Half Encounter Cases को लेकर Allahabad High Court ने UP Police को लगाई जबरदस्त फटकार, कहा- ''दंड अदालत देगी, पुलिस नहीं''

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में पुलिस की कार्यप्रणाली पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि कई मामलों में पुलिस अधिकारी बिना किसी वास्तविक आवश्यकता के आग्नेयास्त्र का प्रयोग करते हैं और अभियुक्त के घुटने के नीचे गोली मार कर उसे अपाहिज बना देते हैं।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले से उत्तर प्रदेश पुलिस के पूरे तंत्र को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है। वैसे यह आदेश केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश की पुलिस व्यवस्था के लिए चेतावनी वाली घंटी है। न्यायमूर्ति अरुण कुमार देशवाल की एकल पीठ ने पुलिस मुठभेड़ में अभियुक्त को गंभीर चोट पहुंचने के मामलों में छह सूत्रीय सख्त दिशा निर्देश जारी करते हुए साफ कर दिया कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय दिशा-निर्देशों का उल्लंघन हुआ तो जिला पुलिस प्रमुखों पर अवमानना की सीधी तलवार लटकेगी।
यह फैसला उस समय आया है जब उत्तर प्रदेश में तथाकथित आधी मुठभेड़ यानि हॉफ एनकाउंटर का चलन पुलिस की पहचान बनता जा रहा था। न्यायालय ने दो टूक शब्दों में कहा कि प्रशंसा, पदोन्नति या सामाजिक माध्यम पर वाहवाही के लालच में किसी भी पुलिस अधिकारी को न्यायपालिका की भूमिका निभाने की छूट नहीं दी जा सकती।
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हम आपको बता दें कि न्यायालय ने अपने आदेश में पुलिस की कार्यप्रणाली पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि कई मामलों में पुलिस अधिकारी बिना किसी वास्तविक आवश्यकता के आग्नेयास्त्र का प्रयोग करते हैं और अभियुक्त के घुटने के नीचे गोली मार कर उसे अपाहिज बना देते हैं। इसे आम बोलचाल में आधी मुठभेड़ कहा जाता है। यह न तो कानून है और न ही न्याय। यह सीधा सीधा सत्ता का दुरुपयोग है। न्यायालय ने यह भी नोट किया कि अनेक मामलों में पुलिस दल का कोई भी सदस्य घायल नहीं होता, जिससे यह सवाल उठता है कि गोली चलाने की आवश्यकता और अनुपातिकता आखिर थी ही क्यों?
हम आपको बता दें कि यह आदेश सर्वोच्च न्यायालय के उस ऐतिहासिक फैसले की पृष्ठभूमि में आया है, जो पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में दिया गया था। उस फैसले में मुठभेड़ की स्वतंत्र, निष्पक्ष और प्रभावी जांच के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश तय किए गए थे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अब पुलिस के लिए स्पष्ट रास्ता तय कर दिया है। यदि किसी सूचना के आधार पर पुलिस मौके पर पहुंचती है और मुठभेड़ होती है, जिसमें पुलिस की गोली से अभियुक्त या कोई अन्य व्यक्ति गंभीर रूप से घायल होता है, तो उसी थाने या पास के थाने में प्राथमिकी दर्ज करना अनिवार्य होगा। यह प्राथमिकी उसी पुलिस दल के प्रमुख द्वारा दर्ज की जाएगी। लेकिन जांच उसी दल द्वारा नहीं होगी। जांच सीबीसीआईडी या किसी अन्य थाने की पुलिस टीम करेगी, जिसकी निगरानी उस अधिकारी के हाथ में होगी जो मुठभेड़ में शामिल दल के प्रमुख से कम से कम एक रैंक ऊपर हो। साथ ही प्राथमिकी में किसी पुलिसकर्मी का नाम अभियुक्त के रूप में लिखना जरूरी नहीं होगा, केवल यह उल्लेख होगा कि दल एसटीएफ का था या नियमित पुलिस का।
इसके अलावा, घायल अभियुक्त को तत्काल चिकित्सा सहायता देना अनिवार्य होगा। चिकित्सक की ओर से फिटनेस प्रमाणित करने के बाद अभियुक्त का बयान मजिस्ट्रेट या चिकित्सक द्वारा दर्ज किया जाएगा। पूरी जांच के बाद रिपोर्ट सक्षम न्यायालय को भेजी जाएगी, जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय प्रक्रिया के अनुसार आगे की कार्यवाही करेगा। न्यायालय ने यह भी साफ कर दिया कि मुठभेड़ के तुरंत बाद किसी भी पुलिस अधिकारी को विशेष पदोन्नति या वीरता पुरस्कार नहीं दिया जाएगा। ऐसे किसी भी सम्मान पर तभी विचार होगा जब एक स्वतंत्र समिति यह सिद्ध कर दे कि वास्तविक वीरता बिना किसी संदेह के साबित हुई है।
साथ ही यदि घायल व्यक्ति का परिवार यह पाता है कि जांच निष्पक्ष नहीं है या प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, तो वह संबंधित क्षेत्र के सत्र न्यायाधीश के समक्ष शिकायत कर सकता है। सत्र न्यायाधीश शिकायत की गंभीरता देखते हुए राहत देगा और जरूरत पड़ने पर मामला उच्च न्यायालय को भेज सकता है। न्यायालय ने यह भी प्रावधान किया है कि मुठभेड़ में मृत्यु या गंभीर चोट के मामले में यदि पुलिस की निष्क्रियता सामने आती है, तो पीड़ित पक्ष न्यायाधीश के समक्ष आवेदन कर सकता है। गंभीर उल्लंघन की स्थिति में जिला पुलिस प्रमुख के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की जा सकती है।
देखा जाये तो उच्च न्यायालय ने साफ संदेश दिया है कि मुठभेड़ न्याय का विकल्प नहीं है। पुलिस यदि न्यायाधीश बन बैठी तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ जाएगा। यह आदेश पुलिस को उसकी असली भूमिका याद दिलाता है।
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