By अभिनय आकाश | Oct 27, 2026
सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के 8 सितंबर के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया था कि वह अंतरराष्ट्रीय कला तस्करी के आरोपी सुभाष चंद्र कपूर को तिरुचिरापल्ली सेंट्रल जेल से अपनी कस्टडी में ले और उसे जर्मनी वापस भेजने के लिए कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करे। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी, जिसने कपूर द्वारा दायर 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका को स्वीकार कर लिया था। हाई कोर्ट ने माना था कि जर्मनी से प्रत्यर्पित किए जाने से पहले कथित तौर पर किए गए अन्य अपराधों के मामले में भारत में कपूर को हिरासत में रखना, जर्मन अधिकारियों की सहमति के बिना जारी नहीं रखा जा सकता। अमेरिकी नागरिक कपूर को 13 जुलाई 2012 को जर्मनी से भारत प्रत्यर्पित किया गया था। यह मामला तमिलनाडु के उदयारपालयम पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 457 और 380 के तहत दर्ज मूर्ति चोरी के एक मामले से जुड़ा था। यह मामला तमिलनाडु और दक्षिण भारत के अन्य क्षेत्रों के मंदिरों से मूर्तियां चुराए जाने से संबंधित है।
अदालत ने गौर किया कि जर्मनी ने मुकदमा चलाने के दायरे को बढ़ाने के प्रस्ताव को स्पष्ट रूप से ठुकरा दिया था। विदेश मंत्रालय ने उच्च न्यायालय को सूचित किया कि जर्मनी ने इस विस्तार के लिए सहमति नहीं दी है, और 'रूल ऑफ स्पेशलिटी' के सिद्धांत के तहत, भारत में आगे मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। बाद में जर्मनी ने एक अन्य राजनयिक नोट के जरिए भी अपना यही रुख दोहराया। उच्च न्यायालय ने यह भी ध्यान दिया कि तमिलनाडु के मुख्य सचिव ने अक्टूबर 2019 में जर्मन अधिकारियों को आश्वासन दिया था कि 'रूल ऑफ स्पेशलिटी' का उल्लंघन नहीं किया जाएगा और कपूर पर 2008 के 'क्राइम नंबर 65' के अलावा किसी अन्य अपराध के लिए मुकदमा नहीं चलाया जाएगा, जिसके लिए जर्मनी से मंजूरी ली गई थी। राज्य सरकार और अन्य पक्षों ने तर्क दिया कि कपूर के खिलाफ दर्ज अन्य मामले आपस में जुड़े हुए हैं और ये प्राचीन मंदिर की मूर्तियों की चोरी और तस्करी से जुड़ी एक बड़ी, निरंतर चल रही साजिश का हिस्सा हैं।
उन्होंने कपूर के खिलाफ लगे आरोपों की गंभीरता पर भी जोर दिया। हालांकि, हाई कोर्ट ने कहा कि आरोपों की गंभीरता, संधि और प्रत्यर्पण अधिनियम (Extradition Act) के तहत जरूरी सहमति की जगह नहीं ले सकती। हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि जर्मनी की सहमति पाने के लिए लंबित अनुरोध को खुद 'सहमति' नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि कपूर को हिरासत में रखने के लिए वर्तमान में कोई कानूनी आधार होना चाहिए; यह इस संभावना पर आधारित नहीं हो सकता कि भविष्य में सहमति मिल जाएगी। इसके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि कपूर को हिरासत में रखना "कानूनी अधिकार के बिना" था और उसकी 'हेबियस कॉर्पस' (habeas corpus) याचिका को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह दो सप्ताह के भीतर त्रिची की सेंट्रल जेल से कपूर को अपनी कस्टडी में ले और उसे जर्मनी वापस भेजने के लिए "कानून के अनुसार कार्रवाई करे।