निहित स्वार्थों के लिए युवाओं को गुमराह करने के बयान

By योगेंद्र योगी | Dec 04, 2025

जमीयत उलमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना महमूद मदनी ने भोपाल में एक कार्यक्रम में कहा कि आज मुसलमान रास्ते पर अपने आप को असुरक्षित महसूस करते हैं। उन्हें कदम-कदम पर नफरतों का सामना करना पड़ता है। मदनी ने सुप्रीम कोर्ट के ऊपर भी सवाल उठाते हुए कहा कि किसी देश में लॉ एंड ऑर्डर और क्राइम-फ्री समाज बनाना इंसाफ के बिना नामुमकिन है। मौलाना ने कहा कि दुख की बात है कि पिछले कुछ सालों में खासकर बाबरी मस्जिद और ट्रिपल तलाक जैसे मामलों में फैसलों के बाद यह आम सोच बन गई है कि कोर्ट सरकारी दबाव में काम कर रहे हैं। राजनीतिक दल और मदनी जैसे मौलाना मुसलमानों में अपनी पैठ बनाने और खुद को उनका सबसे बड़ा हितेषी साबित करने में कहीं न कहीं मुस्लिम युवाओं को गुमराह कर रहे हैं। 


गौरतलब है कि दिल्ली के लाल किले के पास विस्फोट की जांच कर रहे जांचकर्ताओं ने खुलासा किया था कि जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े डॉक्टरों से जुड़े संदिग्ध आतंकी मॉड्यूल ने 6 दिसंबर को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में छह स्थानों पर विस्फोटों की योजना बनाई थी। यह वह दिन था जब 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया था। विस्फोट के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए संदिग्ध आतंकवादियों ने बताया था कि यह तारीख इसलिए चुनी गई क्योंकि वे बाबरी मस्जिद विध्वंस का बदला लेना चाहते थे। मौलाना मदनी का बयान ऐसे ही युवाओं को प्रेरित कर गुमराह करने वाला है। 

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सुप्रीम कोर्ट पर सवाल उठाने वाले मौलाना मदनी भूल गए कि अदालतों ने ही आतंक के आरोपों से ढेरों बेगुनाहों को बरी किया है। वर्ष 2006 में 12 लोगों को मुंबई बम धमाकों के संबंध में मकोका कोर्ट ने दोषी ठहराया था, लेकिन 18 साल बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। कोर्ट ने पाया कि पुलिस द्वारा पेश किए गए 44,500 पन्नों के दस्तावेज़ों में से कोई भी दोष सिद्ध नहीं कर सका। इसी तरह गुजरात में 2001 में 127 मुस्लिम नागरिकों को एक प्रतिबंधित संगठन से संबंध के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, जो 19 साल बाद बरी हुए थे। इसके अलावा ऐसे एकल मामलों की कमी नहीं है, जब अदालतों ने जांच एजेंसियों की कार्रवाई को अपर्याप्त मानते हुए आतंक के आरोपियों को बरी किया।


मुस्लिम हितों की बात करने वाले मौलाना मदनी भूल गए कि यह वही सुप्रीम कोर्ट है, जिसने केंद्र सरकार के वक्फ बोर्ड कानून को ज्यों का त्यों लागू करने पर रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के कुछ प्रावधानों पर रोक लगाई। विशेष रूप से कोर्ट ने वक्फ बनाने के लिए कम से कम 5 साल तक इस्लाम का अनुयायी होने की शर्त और विवादित संपत्तियों के तुरंत वक्फ माने जाने पर रोक लगा दी। यह फैसला याचिकाकर्ताओं के हितों की रक्षा करने और मामले में संतुलन बनाए रखने के लिए एक अंतरिम रोक है। देश की करोड़ों मुस्लिम महिलाओं को तलाक का कानूनी हक दिलाने वाले सुप्रीम कोर्ट को मौलाना मदनी भूल गए। मनमाने तरीके से तलाक की शिकार महिलाओं को उनका हक दिलाने की पहल किसी भी मौलवी—मौलाना ने कभी नहीं की।


अकेले मौलाना मदनी ही नहीं राजनीतिक फायदे के लिए राजनीतिक दलों के नेता भी मुसलमानों के भले के नाम पर घड़ियाली आंसू बहाते रहे हैं। पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती ने लाल किले के सामने हुई ब्लास्ट पर विवादित बयान दिया। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर का गुस्सा अब लाल किले पर दिख रहा है। महबूबा मुफ्ती ने कहा कि एक व्यक्ति के अपराध की सजा पूरे जम्मू-कश्मीर के लोगों को नहीं दी जा सकती। उन्होंने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से अपील की है कि वे इस गंभीर विषय पर प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से बात करें क्योंकि राज्य के बाहर रहने वाले कश्मीरी डरे हुए हैं। महबूबा का यह बयान कहीं न कहीं दिल्ली की वारदात को जायज ठहराने का प्रयास है। महबूबा सत्ता पाने के लिए पूर्व में भी ऐसे विवादित बयान देती रही हैं। महबूबा ने कहा था साल 2019 में धारा 370 हटाए जाने के बाद से जम्मू-कश्मीर में "डर और घुटन का माहौल" है। गिरफ्तारियां हो रही हैं और लोगों पर दबाव है


इससे पहले जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी ऐसा ही बयान दिया, जिससे कहीं न कहीं आतंकवादियों और उनके पनाहगारों के प्रति सहानुभूति छिपी हुई थी। मुख्यमंत्री अब्दुल्ला ने दिल्ली में आत्मघाती हमलावर के परिवार के घर को गिराए जाने पर सवाल उठाया था। उन्होंने कहा कि ऐसे कदम सिर्फ गुस्सा बढ़ाएंगे। उन्होंने कहा अगर आतंकवाद ऐसे कामों से रुक जाता, तो यह बहुत पहले ही खत्म हो गया होता। उन्होंने यह भी कहा कि जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद हाल ही में कम हुआ है, "किसी का घर उड़ाने की ज़रूरत के बिना"। सुरक्षा तीन नियंत्रित विस्फोट करके दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के कोइल गांव में डॉ. उमर उन नबी के दो मंजिला घर को ध्वस्त कर दिया था। 


गौरतलब है कि मुख्यमंत्री अब्दुल्ला ने गांदरबल जिले में गैर-स्थानीय मजदूरों पर हुए आतंकवादी हमले की निंदा में एक्स पर अपने पोस्ट में आतंकी शब्द का जिक्र नहीं किया। इसी तरह पीडीपी चीफ महबूबा मुफ्ती ने भी अपने पोस्ट में आतंकी शब्द से परहेज किया। इस आतंकी हमले में 7 की जान चली गई थी। विपक्षी दलों ने मुस्लिम आतंकी हो या गैंगस्टर, यही प्रयास किया है कि इनके साथ नरमी बरती जाए। जाहिर कारण है मुस्लिम वोट बैंक। विपक्षी दलों को लगता है कि इनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने से मुस्लिम वोट बैंक खिसक जाएगा। 


सत्ता में आने के बाद पंजाब की मान सरकार ने दावा किया था कि तत्कालीन पंजाब सरकार ने गैंगस्टर मुख्तार अंसारी को यूपी सरकार से बचाने के लिए 55 लाख रुपये से ज्यादा खर्च किए थे। मुख्तार को आरामतलब जिंदगी देने के लिए वो सारी व्यवस्थाएं की गई थीं जो कि एक हाईप्रोफाइल को मिलती हैं। इतना ही नहीं तत्कालीन पंजाब सरकार ने भरसक कोशिश की अंसारी को वापस उत्तर प्रदेश नहीं भेजा जाए। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया। कोर्ट के आदेश से अंसारी की वापसी उत्तर प्रदेश हो सकी। इन उदाहरणों से जाहिर है कि राजनीतिक दल वोट बैंक बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, चाहे उनकी हरकतों से युवा गुमराह ही क्यों न हो जाएं। आश्चर्य की बात यह है कि मदनी जैसे मौलाना हों या फिर राजनीतिक दल यह भूल गए कि ऐसी तमाम हरकतों को देश के मतदाता कई बार नकार चुके हैं।

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