तकनीक के सताए या अपनों के रुलाए (व्यंग्य)

By अरुण अर्णव खरे | Aug 13, 2020

आज बुद्धू बनाने के पारम्परिक और सात्विक तरीके बदल चुके हैं। तकनीक का जमाना है सो लोगों को तकनीक के जरिए बेवकूफ बनाया जा रहा है। और लोग हैं कि खुशी-खुशी बेवकूफ बन रहे हैं। कमाल यह है कि इस बेवकूफी का खुमार उनके सिर से तभी उतरता है जब उन्हें पता चलता है कि वह न केवल बेवकूफ बने हैं अपितु दोतरफा ठगे भी गए हैं। 

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मेल पढ़कर बटुक जी भावुक हो गए। पर जो लोग बटुक जी को जानते हैं वह इस पर विश्वास नहीं करेंगे। दर असल बटुक जी का शुरु से एक फलसफा रहा है। वह आँखों का उपयोग पढ़ने में कम सेंकने में अधिक करते रहे हैं सो जब उन्हें मेल के अंत में आँखें सेंकने लायक फोटोजनिक मसाला मिल गया तो वह भावुक हो गए। राशि बड़ी थी और बुर्किना फासो नाम का देश उनको नक्शे में ढूढ़ने से भी नहीं मिल पा रहा था सो मन में असमंजस था। लेकिन कैथरीन जॉयस का मनमोहक चेहरा उनके मन को अशांत कर रहा था। उन्होंने अपने पोते को बुलाकर साठ लाख पौंड के एक प्रतिशत की गणना करवाई और उनको रुपयों में तब्दील कराया। अड़तालीस लाख की राशि सुनकर वह कुर्सी से लुड़कते-लुड़कते बचे। उन्हें ऊपर वाला 'जब देता है छप्पर फाड़ कर देता है', मुहावरा सच होता प्रतीत होने लगा। दो दिनों तक कैथरीन की कमर में हाथ डाले वह सपनों की दुनिया में उड़ते रहे। जब जमीन पर वापस लौटे तो दो लाख रुपए कैथरीन को देने का निश्चय कर चुके थे। एक भावभीना सा मेल डियर सम्बोधन के साथ कैथरीन को लिखा और दो लाख रुपए उसके अकाउंट में ट्रांसफर कर दिए। साल भर से ऊपर हो चुका है। कैथरीन की कोई खबर नहीं है। इस बीच बटुक जी तीन दर्जन से ज्यादा मेल कैथरीन को कर चुके हैं लेकिन हर बार मेल वापस उनके इनबॉक्स में आ जाता है।

पिछले दिनों बटुक जी की नजर एक समाचार पर पड़ी। सराय रोहिल्ला में एक ठग गैंग पकड़ा गया था जो लोगों को मेल भेजकर अकाउंट में पैसे जमा करवाता था। पैसे डूबने से ज्यादा वह यह जानकर वह सदमे में है कि उनका बुर्किना फासो मात्र कुछ किलोमीटर की दूरी पर सराय रोहिल्ला में निकला। हद तो तब हो गई जब उनको पता चला कि जिसकी कमर में हाथ डालकर उन्होंने अपनी कितनी ही रातों को सुनहरे सपने देखते हुए गुलजार किया था वह कोई कैथरीन जायस नहीं अपितु कैथल का खैराती लाल जायसवाल है।

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अब पुलिस भी उनको परेशान कर रही है कि धोखाधड़ी का शिकार होने के बाद भी उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज क्यों नहीं कराई। पुलिस का कहना है कि जरूर उनके पास दो नम्बर का पैसा है। पिछले एक हफ्ते से वह रोज सफाई देने पुलिस थाने जा रहे हैं पर कोई उनकी बात मानने को तैयार नहीं है। उनकी स्थिति तकनीक के सताए और अपनों के रुलाए वाली हो गई है। परेशान होकर उन्होंने एक रिटायर्ड हेड कांस्टेबल मित्र से मदद गुहार लगाई और उसने तरस खाकर पचास हजार में उनकी बात मानने का सौदा थानेदार से तय करा दिया। अब वह शेर के जबड़े से छूटे हिरण सरीखी राहत महसूस कर रहे हैं।

अरुण अर्णव खरे

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