By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | May 12, 2022
श्रीलंका के प्रधानमंत्री महिंद्र राजपक्षे को मजबूरन इस्तीफा देना पड़ गया। उनके छोटे भाई गोटबाया राजपक्षे अभी भी श्रीलंका के राष्ट्रपति पद पर डटे हुए हैं। श्रीलंका में आम-जनता के बीच इतना भयंकर असंतोष फैल गया है कि इस राजपक्षे सरकार को कई बार कर्फ्यू लगाना पड़ गया है। इस राजपक्षे सरकार के मंत्रिमंडल में राजपक्षे-परिवार के लगभग आधा दर्जन सदस्य कुर्सी पर जमे हुए थे। जब आम जनता का गुस्सा बेकाबू हो गया तो मंत्रिमंडल को भंग कर दिया गया। लोगों के दिलों में यह प्रभाव जमाया गया कि राजपक्षे परिवार को कोई पद-लिप्सा नहीं है।
श्रीलंका के विपक्षी नेताओं की यह मांग ऊपरी तौर पर स्वाभाविक लगती है लेकिन समझ नहीं आता कि नए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की नियुक्ति क्या चुटकी बजाते ही हो जाएगी? उनका चुनाव होते-होते श्रीलंका की हालत और भी बदतर हो जाएगी। नये राष्ट्रपति और नई सरकार खाली हुए राजकोश को तुरंत कैसे भर सकेगी? श्रीलंका का विपक्ष भी एकजुट नहीं है। स्पष्ट बहुमत के अभाव में वह सरकार कैसे बनाएगा? वह सर्वशक्ति संपन्न राष्ट्रपति को कैसे बर्दाश्त करेगा?
यदि श्रीलंका का विपक्ष देशभक्त है तो उसका पहला लक्ष्य यह होना चाहिए कि वह महंगाई, बेरोजगारी और अराजकता पर काबू करे। गोटबाया सरकार जैसी भी है, फिलहाल उसके साथ सहयोग करके देश को चौपट होने से बचाए। भारत, चीन और अमेरिका जैसे देशों से प्रचुर सहायता का अनुरोध करे और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा-कोष से भी आपात राशि की मांग करे। अभी तो लोग दंगों और हमलों से मर रहे हैं लेकिन जब वे भुखमरी और बेरोजगारी से मरेंगे तो वे किसी भी नेता को नहीं बख्शेंगे, वह चाहे पक्ष का हो या विपक्ष का! श्रीलंका की वर्तमान दुर्दशा से पड़ोसी देशों को महत्वपूर्ण सबक भी मिल रहा है। तमिल आतंकवाद को खत्म करने वाले महानायक महिंद गोटबाया की प्रतिष्ठा अचानक यदि पैंदे में बैठ सकती है तो पड़ोसी देशों के जो नेता आज लोकप्रियता की लहर पर सवार हैं, उनकी हालत तो और भी बुरी हो सकती है। गोटबाया बंधुओं ने श्रीलंका सरकार को अपनी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बना लिया था। उसमें भाई-भतीजे मिलकर मनचाहे फैसले कर लेते थे। श्रीलंका के ज्यादातर पड़ोसी देशों का भी यही हाल है।
-डॉ. वेदप्रताप वैदिक