Somnath Mandir की अद्भुत कहानी: जब चंद्रमा को मिला श्राप, Lord Shiva ने ऐसे की रक्षा

By शुभा दुबे | Jun 17, 2026

गुजरात के पश्चिम−दक्षिण छोर पर सागर के तट पर स्थित पाटन जिसे प्रभासपात्तन भी कहा जाता है में स्थित है सोमनाथ मंदिर। यहां भगवान शिव का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग है। यह भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख है। स्कन्दपुराण के प्रभासखण्ड में सोमनाथ की महिमा निरूपित है। प्रभासपाटन की चार वस्तुएं प्रसिद्ध हैं− नदी, नारी, अश्व तथा भगवान सोमनाथ का दर्शन। स्कन्दपुराण के अनुसार, दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियां थीं। उन सबके पति चन्द्रमा थे। इनमें रोहिणी सर्वाधिक सुन्दरी होने के कारण चन्द्रमा को अत्यधिक प्रिय थी। चन्द्रमा सदैव उसी के साथ रहते थे। उपेक्षित पत्नियों ने चन्द्रमा की शिकायत दक्ष प्रजापति से की।

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चन्द्रमा शक्तिहीन तथा निस्तेज होते गये। उनकी कांति मलिन हो गई। संसार में अंधेरा छाने लगा। चन्द्रमा की बीमारी से पशु, पक्षी, मनुष्य तथा देवता सभी चिंतित हो गये। देवताओं ने दक्ष से चन्द्रमा को शापमुक्त करने का निवेदन किया। दक्ष का क्रोध अभी तक शांत नहीं हुआ था, अतष्ः उन्होंने चंद्रमा को शाप से मुक्त नहीं किया। निर्बल तथा कांतिहीन चन्द्रमा ने दक्ष से वचनभंग करने के लिए क्षमा मांगी। दक्ष ने उनसे कहा कि तुम प्रभासपाटन जाकर शिव की आराधना करो। केवल वे ही तुम्हें निरोग कर सकते हैं।

चन्द्रमा ने प्रभासपाटन जाकर अनेक वर्षों तक शिवजी की आराधना की। चन्द्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने कहा कि मैं तुम्हें पूर्ण शक्ति तो नहीं दे सकता, लेकिन महीने में पंद्रह दिनों तक तुम नित्य बढ़ते रहोगे तथा शेष पंद्रह दिनों में तुम्हारी शक्ति का क्रमशः नित्य क्षय होता रहेगा। कृतज्ञता प्रकट करते हुए चन्द्रमा ने प्रभासपाटन में स्वर्ण का मंदिर निर्माण करने का संकल्प लिया। ब्रह्माजी ने प्रभासपाटन में भूमि कुरेदी तो वहां कागदी नींबू के आकार का एक शिवलिंग स्वयं प्रकट हो गया। उस स्थान को दूध तथा मधु से ढककर उप पर ब्रह्मशिला रखी गई। उस पर ब्रह्मा के निर्देशों के अनुसार चन्द्रमा तथा उनकी प्रिय पत्नी रोहिणी ने शिवलिंग की स्थापना की।

भागवत, महाभारत आदि में अनेक स्थानों पर प्रभासपाटन का उल्लेख है। यहीं प्राची, सरस्वती, कपिला तथा हिरण्या नदियों का संगम हुआ है। यहीं यदुवंशियों का पारस्परिक युद्ध द्वारा संहार हुआ था। इसके निकट ही बालक तीर्थ है। इस स्थान पर पेड़ के नीचे लेटे हुए श्रीकृष्ण के तलुवे में भील का प्राणघातक तीर लगा था। यह स्थान देहोत्सर्ग कहलाता है। इसी स्थान के निकट बलरामगुका है। श्रीकृष्ण के भाई शेषावतार बलराम अपना कार्य पूरा कर इसी गुफा द्वारा पाताललोक गये थे।

-शुभा दुबे

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