By नीरज कुमार दुबे | Jan 14, 2026
सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा है कि क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति में हो रहे बदलावों को देखते हुए भारत एक ‘रॉकेट-सह-प्रक्षेपास्त्र’ बल गठित करने पर विचार कर रहा है, क्योंकि चीन और पाकिस्तान दोनों के पास इसी तरह की इकाइयां हैं। उन्होंने कहा, ‘‘हमारे पास भी ऐसे ही एक बल का होना समय की मांग है।’’ उन्होंने कहा कि इसके तहत बड़ी संख्या में ड्रोन, मिसाइल और वायु रक्षा हथियार शामिल किये जाएंगे। सेना प्रमुख ने कहा, ‘‘हम रॉकेट मिसाइल बल स्थापित किए जाने की दिशा में काम कर रहे हैं। पाकिस्तान ने रॉकेट बल स्थापित कर लिया है और चीन ने भी ऐसा ही एक बल बनाया है।’’ हम आपको बता दें कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) रॉकेट बल (पीएलएआरएफ) को देश की सेना का एक अत्यंत शक्तिशाली अंग माना जाता है। चीन 2016 से लगातार पीएलएआरएफ की युद्ध क्षमता को बढ़ा रहा है।
इसके साथ ही यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों ने भी यह साफ कर दिया है कि भविष्य का युद्ध बिना सीधे संपर्क का होगा। जमीन पर आमने सामने की लड़ाई अब पीछे छूट रही है और उसकी जगह मिसाइल रॉकेट और ड्रोन निर्णायक हथियार बन चुके हैं। इसी बदले हुए वैश्विक परिदृश्य में भारत भी अब एक बड़े सामरिक फैसले की ओर बढ़ता दिख रहा है। सीमा पर पाकिस्तान और चीन जैसे दो आक्रामक पड़ोसियों के बीच भारत अब राकेट कम मिसाइल फोर्स के गठन पर गंभीरता से विचार कर रहा है। थलसेना प्रमुख उपेन्द्र द्विवेदी का इस संबंध में आया बयान केवल एक विचार नहीं बल्कि आने वाले युद्धक्षेत्र की सच्चाई को स्वीकार करने जैसा है।
देखा जाये तो फिलहाल भारत में मिसाइल और रॉकेटों का संचालन सेना की वायु रक्षा शाखा और तोपखाना रेजिमेंटों के अधीन है। लेकिन आधुनिक युद्ध में रॉकेट और मिसाइल एक दूसरे के पूरक बन चुके हैं। इसलिए सेना प्रमुख ने साफ कहा है कि प्रभाव पैदा करने के लिए दोनों का एकीकृत कमान में होना आवश्यक है। हम आपको बता दें कि भारत के पास अग्नि, ब्रह्मोस, पृथ्वी, प्रलय जैसी स्वदेशी और संयुक्त रूप से विकसित मिसाइलों का मजबूत जखीरा है। हाल ही में 120 किलोमीटर तक मार करने वाले पिनाका निर्देशित राकेट का सफल परीक्षण भी हुआ है। सेना प्रमुख के अनुसार 300 से 450 किलोमीटर दूरी तक मार करने वाली प्रणालियों के अनुबंध पहले ही हो चुके हैं।
उधर, चीन और पाकिस्तान दोनों ने मिसाइल शक्ति को अपनी सैन्य रीढ़ बना लिया है। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी रॉकेट फोर्स न केवल पारंपरिक बल्कि परमाणु मिसाइलों का भी संचालन करती है। एक अमेरिकी रक्षा रिपोर्ट के अनुसार चीन के पास 1250 से अधिक बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें हैं और उसके परमाणु हथियारों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। पाकिस्तान ने भी ऑपरेशन सिंदूर के बाद अपनी कमजोरी उजागर होते देख जल्दबाजी में आर्मी रॉकेट फोर्स कमांड का गठन किया। यह इकाई चीन की तर्ज पर बनाई गई है ताकि सीमित समय के संघर्ष में संतृप्ति हमलों के जरिये भारत पर दबाव बनाया जा सके। हालांकि सच्चाई यह है कि गुणवत्ता और दूरी, दोनों मामलों में भारत पाकिस्तान से काफी आगे है। फिर भी छोटे लेकिन तीव्र युद्ध में यह नई पाकिस्तानी इकाई अस्थायी चुनौती जरूर बन सकती है।
इसके अलावा, जहां चीन की मिसाइल क्षमता भारत से आगे है वहीं ईरान का मॉडल भारत के लिए उपयोगी सबक देता है। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स एयरोस्पेस फोर्स वर्ष 2009 में स्थापित हुई थी और यह नियमित वायुसेना से अलग काम करती है। इसके पास बैलिस्टिक हाइपरसोनिक और क्रूज मिसाइलों के साथ ड्रोन युद्ध की क्षमता भी है। पिछले वर्ष इजराइल के साथ सीमित संघर्ष में ईरान की इस शक्ति ने अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया जब उसके मिसाइल हमलों ने आयरन डोम को भेदते हुए महत्वपूर्ण लक्ष्यों को नुकसान पहुंचाया। ईरान की सबसे बड़ी ताकत उसकी भूमिगत सुरंगें हैं जहां मिसाइलें सुरक्षित रखी जाती हैं और छिपे हुए स्थानों से प्रक्षेपित होती हैं। अमेरिकी आकलन के अनुसार ईरान के पास लगभग 3000 बैलिस्टिक मिसाइलें हैं जो पश्चिम एशिया में सबसे बड़ा जखीरा है। यही मिसाइल शक्ति अब ईरान के लिए राजनीतिक और सैन्य दबाव का एक प्रभावी हथियार बन चुकी है खासकर ऐसे समय में जब अमेरिका और आंतरिक अस्थिरता का दबाव बना हुआ है।
देखा जाये तो भारत के लिए रॉकेट कम मिसाइल फोर्स केवल एक नई सैन्य इकाई नहीं बल्कि रणनीतिक संतुलन का औजार होगी। इससे एकीकृत कमान संभव होगी, निर्णय प्रक्रिया तेज होगी और सीमित समय में निर्णायक प्रहार किया जा सकेगा। चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा और पाकिस्तान के साथ पश्चिमी सीमा पर यह बल भारत को पहले प्रहार और प्रतिरोध दोनों में बढ़त देगा। इसके साथ ही वायुसेना और थलसेना के बीच संसाधनों की खींचतान समाप्त हो सकती है। मिसाइलों का केंद्रीकृत नियंत्रण युद्धकाल में भ्रम और देरी को कम करेगा। यह भारत को उस दिशा में ले जाएगा जहां युद्ध कम समय का होगा लेकिन प्रभाव अत्यंत तीव्र।
बहरहाल, भारत अब उस मोड़ पर खड़ा है जहां आधे अधूरे सुधारों से काम नहीं चलेगा। रॉकेट कम मिसाइल फोर्स का गठन किसी एक देश को जवाब देने के लिए नहीं बल्कि भविष्य के युद्ध को समझने की आवश्यकता है। यूक्रेन से पश्चिम एशिया तक हर संघर्ष ने दिखाया है कि जो देश मिसाइल और ड्रोन में आगे है वही युद्ध की शर्तें तय करता है। भारत को न केवल यह बल बनाना चाहिए बल्कि स्वदेशी तकनीक भूमिगत संरचना और त्वरित निर्णय प्रणाली पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।