आवारा कुत्तों की भयावह समस्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला- लेकिन जिम्मेदारी तय किए बिना कैसे बनेगी बात?

By संतोष कुमार पाठक | May 20, 2026

देश की सर्वोच्च अदालत ने आवारा कुत्तों की नसबंदी और दूसरी जगह भेजने के अपने पहले के आदेश को वापस लेने के लिए दायर की गई सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने डॉग लवर्स की याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि यह अदालत देश भर में कुत्ता काटने की घटनाओं की अनदेखी नहीं कर सकती है। इसका सबसे ज्यादा शिकार बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सख्त शब्दों में अपने पहले के आदेश की फिर से याद दिलाते हुए कहा कि सड़क के कुत्तों पर 7 नवंबर, 2025 को दिया गया उनका आदेश ही लागू होगा। इन आदेशों को लागू करने वाले अधिकारियों को कानूनी सुरक्षा दी जाए और जो अधिकारी इनका पालन न करे, उन पर विभागीय और अवमानना की कार्यवाही की जा सकती है। 

लेकिन क्या इससे देश के आम नागरिकों को खुश होना चाहिए? क्या इससे देश में आवारा कुत्तों से परेशान लोगों - खासकर बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को राहत मिल पाएगी? यह इतना भी आसान नहीं है। जब तक किसी खास अधिकारी की जिम्मेदारी तय नहीं की जाएगी तब तक इस समस्या का निदान नहीं हो सकता है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद व्यवहारिक स्थिति तो यही है कि ज्यादातर राज्य सरकारें और जिला प्रशासन इसे गंभीरता से लेती नज़र नहीं आ रही है। इसलिए इस आदेश को लागू करने के लिए हर जिले में जिलाधिकारी यानी सीधे DM को ही जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के नवंबर में दिए गए आदेश के 6 महीने बीत जाने के बावजूद हालत यह है कि देश की राजधानी दिल्ली का नगर निगम - MCD कुत्तों को रखने के लिए एक डॉग सेंटर तक तैयार नहीं कर पाई है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की सरकार ने यह आदेश जारी कर दिया है कि जो कुत्ता एक से अधिक बार लोगों को काट चुका हो, उसे सार्वजनिक स्थानों पर नहीं छोड़ा जाएगा लेकिन दिल्ली से सटे गाजियाबाद समेत राज्य के कई जिलों में भी अभी भी जरूरी डॉग सेंटर का निर्माण फाइल्स में ही अटका पड़ा है। क्या इस तरह की लापरवाही और लेट-लतीफी के लिए जिलों के DM को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए?

इसे भी पढ़ें: Stray Dogs पर Supreme Court के आदेश से भड़कीं Maneka Gandhi, कहा- कोर्ट ने जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा

समय आ गया है कि हर जिले, हर राज्य और सबसे ऊपर सीधे सुप्रीम कोर्ट को अपनी निगरानी में एक टोल फ्री नंबर जारी करना चाहिए जिस पर कॉल करने वाले हर व्यक्ति को तुरंत उनकी शिकायत का एक नंबर भी अलॉट कर देना चाहिए। अगर सुप्रीम कोर्ट चाहे तो टोल फ्री नंबर पर बैठने वाले अदालत के स्टॉफ का खर्चा भी लोगों से ले सकता है और इसके लिए प्रति कॉल 3 से 5 रुपए की राशि भी फिक्स की जा सकती है लेकिन हर कॉल का उचित फॉलोअप सुनिश्चित करना बहुत जरूरी है। इस काम को युद्धस्तर पर करने की जरूरत है क्योंकि भारत में आवारा कुत्तों के काटने की समस्या दिन-प्रतिदिन भयावह होती जा रही है। वैसे तो देश में कुत्तों द्वारा काटने के सारे आंकड़े दर्ज नहीं करवाए जाते हैं लेकिन जो भी आंकड़े दर्ज होते हैं, उसके मुताबिक वर्ष 2024 में हर मिनट पर डॉग बाइट के 7, हर घंटे में 430, रोजाना 10,321 , हर महीने 3,09,643 और वर्ष भर में 37,15,713  मामले दर्ज किए गए हैं। यानी सरकार भी यह मान रही है कि एक साल में 37 लाख से भी ज्यादा लोग कुत्तों के काटने का शिकार बनते हैं। वहीं वर्ष 2025 में कुत्तों के काटने की संख्या 47 लाख से भी ज्यादा बताई जा रही है। 

सरकारी रिपोर्ट की माने तो, भारत में हर साल रेबीज के कारण 300 लोगों की मौत होती है। लेकिन WHO के अनुसार भारत में हर साल रेबीज के कारण 18 से 20 हज़ार लोगों की मौत हो जाती है। यहां इस बात का ध्यान रखना भी जरूरी है कि इस तरह के ज्यादातर मामले आंकड़ों में दर्ज ही नहीं किए जाते हैं। वर्ष 2019 में हुई पशु जनगणना में, देश में आवारा कुत्तों की संख्या 1.53 करोड़ बताई गई थी। लेकिन एक मोटे अनुमान के तौर पर यह माना जाता है कि देश में वर्तमान में आवारा कुत्तों की संख्या 6 से 7 करोड़ के लगभग हो गई है।

यह समस्या हर गुजरते दिन के साथ भयावह होती जा रही है। मोहल्लों, कॉलोनियों, सोसायटियों यहां तक कि पार्कों में भी इन आवारा कुत्तों ने कब्जा जमा रखा है। लगभग हर मोहल्ले/कॉलोनी और सोसायटी में आपको ऐसे लोग मिल जाएंगे जो इन्हें अपने घर ले जाकर खाना नहीं खिलाएंगे, बल्कि उनकी जिद होगी कि वो इन्हें बाहर ही खाना खिलाएंगे। रही-सही कसर देश के टीवी चैनलों पर आने वाले तथाकथित ज्योतिषियों ने पूरी कर दी है, जो खास रंग के कुत्तों को खाना खिलाने पर किस्मत बदल जाने यानी अच्छे दिन आने का सपना दिखाकर इस समस्या को और ज्यादा भयावह बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। 

सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों,अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों जैसे सार्वजनिक स्थानों को आवारा कुत्तों से मुक्त करने की बात को दोहराते हुए पहली बार रेबीज से संक्रमित, लाइलाज बीमारी से ग्रस्त या खतरनाक आवारा कुत्तों की इच्छामृत्यु की भी अनुमति दे दी है। मानव जीवन पर बढ़ते खतरे पर चिंता जाहिर करते हुए अदालत ने कहा कि जिन इलाकों में आवारा कुत्तों की संख्या खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है और जहां बार-बार काटने या हमले  की घटनाएं हो रही है वहां स्थानीय प्रशासन इच्छामृत्यु का सहारा ले सकती है। 

जब देश के करोड़ों लोगों- खासकर बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं का दिन कुत्तों के डर से शुरू होता है , तब देश की सर्वोच्च अदालत का सामने आकर सख्त फैसला देना थोड़ा सकून तो देता है। लेकिन ग्राउंड ज़ीरो पर इस फैसले को लागू करने के लिए जब तक किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा तब तक इस भयावह समस्या का अंत होने की कोई उम्मीद दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती है। लेकिन क्या ऐसे माहौल में डॉग लवर्स/ पशु प्रेमियों को भी अपनी जिम्मेदारी नहीं समझनी चाहिए क्योंकि बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग तो उनके परिवार में भी होंगे ही।

- संतोष कुमार पाठक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं

प्रमुख खबरें

Farrukhabad पुलिस अधिकारी पर FIR का Allahabad High Court ने दिया आदेश

Rahul Gandhi की दिल्ली रैली में न पहुंचने पर MP Youth Congress के 60 पदाधिकारी निलंबित

संविधान निरंतर जिम्मेदारी, इसके आदर्शों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना कर्तव्य: CJI Surya Kant

Illinois में चुनाव जीतीं Saba Haider बोलीं, गाजियाबाद में मिले संस्कारों से मिली जनसेवा की सीख