मतलबी रिश्तों का महासंग्राम (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | May 08, 2025

पहले रिश्ते नाजुक शीशे की तरह होते थे, जिन्हें लोग सहेजकर रखते थे। अब रिश्ते मजबूत प्लास्टिक की तरह हो गए हैं—मोच खा जाएँ तो गरम हवा में सीधा कर लो, टूट जाएँ तो दो नए ले आओ। समय बदल गया है, भाईसाहब! अब रिश्ते भावनाओं से नहीं, सुविधाओं से संचालित होते हैं।

एक बार गाँव के पंडित जी ने कहा था—"रिश्ते भगवान के वरदान होते हैं।" अब पंडित जी को कौन बताए कि भगवान भी अब डिजिटल हो गया है। रिश्ते ई-वॉलेट में सेव रहते हैं, ज़रूरत पड़ी तो उपयोग कर लो। मोहल्ले के शर्मा जी ने पड़ोसी गुप्ता जी से दस हज़ार उधार लिए थे। जब तक पैसे थे, शर्मा जी गुप्ता जी को "भैया" कहकर पान खिलाते थे। पैसे लौटाने की बारी आई तो शर्मा जी ने नया रिश्ता खोज लिया—"आप तो हमारे समधी तुल्य हैं!" गुप्ता जी समझ ही नहीं पाए कि कब भैया से समधी बन गए।

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मोबाइल में सेव रिश्तों की सूची अब नाम के अनुसार नहीं, उपयोगिता के अनुसार वर्गीकृत होती है। "कार के लिए मामा", "नौकरी के लिए फूफा", "फ्री ट्रीट के लिए दोस्त", और "सोशल मीडिया लाइक्स के लिए कज़िन"—ये आधुनिक रिश्तों के नए नाम हैं। किसी रिश्ते में भावनाएँ खोजने जाओ तो गूगल भी कहेगा—"404! इमोशन नॉट फाउंड!"

बात इतनी बिगड़ गई है कि अब लोग रिश्तों को किसी भी किराए के सामान की तरह देखते हैं। माँ-बाप तब तक आदरणीय हैं जब तक बैंक बैलेंस अच्छा है, दोस्त तब तक प्रिय हैं जब तक पार्टी दे सकते हैं, और भाई-बहन तब तक शुभचिंतक हैं जब तक संपत्ति का बंटवारा नहीं हुआ। अगर आधुनिक रिश्तों का कोई घोषणापत्र बने, तो उसमें पहला नियम यही होगा—"लाभ दिखाओ, तब तक टिके रहो।"

समाज का हाल यह है कि रिश्ते अब भावनाओं का चुम्बकीय क्षेत्र नहीं रहे, बल्कि सुविधाओं की कुर्सी हैं, जिसे ज़रूरत के हिसाब से खींचो और फिर किनारे कर दो। यही है 21वीं सदी के मतलबी रिश्तों का महासंग्राम—जहाँ हर कोई जीतना चाहता है, और हारने वाला अकेला रह जाता है।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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