By अभिनय आकाश | Jan 24, 2026
दुनिया में इन दिनों हथियारों वाले युद्ध से इतर अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा टैरिफ वॉर छेड़ा गया है। दुनियाभर के देशों को अपने टैरिफ वॉर का डर दिखा डील साइन करवाते ट्रंप ने माई फ्रेंड मोदी कह कह कर भी भारत के साथ वही हथकंडा अपनाया। दुनिया में एक वॉर चल रही है जिसमें ना तो हथियार इस्तेमाल हो रहे हैं और ना ही बड़ी-बड़ी मशीनें। लेकिन इसके बावजूद लाखों लोगों की जिंदगी दांव पर है। जिस तरह से ट्रंप कदम उठा रहे हैं भारत और अमेरिका के बीच 87 अरब डॉलर का निर्यात व्यापार दांव पर है। जहां अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। यह टैरिफ उन कई प्रमुख उद्योगों की कंपटीशन को चुनौती देता है जो पहले से ही वैश्विक मंदी का सामना कर रहे हैं। ट्रंप ने इस टैरिफ को ग्लोबल सप्लाई चेन में अमेरिका की ताकत के रूप में पेश किया।
आज की कहानी की शुरुआत दो रियासतों लखनऊ और भोपाल से करते हैं। दोनों रियासतें फोन बनाती थीं। फिर दोनों रियासतें एक दूसरे के क्षेत्र में अपने फोन को बेचती भी हैं। अब अचानक एक दिन भोपाल के पास एक ऐसी टेक्नोलॉजी आ जाती है जिससे वो बहुत कम कीमत पर फोन बना सकते हैं। अब दोनों रियासतें सेम फोन बना रही हैं। लेकिन भोपाल का फोन सस्ता है। मान लीजिए भोपाल अपना फोन ₹100 में बेचता है और लखनऊ अपना फोन ₹200 में बेचता है। अब आप सोचिए कि आप किस रियासत का फोन खरीदेंगे? जाहिर तौर पर आप भोपाल का फोन खरीदेंगे क्योंकि भोपाल का फोन सस्ता है। चाहे आप भोपाल में रहते हो या आप लखनऊ में रहते हो। है तो आप इंसान ही और सभी इंसान बचत करना चाहते हैं। ऐसे में लखनऊ को नुकसान होने लगता है क्योंकि उसके महंगे फोन को अब कोई नहीं खरीद रहा। अब आप सोचिए कि अगर आप लखनऊ के राजा होते तो आप क्या करते? लखनऊ के राजा भी इसी बात से परेशान थे। तभी उन्हें एक आईडिया आता है। उन्होंने सोचा कि भोपाल का फोन हमारी रियासत में ₹100 में बिकता है। तो क्यों ना हम उस पर ₹100 का एक्स्ट्रा टैक्स लगा दें। अब जब भोपाल के फोन पर ₹100 का एक्स्ट्रा टैक्स जुड़ जाएगा तो उसकी कीमत भी ₹200 हो जाएगी। फिर दोनों रियासतों के फोन बराबर कीमत पर बिकने लगेंगे और लखनऊ के फोन को भी लोग खरीदना शुरू कर देंगे। इस तरह लखनऊ का नुकसान भी नहीं होगा। तो इस कहानी में राजा ने जो एक्स्ट्रा शुल्क लगाया था उसे अर्थशास्त्र की भाषा में टेरिफ कहा जाता है। टेरिफ अलग-अलग कारणों से लगाया जाता है। जैसे लोकल इंडस्ट्रीज को बचाने के लिए, सरकार की कमाई को बढ़ाने के लिए, सरकार के नुकसान को कम करने के लिए, नौकरियों को बढ़ाने के लिए या फिर इसको एक पॉलिटिकल टूल की तरह भी कई बार इस्तेमाल किया जाता है।
ट्रेड वॉर एक ऐसी सिचुएशन है जहां दो देश एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने के लिए व्यापार का यानी कि ट्रेड का इस्तेमाल करते हैं। ट्रेड वॉर को आप एक रस्सी की गेम की तरह भी इमेजिन कर सकते हैं। जहां पर दो देश एक दूसरे को हराने के लिए या एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगाते हैं।
सबसे पहले इस बात को समझ लें जिसे शायद डोनाल्ड ट्रंप भूल गए हैं कि अमेरिका की ही पहल थी कि दुनियाभर के देशों को अपने हितों की हिफाजत करने की छूट मिली। कोई भी देश किसी भी देश के साथ व्यापार कर सकता था। जहां से सस्ता मिले वहां से खरीदों ऐसे बाजार खुला हुआ था। फ्री मार्केट का कंसेप्ट कहा गया और पिछले सात दशकों में अमेरिका इसका झंडाबदार रहा है। लेकिन ट्रंप अचानक इसे पलटना चाहते हैं। पहली सदी से ही दुनिया के अलग अलग हिस्सों के बीच व्यापार शुरू हो चुका था। सिल्क रूट के जरिए चीन का रेशन रोम पहुंचने लगा था। लेकिन इसमें एक समस्या ये थी कि व्यापार तभी फलता फूलता जब कोई ताकत उसकी हिफाजत करती। मंगोल, इस्लामिक सौदागरों से लेकर औपनिवेशिक काल तक चला। रास्ते बदले, सामान भी बदले लेकिन फायदा हमेशा ताककवर का ही रहता था। वही तय करता था कि कौन किससे व्यापार करेगा। किस कीमत पर करेगा। ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति के बाद 20वीं सदी में युद्ध छिड़ा और फिर अमेरिका में एक बिल पास हुआ। जिससे अमेरिका ने ट्रेड पर भारी टैक्स लगाए। फिर जो हुआ उसे हम द ग्रेट डिप्रेशन के नाम से जानते हैं।