संकल्प के साथ राष्ट्रीय समस्या नक्सलवाद का अंत

By प्रमोद भार्गव | Apr 02, 2026

भारत में संकट बन चुकी राष्ट्रीय समस्याओं का समय-सीमा में अंत होना दुर्लभ है, लेकिन केंद्र की भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने यह कार्य करके दिखा दिया। गृहमंत्री अमित शाह लगातार कहते रहे हैं कि माओवादी नक्सलवाद का अंत 31 मार्च 2026 तक कर लिया जाएगा। उन्होंने यह करके दिखा भी दिया। वरना नक्सलवाद को संरक्षण दे रहे नगरीय तथाकथित बौद्धिक इस सशस्त्र खूनी क्रांति को राष्ट्र विरोधी संघर्ष मानते ही नहीं थे। बस्तर में 25 लाख के इनामी नक्सली सरगना पापा राव ने अपने 17 साथियों के साथ जिस तरह से हथियारों सहित समर्पण किया, उससे देश के सबसे बड़े गढ़ में माओवादी हिंसा का निर्णायक अंत हो गया। क्योंकि इस क्षेत्र का यही अंतिम सरगना शेष बचा था। नक्सलवाद का अंत ठीक उसी तरह हुआ है, जिस तरह प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के कार्यकाल में पंजाब के उग्रवाद का अंत हुआ था। इस उपलब्धि का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की दृढ़ इच्छा शक्ति को जाता है। अब पूरा देश मान रहा हैं कि भारत में राजनीतिक नेतृत्व दृढ़ हो तो किसी भी समस्या का निपटारा किया जा सकता है। क्योंकि देश की जिस तरह की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियां हैं और सषक्त प्रशासनिक ढांचा है, उसके चलते किसी भी प्रकार की सशस्त्र क्रांति का उग्रवाद और नक्सलवाद की तरह अंत होना निश्चित है। कश्मीर का पाक प्रायोजित आतंकवाद का भी यही हश्र होना है।

छत्तीसगढ और आंध्रप्रदेश की सीमा पर हुई मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने शीर्ष माओवादी क्रूर हिंसा के प्रतीक बन चुके हिड़मा को मार गिराने के पहले छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ के जंगल में सुरक्षा बलों के नक्सल विरोधी अभियान में बड़ी सफलता तब मिली थी, जब डेढ़ करोड़ के इनामी बसव राजू समेत 27 माओवादियों को सुरक्षा बलों ने मार गिराया था। यह कुख्यात दरिंदा होने के साथ गुरिल्ला लड़ाका था। माओवादी पार्टी का इसे पर्याय माना जाता था। इसका नक्सली सफर 1985 से शुरू हुआ था। इसने वारंगल के क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाई की थी।

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नक्सली हिंसा लंबे समय से देश के अनेक प्रांतों में आंतरिक मुसीबत बनी हुई है। वामपंथी माओवादी उग्रवाद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा माना जाता रहा है। लेकिन चाहे जहां रक्तपात की नदियां बहाने वाले इस उग्रवाद पर लगभग नियंत्रण किया जा चुका है। इसलिए अमित शाह ने लोकसभा में ‘नक्सल मुक्त भारत‘ मुद्दे पर चली चर्चा का उत्तर देते हुए कहा कि ‘एक समय 12 राज्य लाल आतंक का गलियारा बन गए थे। कानून व्यवस्था नहीं थी। देश में अब नक्सलवाद खत्म हो गया है।‘ शाह ने बताया कि इस दौरान 706 नक्सली मारे गए, 4800 ने समर्पण किया हैं और 2000 गिरफ्तार हुए हैं। इस समस्या के परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस को घेरते हुए शाह ने कहा, ‘75 साल में 60 साल कांग्रेस ने राज किया। लेकिन उसने आदिवासियों को न घर दिए, न पानी न स्कूल बनाए और न ही बैंकिंग सुविधाएं पहुंचाई।' शाह का यह बयान तर्कसंगत है, क्योंकि शहरी वामपंथियों से भयभीत कांग्रेस नेतृत्व नक्सलवाद को कश्मीर के आतंकवाद और पूर्वोत्तर के उग्रवाद की तरह बड़ी चुनौती तो मानती थी, लेकिन उससे निपटने की कभी कोई कठोर रणनीति नहीं बनाई। यही कारण रहा कि छत्तीसगढ़ के जगदलपुर इलाके में नक्सली आतंक बेखौफ फलता-फूलता रहा। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि छत्तीसगढ़ में नक्सली तंत्र को कमजोर करने की दृष्टि से सरकार ने बहुआयामी कदम उठाएं। सबसे पहले उन नगरीय बौद्धिकों पर शिकंजा कसा, जो इन्हें राष्ट्रविरोधी वामपंथी वैचारिक खुराक देते थे। केंद्र सरकार ने सुरक्षाबलों को आधुनिक हथियार एवं यांत्रिक सुविधाएं देकर इन्हें सशक्त बनाया। कुछ कानून शिथिल करके नक्सलवाद को खत्म करने का अभियान छेड़ दिया। इसका परिणाम निकला कि एक के बाद एक खून की इबारत लिखने वाले नक्सली मारे जाने लगे। जो नक्सली समर्पण के लिए तैयार हुए उन्हें समर्पण का अवसर और समझौते में बताई गई शर्तों पालन करने का भरोसा दिया। नतीजतन इसके पहले तक गुप्तचर एजेंसियां नक्सलियों का सुराग लगाने में असफल रहती थीं, उन्हें नक्सलियों पर शिकंजा कसने के बाद भरोसे की सूचनाएं मिलने लगीं। इस रणनीति के बाद से सैन्यबलों को सटीक सूचनाएं मिलीं और वे नक्सलियों को निशाना बनाने में लगातार कामयाब होने लगे। 

छत्तीसगढ़ के ज्यादातर नक्सली आदिवासी हैं। इनका कार्यक्षेत्र वह आदिवासी बहुल इलाके हैं, जिनमें ये खुद आकर नक्सली बने हैं। इसलिए इनका सुराग सुरक्षाबलों को लगा पाना मुश्किल होता है। लेकिन ये इसी आदिवासी तंत्र से बने मुखबिरों से सूचनाएं आसानी से हासिल कर एजेंसियों को खबर देने लगे। दुर्गम जंगली क्षेत्रों के मार्गों में छिपने के स्थलों और जल स्रोतों से भी ये खूब परिचित थे। इसलिए ये और इनकी शक्ति लंबे समय से यहीं के खाद-पानी से पोषित होती रही है। दरअसल इन वनवासियों में अर्बन माओवादी नक्सलियों ने यह भ्रम फैला दिया था कि सरकार उनके जंगल, जमीन और जल-स्रोत उद्योगपतियों को सौंपकर उन्हें बेदखल करने में लगी है, इसलिए यह सिलसिला जब तक थमता नहीं है, विरोध की रक्तरंजित मुहिम जारी रखनी है। सरकारें इस समस्या के निदान के लिए बातचीत के लिए भी आगे आईं, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। इन्हें बंदूक के जरिए भी काबू में लेने की कोशिशें हुई हैं। लेकिन नतीजे पूरी तरह अनुकूल नहीं रहे। एक उपाय यह भी हुआ कि जो नक्सली आदिवासी समर्पण कर मुख्यधारा में आ गए थे, उन्हें बंदूकें देकर नक्सलियों के विरुद्ध खड़ा करने की रणनीति भी अपनाई गई। इस उपाय में खून-खराबा तो बहुत हुआ, लेकिन समस्या बनी रही। गोया, आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने से लेकर विकास योजनाएं भी इस क्षेत्र को नक्सल मुक्त करने में असफल रहीं। 

दरअसल, देश में अब तक तथाकथित शहरी बुद्धिजीवियों का एक तबका ऐसा भी रहा, जो माओवादी हिंसा को सही ठहराकर संवैधानिक लोकतंत्र को मुखर चुनौती देकर नक्सलियों का हिमायती बना हुआ था। यह न केवल उनको वैचारिक खुराक देकर उन्हें उकसाने का काम करता था, बल्कि उनके लिए धन और हथियार जुटाने के माध्यम भी खोले हुए था। बावजूद इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जब ये राष्ट्रघाती बुद्धिजीवी पुख्ता सबूतों के आधार पर गिरफ्तार किए गए तो बौद्धिकों और वकीलों के एक गुट ने देश के सर्वोच्च न्यायालय को भी प्रभाव में लेने की कोशिश की थी और गिरफ्तारियों को गलत ठहराया था। माओवादी किसी भी प्रकार की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पसंद नहीं करते थे। इसलिए जो भी उनके खिलाफ जाता था, उसकी बोलती बंद कर दी जाती थी। हालांकि तत्काल तो इस चरमपंथ पर पूर्ण अंकुश लगता दिखाई दे रहा है, लेकिन सरकार को ध्यान रखना होगा कि नक्सलियों के जो भी नगरीय बौद्धिक समर्थक हैं, उनके तार देश-विदेश में उन नक्सल समर्थक वामपंथियों से जुड़े हैं, जो माओवादियों को वैचारिक खुराक, धन और हथियार उपलब्ध कराते रहे हैं। सरकार की सतर्कता कम होती दिखाई देगी तो ये वामपंथी हताश एवं निराश माओवादियों को सिर उठाने के संसाधन फिर से देने लग जाएंगे। 

- प्रमोद भार्गव

वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार

शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी (म.प्र.)

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