By अभिनय आकाश | Sep 22, 2026
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 में 2018 के संशोधन को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी। इस संशोधन ने कानून के तहत मामलों में गिरफ्तारी और अग्रिम ज़मानत से जुड़े कड़े प्रावधानों को फिर से लागू किया था। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी मोहना की बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के अपने फैसले में इस संशोधन को पहले ही सही ठहराया था, जिसमें इस कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए सुरक्षा उपाय भी बताए गए थे। याचिकाकर्ता बृजभूषण सैनी की ओर से पेश वकील हरि शंकर जैन ने बेंच से 2020 के फैसले पर फिर से विचार करने का आग्रह किया। उन्होंने तर्क दिया कि कानून की धारा 18A भेदभावपूर्ण है और इसका दुरुपयोग हो सकता है; यह धारा अग्रिम ज़मानत पर रोक लगाती है और FIR दर्ज करने से पहले शुरुआती जांच और गिरफ्तारी से पहले मंज़ूरी लेने की ज़रूरत को खत्म करती है।
याचिका में खास तौर पर धारा 18A को चुनौती दी गई है। इसे 2018 के संशोधन के ज़रिए जोड़ा गया था और इसमें प्रावधान है कि एक्ट के तहत FIR दर्ज करने के लिए किसी शुरुआती जांच की ज़रूरत नहीं है और गिरफ्तारी के लिए भी किसी पूर्व मंज़ूरी की आवश्यकता नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने 'सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में झूठे मामलों में फंसाए जाने के खिलाफ सुरक्षा उपाय तय किए गए थे। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि बाद में किए गए कानूनी संशोधन ने उन सुरक्षा उपायों को कमज़ोर कर दिया।