Rakhi Festival 2023: मानवीय रिश्तों में नवीन ऊर्जा का संचार करता है राखी का पर्व

By ललित गर्ग | Aug 29, 2023

भारत धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं और त्योहारों का देश है, यहां के हर त्योहार का अपना एक मकसद और रंग होता है, जो विभिन्न धर्मों, समाजों एवं लोगों को करीब ले आता है। रक्षा-बंधन भी ऐसा ही अनूठा सांस्कृतिक पर्व है। राखी के धागें बहन के पवित्र प्रेम और रक्षा की डोरी भर नहीं है, बल्कि यह धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक एकबद्धता एवं एकसूत्रता का अमोघ साधन है। राखी का त्योहार महिलाओं को समानता एवं सुरक्षा प्रदान करने के लिये संकल्पित होने का अवसर प्रदान करता है। क्योंकि अगर नजर उठाकर देखें, तो कठिनाइयों और चुनौतियों से भरे क्षेत्रों में महिलाएं अब अपनी अद्भुत कार्यशैली से चमत्कृत बुलंदियां छू रही हैं। चाहे सेना हो या पहलवानी के अखाड़े, हर जगह समूची दुनिया उनका तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत करती है। बंधनों, उत्पीड़न एवं उपेक्षा से नारी को मुक्ति दिलाने की प्रेरणा राखी के धागों में गूंथी हुई है। रक्षाबंधन स्नेह का वह अमूल्य बंधन है, जिसका बदला धन तो क्या सर्वस्व देकर भी नहीं चुकाया जा सकता। यह त्यौहार भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक है, वही लगातार असुरक्षा एवं अस्मिता के लिये जूझती नारी को एक आश्वासन है उसकी रक्षा का। राखी के जरिये बहनें भाई की सलामती की दुआ मांगती हैं तो भाई ताउम्र बहन की हिफाजत का बीड़ा उठाते हैं, फिर चाहे रिश्ता खून का हो या सिर्फ कच्चे धागे का या फिर मानवीय संबंधों का। निश्चित ही नारी अस्मिता एवं अस्तित्व से जुड़ा राखी का त्योहार आदर्शों का हिमालय है और संकल्पों का सोपान है।

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राखी के इस अभूतपूर्व पर्व को समझने के लिए इसके ऐतिहासिक प्रसंगों को समझना बेहद जरूरी है वरना इस पर्व की रंगत अधूरी रह जायेगी। भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है कि देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानव हावी होते नजर आने लगे। भगवान इन्द्र घबरा कर बृहस्पति के पास गये। वहां बैठी इन्द्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही थी। उन्होंने रेशम का धागा मन्त्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बाँध दिया जिसके बाद इंद्र विजयी हुए। इस पर्व के अनेक ऐतिहासिक प्रसंग भी हैं। राजपूत जब लड़ाई पर जाते थे तब महिलाएँ उनको माथे पर कुमकुम तिलक लगाने के साथ-साथ हाथ में राखी भी बाँधती थी।

           

मुगल काल के दौर में जब मुगल बादशाह हुमायूँ चितौड़ पर आक्रमण करने बढ़ा तो राणा सांगा की विधवा कर्मवती ने हुमायूँ को राखी भेजकर रक्षा वचन ले लिया। हुमायूँ ने इसे स्वीकार करके चितौड़ पर आक्रमण का ख्याल दिल से निकाल दिया और कालांतर में मुसलमान होते हुए भी राखी की लाज निभाने के लिए चितौड़ की रक्षा हेतु बहादुरशाह के विरूद्ध मेवाड़ की ओर से लड़ते हुए कर्मावती और मेवाड़ राज्य की रक्षा की। इसी तरह सिकंदर की पत्नी ने अपने पति के हिंदू शत्रु पुरू को राखी बांध कर अपना मुंहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन लिया। पुरू ने युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी का और अपनी बहन को दिये हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवदान दिया। सिकंदर ने भी पोरस के रक्षा-सूत्र की लाज रखते हुए और एक योद्धा की तरह व्यवहार करते हुए उसका राज्य वापस लौटा दिया।

राखी एक धागा प्रेम का है, जो इस पर्व को एक लौकिक महत्व प्रदान करता है, यह धागा भाई-बहन के रिश्तों को और मजबूत करता है। जो सिर्फ प्यार और अपनेपन का संदेश ही नहीं देता बल्कि कर्तव्यों का भी बोध कराता है। राखी के धागे को देखकर हर भाई को अपनी बहन के प्रति कर्तव्यों का आभास होता है। राखी का त्योहार सावन महीने के अंतिम दिन मनाया जाता है। महाभारत में भी इस बात का उल्लेख है कि जब ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि मैं सभी संकटों को कैसे पार कर सकता हूँ तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी तथा उनकी सेना की रक्षा के लिये राखी का त्योहार मनाने की सलाह दी थी। उनका कहना था कि राखी के इस रेशमी धागे में वह शक्ति है जिससे आप हर आपत्ति से मुक्ति पा सकते हैं। महाभारत में ही रक्षाबन्धन से सम्बन्धित श्रीकृष्ण और द्रौपदी का एक और वृत्तान्त है। जब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया तब उनकी तर्जनी में चोट आ गई। द्रौपदी ने उस समय अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उँगली पर पट्टी बाँध दी। यह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। श्रीकृष्ण ने इस उपकार का बदला बाद में चीरहरण के समय उनकी साड़ी को बढ़ाकर चुकाया। इस तरह राखी के दो धागों से भाई-बहन का ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवीय संवेदनाओं का गहरा नाता रहा है।

राखी के त्योहार का ज्यादा महत्व पहले उत्तर भारत में था। आज यह पूरे भारत में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इसे नारली पूर्णिमा के नाम से मनाया जाता है। लोग समुद्र मंे वरुण राजा को नारियल दान करते हैं। नारियल के तीन आंखों को भगवान शिव की तीन आंखें मानते हैं। दक्षिण भारत में इसे अवनी अविट्टम के नाम से जाना जाता है। स्कन्ध पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार नामक कथा में रक्षाबन्धन का प्रसंग मिलता है। कथा कुछ इस प्रकार है- दानवेन्द्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्न किया तो इन्द्र आदि देवताओं में खलबली मच गयी और वे सभी भगवान विष्णु से प्रार्थना करने पहुंचे। तब भगवान वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा माँगने पहुँचे। गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी। भगवान ने तीन पग में सारा आकाश पाताल और धरती नापकर राजा बलि को रसातल में भेज दिया। इस प्रकार भगवान विष्णु द्वारा बलि राजा के अभिमान को चकनाचूर कर देने के कारण यह पर्व बलेव नाम से भी प्रसिद्ध है।

राखी के बारे में प्रचलित ये कथाएं सोचने पर विवश कर देती हैं कि कितने महान उसूलों और मानवीय संवेदनाओं वाले थे वे लोग, जिनकी देखादेखी एक संपूर्ण परंपरा ने जन्म ले लिया और आज तक बदस्तूर जारी है। आज परंपरा भले ही चली आ रही है लेकिन उसमें भावना और प्यार की वह गहराई नहीं दिखायी देती। अब उसमें प्रदर्शन का घुन लग गया है। पर्व को सादगी से मनाने की बजाय बहनें अपनी सज-धज की चिंता और भाई से राखी के बहाने कुछ मिलने के लालच में ज्यादा लगी रहती हैं। भाई भी उसकी रक्षा और संकट हरने की प्रतिज्ञा लेने की बजाय जेब हल्की कर इतिश्री समझ लेता है। अब राखी में भाई-बहन के प्यार का वह ज्वार नहीं दिखायी देता जो शायद कभी रहा होगा। इसलिए राखी के इस परम पावन पर्व पर भाइयों को ईमानदारी से पुनः अपनी बहन ही नहीं बल्कि संपूर्ण नारी जगत की सुरक्षा और सम्मान करने की कसम लेने की अपेक्षा है। तभी राखी का यह पर्व सार्थक बन पड़ेगा और भाई-बहन का प्यार शाश्वत रह पायेगा। 

- ललित गर्ग

लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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