Yes Milord |सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, देश की सभी लड़कियों पर होगा असर

By अभिनय आकाश | Jan 31, 2026

पीरियड्स को लेकर समाज की सोच बदली है लेकिन आज भी इसके बारे में खुलकर बात नहीं की जाती। स्कूलों में आज भी छात्राओं को झिझक और भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इस दौरान आपको बता दें कि कई बार ऐसा होता है कि पीरियड्स के दौरान छात्राओं को क्लास तक छोड़नी पड़ती है। छात्राओं की इसी पीड़ा को समझते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने छात्राओं की गरिमा और स्वच्छता को ध्यान में रखते हुए सभी स्कूलों को बड़ा आदेश जारी किया। सभी सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में आप छात्राओं को फ्री में बायोडिग्रेडेबल सेंट्री पैड्स दिए जाएंगे। अगर प्राइवेट स्कूल ऐसा नहीं करते हैं तो उनकी मान्यता तक रद्द कर दी जाएगी।

फ्री में सैनिटरी पैड बांटना अनिवार्य

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि देश के सभी प्राइवेट और सरकारी स्कूलों में लड़कियों को फ्री में सैनिटरी पैड बांटना अनिवार्य होगा। लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग वॉशरूम बनाने होंगे। जो स्कूल ऐसा नहीं कर पाएंगे, उनकी मान्यता रद्द की जाएगी। कोर्ट ने अपने फैसले में मासिक धर्म स्वास्थ्य को जीवन का अधिकार घोषित किया और कहा, पीरियड एक सेंटेंस (वाक्य) को खत्म करे तो ठीक है, लेकिन लड़कियों की एजुकेशन को नहीं। जस्टिस जेबी पारदीवाला की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता तक पहुंच न होना, न सिर्फ गरिमा और निजता के अधिकार को छीनता है, बल्कि इस वजह से लड़कियां स्कूल छोड़ने या बार-बार अनुपस्थित रहने को मजबूर होती हैं।

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बच्चियों ने स्कूल ही छोड़ दिए

अदालत ने कहा कि मेस्टरुअल हेल्थ के अधिकार को जीवन का अधिकार घोषित करने वाला फैसला सिर्फ विधि व्यवस्था के हितधारकों के लिए नहीं है। यह उन क्लासेज के लिए भी है जहां लड़किया मदद मांगने में झिझकती है। यह उन टीचरों के लिए है जो सहायता करना चाहते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी से विवश है। यह उन पैरंट्स के लिए है जो अपनी चुप्पी के प्रभाव को नहीं समझते, और उस समाज के लिए है जो अपनी प्रगति को इस बात से मापे कि वह सबसे अधिक असुरक्षित लोगों की रक्षा कैसे करता है। हम हर उस बच्ची से बात करना चाहते है जो सिर्फ इसलिए स्कूल से अनुपस्थित हो गई क्योंकि उसके शरीर को बोझ समझा गया, जबकि इसमें उसकी कोई गलती नहीं थी।

समान अधिकार 

पिछले साल नवंबर में हरियाणा की एक यूनिवर्सिटी में 3 महिला सफाई कर्मियों से पीरियड्स के सबूत के तौर पर सैनिटरी पैड्स की तस्वीरें मांगी गई थीं। वहीं से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और जरूरी है कि अब बहस केवल स्कूलों तक सीमित न रहे। पीरियड्स को लेकर असहजता महिलाओं की प्रगति में हर कदम आड़े आती है। कई बार इस वजह से उन्हें आगे बढ़ने के समान मौके भी नहीं मिल पाते। हालांकि कुछ राज्यों में मेंस्ट्रुअल लीव का प्रावधान है।। मासिक धर्म कोई बीमारी नहीं, सहज जैविक प्रक्रिया है। इसके बावजूद इसे शर्म, संदेह और अपमान से जोड़ा जाता है। एक लड़की से उम्मीद की जाती है कि वह पीरियड्स के दर्द को बताए नहीं, सहन करे। ऐसी परंपराएं आज भी जीवित हैं, जहां मासिक धर्म से गुजर रही महिला को अलग-थलग रहना पड़ता है। सदियों से यह बात बैठा दी गई है कि उन्हें पीरियड्स पर बात नहीं करनी। सुप्रीम कोर्ट ने मेंस्ट्रुअल हाइजीन को संवैधानिक अधिकार बताकर इसी संकोच को तोड़ने की कोशिश की है। जब छात्राएं स्कूलों में बिना झिझक के सैनिटरी नैपकिन मांग सकेंगी, तो परिवर्तन समाज में भी दिखेगा।

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