By अभिनय आकाश | Jun 22, 2026
भारत और बांग्लादेश के संबंध इतिहास, भूगोल और साझी संस्कृति की डोर से बंधे हैं। 1971 के मुक्ति संग्राम में भारत की निर्णायक भूमिका ने दोनों देशों के बीच अटूट 'मित्रता' की नींव रखी थी। वर्तमान में बांग्लादेश न केवल भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, बल्कि 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति का एक मजबूत स्तंभ भी है। रणनीतिक रूप से, पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए बांग्लादेश भारत के लिए एक अनिवार्य मित्र है। हालांकि, बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में यह दोस्ती एक गंभीर 'चुनौती' का रूप भी ले रही है। हाल के वर्षों में बांग्लादेश में हुआ राजनीतिक तख्तापलट, वहां बढ़ती कट्टरपंथी ताकतें और चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के प्रति उसका झुकाव नई दिल्ली के लिए चिंता का विषय है। इसके साथ ही, दशकों पुराना अवैध घुसपैठ का मुद्दा, तीस्ता जल विवाद और सीमा पर सुरक्षा संबंधी तनाव दोनों देशों के रिश्तों की परीक्षा लेते रहे हैं। संक्षेप में कहें तो, बांग्लादेश भारत के लिए एक ऐसा पड़ोसी है जिसे न तो नजरअंदाज किया जा सकता है और न ही जिसके प्रति ढिलाई बरती जा सकती है। भविष्य में वह भारत का एक मजबूत सहयोगी बना रहेगा या एक बड़ी रणनीतिक चुनौती बनकर उभरेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत अपनी कूटनीतिक कुशलता से वहां के आंतरिक बदलावों और चीनी दखल को कैसे संभालता है।
जब तक बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार थी तब तक इस इलाके में चीन अकेले उठा-पटक करता रहता था। जैसे साल 2017 का डोकलाम विवाद। भूटान की इस जमीन को चीन ने कब्जाने की पूरी कोशिश की थी ताकि ऊंचाई पर बैठकर सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर नजर रखी जा सके। जुलाई 2017 में चीन ने अपनी मीडिया में दावा किया था कि चीन सिलिगुरी कॉरिडोर के करीब एक सड़क बना रहा है जिससे नॉर्थ ईस्ट के राज्यों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। हालांकि बाद में भारतीय राजनायिकों ने इसका खंडन कर दिया था। लेकिन जब बांग्लादेश में सत्ता का परिवर्तन हुआ है, नई सरकार चीन का पूरा साथ देती नजर आई। जैसे अप्रैल 2025 में मोहम्मद यूनुस ने नॉर्थ ईस्ट को चीन में जाकर लैंड लॉक्ड बता दिया था। हालांकि भारत ने आपत्ति जताई। बांग्लादेश के ऊपर कुछ निर्यात के बैन भी लगाए। साथ ही नॉर्थ ईस्ट से म्यांमार के जरिए कोलकाता तक व्यापार के दूसरे रूट कालादान प्रोजेक्ट को दोबारा गति दे दी।
चीन ने बांग्लादेश के अंदर मिलिट्री और इकोनॉमिकल प्रोजेक्ट भी शुरू किए हैं। जैसे भारत की सीमा के पास मौजूद लाल मुनिरहाट एयर स्ट्रिप को एयरबेस के तौर पर डेवलप करना, दिस्ता प्रोजेक्ट में फाइनेंशियली मदद देना, सेटेलाइट सिटी बनाने के लिए प्लानिंग करना और रंगपुर के पास एक सौर ऊर्जा संयंत्र तैयार करना। इकोनॉमिक्स टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक रंगपुर के पास बन रहे सोलर प्रोजेक्ट में काम करने वाले करीब-करीब सभी लोग चीन से हैं। लोकल लोगों को इसमें न के बराबर शामिल किया गया है। चीन की कंपनी भारत बांग्लादेश बॉर्डर के बेहद करीब इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी के लिए काम कर रही है। यानी कुल मिलाकर चीन किसी ना किसी तरीके से सिलीगुड़ी कॉरिडोर के करीब अपनी प्रेजेंस बढ़ाना चाहता है। अब वो चाहे मिलिट्री प्रेजेंस हो या फिर सिविलियन प्रेजेंस ताकि भारत पर दबाव बना रहे।
दक्षिण में बांग्लादेश है और यही वजह है कि ढाका की राजनीति, सीमा सुरक्षा और भारत-बांग्लादेश संबंध इस इलाके की रणनीतिक अहमियत को सीधे प्रभावित करते हैं। आज बांग्लादेश भारत का करीबी साझेदार माना जाता है, लेकिन क्या होगा अगर वहां की राजनीति बदलती है? क्या चिकन नेक पर दबाव बढ़ सकता है? क्या पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा और कनेक्टिविटी पर असर पड़ सकता है? और आखिर क्यों भारतीय रणनीतिकार इस संकरे गलियारे को देश की सबसे संवेदनशील भौगोलिक कड़ी मानते हैं? आज हम इसी सवाल की तह तक जाएंगे।