Jan Gan Man: Ankit Sharma के हत्यारे Tahir Hussain का बचाव करने वाले नेता कब न्याय के कठघरे में आएंगे?

By नीरज कुमार दुबे | Jul 14, 2026

छह वर्ष से अधिक समय तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद आखिरकार दिल्ली की अदालत ने गुप्तचर ब्यूरो के अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को दोषी ठहरा दिया। अदालत ने ताहिर हुसैन के साथ नाजिम, कासिम, जावेद और अनस को भी दोषी माना, जबकि साक्ष्य के अभाव में छह अन्य आरोपियों को बरी कर दिया। ताहिर हुसैन को हत्या, विभिन्न समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने, दंगा करने और आपराधिक बल प्रयोग जैसे अपराधों में दोषी ठहराया गया। हालांकि उसके विरुद्ध आपराधिक साजिश का आरोप सिद्ध नहीं हो सका। अदालत का फैसला सुनाए जाने के बाद ताहिर हुसैन अदालत कक्ष में रो पड़ा, लेकिन यह आंसू उस परिवार का दर्द नहीं मिटा सकते जिसने अपने बेटे को बेहद निर्मम तरीके से खो दिया।

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इस मामले में कुल ग्यारह लोगों के खिलाफ मुकदमा चला। मार्च 2023 में अदालत ने सभी आरोपियों पर दंगा, घातक हथियारों के साथ दंगा, विभिन्न समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने, हत्या, आपराधिक साजिश और अन्य गंभीर धाराओं के तहत आरोप तय किए थे। ताहिर हुसैन पर सार्वजनिक अशांति फैलाने और अपराध के लिए उकसाने से जुड़े अतिरिक्त आरोप भी लगाए गए थे। अब अदालत ने पांच लोगों को दोषी ठहराया है, जबकि छह आरोपियों को पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण बरी कर दिया।

इस फैसले के बाद दिल्ली दंगों की जांच की निगरानी करने वाले तत्कालीन विशेष पुलिस आयुक्त सतीश गोलचा ने कहा कि अदालत का निर्णय पुलिस जांच की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर मुहर है। उन्होंने कहा कि दंगों के दौरान पुलिस का पहला दायित्व कानून व्यवस्था बनाए रखना था और साथ ही निष्पक्ष तथा साक्ष्य आधारित जांच करना भी था। उन्होंने कहा कि जांच दल ने जो मेहनत की थी, वह न्यायिक जांच की कसौटी पर खरी उतरी और दंगों के सभी दोषियों को कानून के दायरे में लाने की प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी।

हम आपको याद दिला दें कि अंकित शर्मा की हत्या उत्तर पूर्वी दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा के बीच हुई थी। पत्थरबाजी, आगजनी और तोड़फोड़ से भड़की इस हिंसा में 53 लोगों की जान गई थी और अनेक लोग घायल हुए थे। ऐसे में अंकित शर्मा हत्याकांड पूरे दंगा प्रकरण का सबसे चर्चित और संवेदनशील मामला बन गया था। अब अदालत का यह फैसला उन सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक निष्कर्षों में शामिल हो गया है, जिनका संबंध दिल्ली दंगों से है। सजा की अवधि पर फैसला अभी अलग से सुनाया जाना बाकी है।

लेकिन इस फैसले ने केवल ताहिर हुसैन को कठघरे में नहीं खड़ा किया है। इसने उन नेताओं की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिन्होंने वर्षों तक ताहिर हुसैन का प्रत्यक्ष या परोक्ष बचाव किया। जब हत्या जैसा गंभीर मामला सामने था, तब आम आदमी पार्टी के अनेक नेताओं ने राजनीतिक ढाल खड़ी करने की कोशिश की। आज अदालत के फैसले के बाद वे सारे तर्क बिखरते दिखाई दे रहे हैं।

फैसले के बाद भारतीय जनता पार्टी ने आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल पर तीखा हमला बोला। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा कि ताहिर हुसैन उस समय आम आदमी पार्टी का निर्वाचित पार्षद था और अरविंद केजरीवाल का बेहद करीबी माना जाता था। उन्होंने आरोप लगाया है कि ताहिर हुसैन को राजनीतिक संरक्षण दिया गया और दिल्ली दंगों के दौरान उसे बचाने की कोशिश की गई। भाटिया ने यह भी आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री रहते हुए अरविंद केजरीवाल ने न तो अंकित शर्मा के लिए संवेदना व्यक्त की और न ही दंगों में मारे गए अन्य नागरिकों के लिए कोई स्पष्ट आवाज उठाई।

गौरव भाटिया ने आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान के उस बयान पर भी सवाल उठाया, जिसमें अदालत द्वारा दी गई सजा को दुर्भाग्यपूर्ण बताया गया था। उनका कहना था कि जब अदालत ने साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर फैसला दिया है, तब दोषी के पक्ष में खड़ा होना केवल वोट बैंक की राजनीति का परिचायक है। उन्होंने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी आज भी ताहिर हुसैन से पूरी तरह दूरी बनाने का साहस नहीं दिखा रही है।

उधर, दिल्ली सरकार में मंत्री कपिल मिश्रा ने भी अदालत के फैसले के बाद कहा कि वर्ष 2020 के दिल्ली दंगे पहले से रची गई साजिश का हिस्सा थे और अदालत के निर्णय ने इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत दिया है। उन्होंने कहा कि यह फैसला उन लोगों के लिए भी जवाब है जो वर्षों से पूरे मामले को अलग दिशा देने का प्रयास कर रहे थे।

बहरहाल, देखा जाये तो अदालत का फैसला अपने आप में एक कानूनी निष्कर्ष है, लेकिन राजनीति के लिए यह एक असहज आईना भी है। जिस ताहिर हुसैन को कभी आम आदमी पार्टी का सक्रिय और प्रभावशाली चेहरा माना जाता था, उसी के दोष सिद्ध होने के बाद अब उससे दूरी बनाने की कोशिशें हो रही हैं। सवाल यह है कि जब आरोप सामने आ रहे थे तब उसका बचाव क्यों किया गया? और आज भी यदि कोई नेता अदालत के फैसले पर दुख जता रहा है तो वह आखिर किसके साथ खड़ा दिखाई देता है। अंकित शर्मा की हत्या का यह मामला केवल एक अपराध का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक सोच का भी दस्तावेज बन गया है जिसमें कई नेताओं ने न्याय से पहले राजनीति को प्राथमिकता दी।

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