Taliban के 5 साल के राज में कितना बदला Afghanistan? बंदूकधारियों की Diplomacy देखकर दुनिया हैरान

By नीरज कुमार दुबे | Aug 14, 2026

भले ही दुनिया ने तालिबान को औपचारिक मान्यता देने से अब तक परहेज किया हो, लेकिन पांच साल में इस संगठन ने एक बात साबित कर दी है कि सत्ता पर कब्जे के बाद राजनय की ताकत को हथियार की तरह इस्तेमाल करना उसे आता है। 15 अगस्त 2021 को अमेरिकी नेतृत्व वाली नाटो सेनाओं की वापसी के बाद काबुल पर कब्जा करने वाला तालिबान आज उस मुकाम पर है जहां कई देश उसे पसंद नहीं करने के बावजूद उससे बात कर रहे हैं, उसके साथ सौदे कर रहे हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा से लेकर व्यापार तक के सवालों पर उसे नजरअंदाज नहीं कर सकते।

पांच साल में तालिबान राज ने आखिर बदला क्या?

देखा जाये तो तालिबान का पांच साल का राज हालात में कोई अहम बदलाव नहीं कर पाया है। आम अफगान की जिंदगी आर्थिक, सामाजिक और मानवीय संकटों से अब भी घिरी है। करीब आधी आबादी गरीबी में है, बेरोजगारी दर बहुत ज्यादा है, निवेश नहीं है और महिलाओं को कामकाज से लगभग बाहर कर दिया गया है। हां, कर संग्रह में सुधार हुआ है, भ्रष्टाचार में कुछ कमी आई है और देश के बड़े हिस्से में हिंसा पहले की तुलना में कम हुई है। लेकिन बदले में मनमानी गिरफ्तारियां, जबरन गुमशुदगियां और प्रतिशोधात्मक कार्रवाई जैसी शिकायतें बनी हुई हैं।

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तालिबान ने आर्थिक मोर्चे पर खनन और सीमा-पार बुनियादी ढांचे पर जोर बढ़ाया है। चीन और दूसरे पड़ोसी देशों की कंपनियां अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों में संभावनाएं तलाश रही हैं। मध्य एशिया के ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान और कजाखस्तान जैसे देश भी काबुल के साथ व्यापारिक गलियारों को लेकर सक्रिय हैं, क्योंकि समुद्र तक पहुंच बनाने के लिए अफगानिस्तान एक अहम भौगोलिक कड़ी बन सकता है। यही तालिबान की असली कूटनीतिक चाल है। यानि वह विचारधारा की बजाय भूगोल को बेच रहा है। वह कह रहा है कि उसे पसंद करें या न करें, लेकिन अफगानिस्तान की जमीन, खनिज, व्यापार मार्ग और सुरक्षा समीकरण से दुनिया बच नहीं सकती।

बिना मान्यता के भी दुनिया से रिश्ते

रूस फिलहाल तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता देने वाला अकेला देश है, लेकिन व्यवहार में तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। चीन, जापान, तुर्किये, सऊदी अरब और ब्रिटेन समेत अनेक देशों के प्रतिनिधि काबुल पहुंच रहे हैं। यूरोपीय संघ के साथ असफल अफगान शरणार्थियों की वापसी पर बातचीत हो रही है और जर्मनी ने तालिबान की वापसी के बाद पहली बार ऐसे अफगान नागरिक को निर्वासित किया जिसे किसी अपराध में दोषी नहीं ठहराया गया था। साथ ही तालिबान ने समय को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है। पांच साल गुजर चुके हैं। दुनिया को धीरे-धीरे यह कठोर वास्तविकता स्वीकार करनी पड़ रही है कि अफगानिस्तान पर वास्तविक नियंत्रण तालिबान का है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक, क्षेत्रीय देशों में यह सोच मजबूत हुई है कि यह ऐसी वास्तविकता है जिससे निपटना ‘अनिवार्य’ है, चाहे उसे पसंद किया जाए या नहीं।

पाकिस्तान को तालिबान ने दिखाया आईना

भारत के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक बदलाव तालिबान और पाकिस्तान के रिश्तों में आई दरार है। जिस पाकिस्तान को कभी तालिबान का संरक्षक और रणनीतिक साझेदार माना जाता था, वही आज काबुल के साथ खुले टकराव में है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच संघर्ष इतना बढ़ा कि चीन, कतर, सऊदी अरब, ओमान, ईरान, तुर्किये, उज्बेकिस्तान और मलेशिया तक को हस्तक्षेप करना पड़ा। सैकड़ों नागरिकों की मौत के बाद चीन ने बातचीत की मेजबानी की।

यहीं पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा झटका है। तालिबान ने यह दिखा दिया कि काबुल की सत्ता अब इस्लामाबाद की जेब में नहीं है। बल्कि अफगान संप्रभुता और सीमा विवाद पर वह पाकिस्तान से भिड़ने को तैयार है। भारत के लिए यह किसी रणनीतिक बोनस से कम नहीं। पिछले वर्ष भारत और तालिबान के संयुक्त बयान में जम्मू-कश्मीर को भारत में स्थित केंद्रशासित प्रदेश के रूप में संदर्भित किया गया और पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की गई। पाकिस्तान के लिए इससे अधिक कड़वा कूटनीतिक संदेश शायद ही कुछ हो सकता था।

भारत की चाल: मान्यता नहीं, मगर दूरी भी नहीं

भारत ने अफगानिस्तान में अपने ऐतिहासिक और सभ्यतागत संबंधों को कभी पूरी तरह टूटने नहीं दिया। 34 में से सभी प्रांतों में 500 से अधिक विकास परियोजनाओं के जरिए बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में उसकी मौजूदगी रही है। पिछले वर्ष काबुल में भारतीय दूतावास बहाल हुआ और तालिबान के राजनयिकों को नई दिल्ली स्थित अफगान दूतावास में काम करने की अनुमति मिली। विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी की भारत यात्रा ने इस रिश्ते को और गति दी।

जून में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में यह संकेत भी दिया कि मौजूदा तालिबान प्रतिबंध व्यवस्था पर पुनर्विचार की जरूरत है। भारत के संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधि हरीश पार्वतनैनी ने कहा कि पांच वर्षों में अफगानिस्तान की राजनीतिक वास्तविकता बदल चुकी है और प्रतिबंध व्यवस्था को इस बदलाव को ध्यान में रखना चाहिए।

लेकिन तालिबान की सबसे बड़ी कीमत अफगान महिलाएं चुका रही हैं

इस पूरी कूटनीतिक सफलता के बीच तालिबान शासन का सबसे भयावह चेहरा महिलाओं और लड़कियों की जिंदगी में दिखाई देता है। पांच साल में 160 से अधिक आदेश महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा, रोजगार, आवाजाही, पहनावे, बोलने और निर्णय लेने के अधिकारों पर प्रतिबंध लगा चुके हैं। माध्यमिक और उच्च शिक्षा से लड़कियों का बाहर किया जाना अफगानिस्तान के भविष्य पर सीधे हमला है। संयुक्त राष्ट्र की महिला एजेंसी के अनुसार आधुनिक दौर में किसी अन्य देश ने कानून, नीति और व्यवहार के जरिए आधी आबादी के अधिकारों को इस पैमाने पर खत्म नहीं किया।

महिलाओं को संयुक्त राष्ट्र परिसर समेत कई जगहों से बाहर रखा गया है। अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा और मुख्य न्यायाधीश अब्दुल हकीम हक्कानी के खिलाफ महिलाओं और लड़कियों के उत्पीड़न को मानवता के खिलाफ अपराध बताते हुए गिरफ्तारी वारंट भी जारी किए हैं। यही तालिबान की सबसे बड़ी विडंबना है कि बाहर की दुनिया से वह बातचीत के दरवाजे खोल रहा है, जबकि अपने ही देश की आधी आबादी के लिए दरवाजे बंद कर रहा है।

रणनीतिक संदेश साफ है

भारत के लिए तालिबान के पांच साल का अर्थ न तो भावनात्मक दोस्ती है और न ही वैचारिक समर्थन। यह कठोर रणनीतिक यथार्थवाद है। भारत को अफगानिस्तान में अपनी सुरक्षा, पाकिस्तान की गतिविधियों, आतंकवाद, मध्य एशिया तक पहुंच, मानवीय सहायता और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं के लिए काबुल से संवाद बनाए रखना होगा।

उधर, तालिबान ने पांच साल में दुनिया को यह दिखाया है कि बिना औपचारिक मान्यता के भी सत्ता प्रभाव पैदा कर सकती है। उसने पाकिस्तान को चुनौती दी, पड़ोसी देशों को अपने साथ बैठाया, यूरोप को वापसी के मुद्दे पर बातचीत के लिए मजबूर किया और भारत जैसे देश को भी व्यावहारिक जुड़ाव बढ़ाने की दिशा में सोचने के लिए प्रेरित किया। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि तालिबान जीत गया है। असली परीक्षा अभी बाकी है। जब तक अफगान लड़कियों के स्कूल नहीं खुलते, महिलाओं को काम और सार्वजनिक जीवन में अधिकार नहीं मिलता और शासन में मनमानी तथा दमन कम नहीं होता, तब तक तालिबान की कूटनीतिक सफलता उसके शासन की नैतिक विफलता को ढक नहीं सकती।

बहरहाल, कुल मिलाकर देखें तो पांच साल बाद तस्वीर यह है कि तालिबान को दुनिया ने मान्यता नहीं दी, लेकिन वह उससे बात करने लगी है। साथ ही पाकिस्तान, जिसने कभी काबुल को अपनी रणनीतिक गहराई समझा था, अब उसी काबुल से सीमा पर भिड़ रहा है। यही पिछले पांच वर्षों का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक उलटफेर है।

-नीरज कुमार दुबे

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