गुरु का उचित न्याय (बाल कहानी)

By संतोष उत्सुक | Jul 31, 2026

यह उस समय की बात है जब पढाई में कमज़ोर विद्यार्थियों को उनके शिक्षक घर बुलाकर या विद्यालय में ही समय निकाल कर अलग से पढ़ाया करते थे। उन विद्यार्थियों से कोई टयूशन फीस भी नहीं ली जाती थी। उन दिनों स्कूल में बच्चों की पिटाई भी होती थी मगर माता पिता को कोई खबर नहीं दी जाती थी। किसी तरह बात अगर घर तक पहुंच भी जाती तो कितनी ही बार अभिभावक खुद स्कूल जाकर अध्यापक का धन्यवाद करते थे। गलती करने पर विद्यार्थियों को घर पर अलग से डांट पड़ती थी। 

एक दिन की घटना है उस समय गणित का पीरियड चल रहा था, गुरूजी द्वारा कई बार समझाने और बार बार खुद कोशिश करने के बावजूद भी एक विद्यार्थी सवाल हल नहीं कर पा रहा था। इत्तफाक से उस दिन अध्यापक का मूड भी कुछ ठीक नहीं था, शायद इसलिए उन्हें उस विद्यार्थी पर गुस्सा आ गया। उनकी कक्षा खत्म होने के बाद आधी छुट्टी होनी थी जिसमें सभी ने मिल बैठकर खाना खाना था। गुरूजी ने यह फैसला लेते हुए कि उस विद्यार्थी की पिटाई करनी है क्लास मानीटर से कहा, ‘मानीटर जाओ एक डंडा लेकर आओ, आज मैं इसकी खबर लेता हूं’। मानीटर डंडा लेने कक्षा से बाहर गया और जल्दी से लकड़ी का छोटा सा कमज़ोर, पतला टुकड़ा ले आया और बोला, ‘लीजिए गुरूजी ’। 

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शिक्षक को लकड़ी का टुकड़ा देखते ही गुस्सा आ गया, ‘इससे कहीं सज़ा मिलती है, देखो मैं तुमको ही लगाता हूं’ यह कहते हुए उन्होंने वह डंडा मानीटर  को ही लगा दिया और बोले, ‘जाओ जाकर दूसरा डंडा लेकर आओ'। मानीटर फिर भागा डंडा लेने के लिए, उसे थोड़ा समय लग गया और इस बार पुराने स्टूल की टूटी हुई टांग ले आया। उसे लगा इस बार बढ़िया डंडा लाने के लिए गुरूजी उसे शाबाशी देंगे लेकिन जैसे ही मोटी लकड़ी को अध्यापक ने हाथ में पकड़ा उनका गुस्सा बढ़ गया और मानीटर की टांग पर लगभग जोर से मारने का अभिनय करते हुए बोले, ‘मानीटर, क्या तुम इसके दुश्मन हो जो इतना मोटा डंडा लाए हो’। अब मानीटर घबरा गया उसे लगा अब पिटने की उसकी बारी है। 


गुरूजी ने वह लकड़ी मेज़ पर रख दी और कुछ क्षणों के लिए मौन रहने के बाद बोले, ‘बच्चो, आपने देखा जब मानीटर पतला डंडा लाया तब भी उसे डांट पड़ी और जब ज्यादा मोटा लाया तब भी, मेरा आशय किसी विद्यार्थी को पीटना नहीं था बल्कि समझाना कि गलती करने वाले को उचित सज़ा मिले, न कम न ज्यादा’। 

उन्होंने उस विद्यार्थी से कहा कि वह घर जाकर अभ्यास करे और यदि उसे फिर भी समझ न आए तो रोज़ाना पढने के लिए, छुट्टी के बाद उनके घर आ जाया करे। अध्यापक ने पूरी क्लास को संबोधित करते हुए कहा कि जिस बच्चे को भी गणित विषय में कुछ समझ न आ रहा हो वह भी आ सकता है। खाना खाने की छुट्टी की घंटी बज चुकी थी, वह बच्चा जिससे सवाल हल नहीं हो रहा था वह पिटाई से बच गया लेकिन उसे और पूरी कक्षा को शिक्षा मिली।

खाना खाते समय सब यही बात कर रहे थे कि यदि गुरूजी चाहते तो सज़ा दे सकते थे लेकिन उन्होंने बिना ऐसा किए मानीटर समेत सभी विद्यार्थियों को अच्छे से समझा दिया। 

- संतोष उत्सुक

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