By अभिनय आकाश | Jan 24, 2026
हेडलाइंस हमें हमेशा देखने को मिलती है जहां लिखा होता है कि रुपए की कीमत बढ़ी या घटी है। लेकिन इसका मतलब क्या हुआ जब कोई यह कहता है कि आज रुपए की कीमत गिर गई है या बढ़ गई है। यह घटना और बढ़ना कौन और कैसे डिसाइड किया जाता है और डॉलर की ही तुलना इंडियन करेंसी से क्यों की जाती है और इससे हम आम जनता के पॉकेट पर क्या असर पड़ता है। 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो एक डॉलर 3.3 रूपये का था। आज वही डॉलर 90 रूपये का हो गया है। हो सकता है भविष्य में एक डॉलर की वैल्यू 100 रूपये हो जाए।
रुपए की वैल्यू डॉलर के अगेंस्ट में फिक्स्ड कौन करता है इंडियन गवर्नमेंट तो इसका जवाब है नहीं। अब आप सोच रहे होंगे कि आरबीआई द्वारा किया जाता होगा तो इसका जवाब भी है नहीं हालांकि रुपए की वैल्यू को स्टेबल रखने में आरबीआई का बहुत ही इंपॉर्टेंट रोल होता है। लेकिन आरबीआई भी यह तय नहीं करता है। तो सवाल यहां ये आता है कि फिर कौन करता है। इसका जवाब है करेंसी मार्केट। करेंसी मार्केट में जिस करेंसी की डिमांड ज्यादा होती है उसकी वैल्यू बढ़ती है जिसका डिमांड कम होता है। उसकी वैल्यू गिर जाती है और इस पूरे सिस्टम को फ्लोटिंग एक्सचेंज रेट सिस्टम कहते हैं। इसको थोड़ा डिटेल में समझते हैं। मान लीजिए कि अगर गवर्नमेंट ऑफ इंडिया और आरबीआई ने मिलकर $ 440 के बराबर फिक्स्ड कर दिया है मतलब अगर कोई भी प्रोडक्ट खरीदना है इंटरनेशनल मार्केट में पैसे लगाने हैं तो यह करेंसी अगर फिक्स्ड रहती है तो इसे फिक्स्ड एक्सचेंज रेट सिस्टम कहते हैं। लेकिन अगर यही रुपए की वैल्यू जो है वो डॉलर की तुलना में अगर मार्केट से डिसाइड किया जाए कि किस करेंसी की कितनी डिमांड और सप्लाई है तो उसे फ्लोटिंग एक्सचेंज रेट सिस्टम कहते हैं। 1993 के बाद इंडिया ने फ्लोटिंग एक्सचेंज सिस्टम को ही अपनाया है। मान लीजिए कि अगर रुपए की डिमांड बढ़ जाती है तो आज अगर $ की वैल्यू ९० है तो वो कम होकर ₹10 हो जाएगी । हम सब जानते हैं कि हर देश की अपनी एक अलग करेंसी होती है जैसे कि भारत में रुपैया अमेरिका में डॉलर यूरोप में यूरो और जापान में यन यह करेंसी की वैल्यू है। इसी वजह से एक दूसरे के मुकाबले में बदलती रहती है इस मूल्य को ही मुद्रा दर यानी कि एक्सचेंज रेट कहते हैं। एक्सचेंज रेट यह तय करती है कि एक देश की मुद्रा को दूसरे देश की मुद्रा से कितने बदले में लिया जा सकता है। जैसे कि स्टॉक को खरीदने और बेचने के लिए स्टॉक मार्केट होता है। वैसे ही करेंसी एक्सचेंज करने के लिए भी फॉरन एक्सचेंज मार्केट होता है। जैसे मान लीजिए कि अगर भारत को अमेरिका से कुछ प्रोडक्ट्स लेने हैं तो भारत को वो खरीदने के लिए डॉलर्स की जरूरत पड़ेगी। अगर भारत को आज के दिन में $ लर में कोई सामान खरीदना होगा तो उसके लिए भारत को ९० से ज्यादा खर्च करने पड़ेंगे।
पूरी अर्थव्यवस्था ही डिमांड और सप्लाई चेन पर बेस्ड है जैसे किसी चीज की मांग बढ़े तो उसकी कीमत बढ़ जाती है । ठीक उसी तरह से करेंसी के मामले में भी यही होता है। अगर डॉलर की मांग बढ़ जाती है तो डॉलर की कीमत भी ऑटोमेटिक बढ़ ही जाती है। इसको भी उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए कि भारत के व्यापारियों को अमेरिका से बड़ी मात्रा में सामान खरीदने की जरूरत है। इसके लिए उन्हें डॉलर की आवश्यकता होगी। अगर डॉलर की सप्लाई लिमिटेड हो और भारत को डॉलर की ज्यादा जरूरत हो, डॉलर की जो कीमत है वह अपने आप ही बढ़ जाएगी। इससे डॉलर का मूल्य रुपए के मुकाबले भी बढ़ेगा और रुपया कमजोर हो जाएगा।
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये (INR) का कमजोर होना अर्थशास्त्रियों, कारोबारियों और नीति-निर्माताओं के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। रुपये में यह गिरावट कई आर्थिक कारणों से जुड़ी है, जो भारत की वित्तीय स्थिति और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को सीधे प्रभावित करती है। आइए, उन प्रमुख कारकों पर नजर डालते हैं जो इस रुझान को आगे बढ़ा रहे हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था पर उनके क्या प्रभाव पड़ सकते हैं।
भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि डॉलर की बढ़ती मांग के कारण रुपया कमजोर होकर लगभग ₹90.17 प्रति डॉलर के स्तर तक दबाव में आया है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत के मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 696.61 अरब डॉलर के स्तर पर हैं—रुपये को अहम सहारा प्रदान कर रहे हैं। गवर्नर मल्होत्रा के अनुसार, यदि भारत और अमेरिका के बीच संभावित व्यापार समझौता तय होता है, तो इससे रुपये पर बना दबाव कम हो सकता है और बाजारों में स्थिरता लौट सकती है।
मार्केट एक्सपर्ट कुणाल सोधानी का आकलन भी इसी दिशा में संकेत करता है। उनका कहना है कि भारत–अमेरिका व्यापार समझौते में हो रही देरी के कारण निवेशकों की धारणा अभी सतर्क बनी हुई है। जबकि भारतीय अधिकारियों को उम्मीद थी कि यह समझौता 2025 के अंत या 2026 की शुरुआत तक पूरा हो जाएगा, लेकिन अनिश्चितता के चलते विदेशी निवेश प्रवाह और मुद्रा बाजार पर असर पड़ रहा है।