By संतोष उत्सुक | Aug 11, 2026
उस दिन सब्जी खरीद रहा था तो पत्नी का फोन पहली बार तो भीड़ के कारण सुना नहीं। दोबारा आया, मैंने कहा लिस्ट मेरे पास है और क्या लाऊं। बोली, हरा धनिया आजकल फ्री मिलता है इसलिए ज़्यादा लाना। पहले देख लिया जाता है किस दुकान में ताज़ा धनिया रखा है सब्जी भी वहीँ से लेते हैं। कभी सिर्फ सेब और केले खरीद रहे हों वहीँ से मुफ्त वाला धनिया उपहार में ले लेते हैं। मुफ्त का माल सभी को ज्यादा पचता है। उसमें ज्यादा स्वाद रहता है, खरीद कर खाओ तो उतना स्वाद नहीं आता। कुछ दिनों बाद बाज़ार में धनिया कम आता तो दुकानदार कहता, हरा धनिया लाल हो गया है, ढाई सौ रूपए किलो। धनिया अलग से खरीदना होगा।
धनिए के निचली तरफ रखे एक नोटिस ने कहा, मुझे ज़रूर पढना। नोटिस में धनियाजी के दो फोटो छपे हैं। एक में सिर्फ जड़ें हैं, दूसरे फोटो में जड़ों समेत धनिया है जिसे खरीदने के लिए टिक किया गया है। सूचना अंग्रेज़ी में है जिसे हिंदी में ऐसे समझ सकते हैं, ‘कृपया धनिए की जड़ें न तोड़ें। धनिया जड़ों समेत बेचा जाता है। हम सप्लायर को पूरी गुच्छी के लिए भुगतान करते हैं। जड़ें तोड़ने या पत्ते हटाने से उत्पाद खराब हो जाता है। खराब धनिए की दोगुना कीमत वसूली जाएगी और धनिया तो लेना ही पड़ेगा। खाद्य सुरक्षा हमेशा बनाए रखनी चाहिए। आपके सहयोग के लिए धन्यवाद ।’
बेचारे भारतीय ग्राहक यानी सहजता से न बदलने वाले लोग, धनिया, कभी तो मर्ज़ी से खरीदना चाहते हैं। देस हो या विदेश जब खरीदना, तो छांट कर ही खरीदना हमारा पारम्परिक अधिकार है। विक्रेता भी भारतीय है तभी नोटिस लगाना पड़ा। हालांकि पालिथिन में लिपटा एक कद्दू भी वहां दिखा जो दो जगह से खराब होना शुरू हो चुका था लेकिन इस तरह सब्जियां बेच देना भी हमारी परम्परा है। स्वाद और सुगंध बढ़ाने के धनिए का स्वाद, चाहे मुफ्त में मिले या तीन हज़ार एक सौ रूपए किलो, हम अपनी परम्परागत आदतें नहीं छोड़ते। क्यूं छोड़ें, संस्कृति भी एक चीज़ होती है।
- संतोष उत्सुक