्चित करने की ‘आरक्षण नीति’ कहते हैं। सभी कार्यकर्ता संतुष्ट थे कि वे अलग अलग पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ता होते हुए भी, देश की स्थापित आरक्षण संस्कृति को मिलकर आगे बढ़ा रहे हैं।  

- संतोष उत्सुक

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