By नीरज कुमार दुबे | Jan 22, 2026
दुनिया की कूटनीति एक बार फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इर्द गिर्द घूमने लगी है। इस बार कारण है उनका नया और विवादास्पद प्रस्ताव बोर्ड ऑफ पीस। देखा जाये तो इस बोर्ड के नाम में भले पीस शब्द हो लेकिन इसने दुनिया भर के नेताओं के मन में अशांति पैदा कर दी है। उल्लेखनीय है कि ट्रंप ने इस प्रस्ताव को गाजा में स्थायी युद्धविराम, पुनर्निर्माण और दीर्घकालिक शांति की निगरानी के लिए पेश किया है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह बोर्ड अब केवल गाजा तक सीमित नहीं रहा। यह पहल धीरे धीरे एक ऐसे वैश्विक मंच का रूप ले रही है जो संयुक्त राष्ट्र जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका को सीधी चुनौती देती दिखाई देती है।
हम आपको बता दें कि बोर्ड ऑफ पीस ट्रंप की बीस सूत्रीय गाजा शांति योजना का केन्द्रीय स्तम्भ है। इस बोर्ड में शामिल होने के लिए दुनिया भर के दर्जनों देशों को न्योता दिया गया है। खास बात यह है कि ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि इस बोर्ड की स्थायी सदस्यता के लिए न्यूनतम एक अरब डॉलर का योगदान अनिवार्य होगा। यानी शांति में भागीदारी अब नैतिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि आर्थिक हैसियत से तय होगी।
अब तक मध्य पूर्व और एशिया के कई देशों ने इस बोर्ड में शामिल होने की हामी भरी है। सऊदी अरब, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, जॉर्डन, तुर्की, इंडोनेशिया और पाकिस्तान जैसे देशों ने इस पहल को समर्थन देने का संकेत दिया है। इनके अलावा कुछ अफ्रीकी और मध्य एशियाई देशों ने भी भागीदारी के संकेत दिए हैं। इन देशों का तर्क है कि संयुक्त राष्ट्र की जटिल और धीमी प्रक्रियाओं के मुकाबले ट्रंप का मॉडल तेज और निर्णायक साबित हो सकता है।
मगर यूरोप में इस बोर्ड को लेकर तस्वीर बिल्कुल उलटी है। फ्रांस, नॉर्वे, स्वीडन और स्लोवेनिया जैसे देशों ने साफ शब्दों में कहा है कि वह किसी ऐसे मंच का हिस्सा नहीं बनेंगे जो अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र की वैधता को कमजोर करे। जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देश खुले तौर पर विरोध नहीं कर रहे लेकिन वह भी इस प्रस्ताव को लेकर असमंजस में हैं। इस तरह यूरोप दो खेमों में बंटता नजर आ रहा है, एक खेमा इसे अमेरिका केंद्रित शक्ति प्रदर्शन मानता है तो दूसरा इसे व्यावहारिक समाधान के रूप में देखने की कोशिश कर रहा है।
वहीं भारत का रुख अब तक संतुलित और सावधान रहा है। भारत को बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का निमंत्रण जरूर मिला है लेकिन नई दिल्ली ने अभी तक कोई स्पष्ट सहमति नहीं दी है। भारत परंपरागत रूप से संयुक्त राष्ट्र आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था का समर्थक रहा है। भारत इस बात का आकलन कर रहा है कि यह बोर्ड वास्तव में शांति का माध्यम बनेगा या केवल राजनीतिक दबाव और प्रभाव का नया औजार।
इसी बीच, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का बयान इस पूरे घटनाक्रम को और जटिल बना देता है। पुतिन ने कहा है कि अमेरिका में फ्रीज रूसी संपत्तियों में से एक अरब डॉलर बोर्ड ऑफ पीस को दिए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह रकम गाजा में युद्धविराम और पुनर्निर्माण की निगरानी के लिए इस्तेमाल की जा सकती है। पुतिन ने यह भी कहा कि बाकी फ्रीज संपत्तियों का उपयोग यूक्रेन में युद्ध समाप्त होने के बाद वहां के पुनर्निर्माण के लिए किया जा सकता है।
देखा जाये तो पुतिन का यह प्रस्ताव केवल उदारता नहीं बल्कि एक सोची समझी रणनीति है। दरअसल, अमेरिका में रूस की चार से पांच अरब डॉलर की संपत्ति फ्रीज है जो यूक्रेन के पुनर्निर्माण की जरूरतों के सामने नगण्य है। पुतिन का असली उद्देश्य ट्रंप को यह संदेश देना है कि रूस टकराव नहीं बल्कि सौदेबाजी चाहता है। यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब ट्रंप रूस और यूक्रेन दोनों पर शांति प्रक्रिया में बाधा डालने के आरोप लगा चुके हैं और रूस के व्यापारिक साझेदारों पर नए प्रतिबंधों की धमकी भी दे चुके हैं। पुतिन ने साथ ही यह भी कहा है कि अमेरिका की अगुवाई वाले ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने पर कोई भी फैसला रणनीतिक साझेदारों से परामर्श के बाद ही लिया जाएगा। पुतिन ने बताया है कि रूस को भेजे गए प्रस्ताव में पश्चिम एशिया में समझौते, फिलस्तीन के लोगों की समस्याओं के संभावित समाधान खोजने तथा गाजा पट्टी में सबसे गंभीर मानवीय संकट को हल करने जैसी बातें प्रमुख हैं। उन्होंने कहा, ''इस संदर्भ में, मैं सबसे महत्वपूर्ण बिंदु पर जोर देना चाहूंगा। अहम बात यह है कि पूरी प्रक्रिया फिलस्तीन-इजराइली संघर्ष के दीर्घकालिक समाधान पर सकारात्मक प्रभाव डालने वाली हो और यह संयुक्त राष्ट्र के संबंधित निर्णयों के आधार पर हो।’’
देखा जाये तो ट्रंप का बोर्ड ऑफ पीस दरअसल शांति से ज्यादा शक्ति की राजनीति का नया प्रयोग है। यह पहल यह साफ करती है कि 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति में शांति भी अब बाजार के नियमों पर चलेगी। जिसके पास पैसा है वही शांति की मेज पर बैठेगा और जिसके पास पैसा नहीं वह केवल फैसलों का पालन करेगा।
संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी सार्वभौमिकता रही है। वहां छोटे और बड़े देश एक ही मंच पर खड़े होते हैं। ट्रंप का बोर्ड इस अवधारणा को उलट देता है। यहां स्थायी सदस्यता धन से खरीदी जा सकती है। यह मॉडल अंतरराष्ट्रीय राजनीति को नैतिकता से हटाकर खुले सौदेबाजी के रास्ते पर ले जाता है।
यूरोप का विरोध इसी डर से पैदा हुआ है। फ्रांस और नॉर्डिक देशों को आशंका है कि अगर बोर्ड ऑफ पीस को वैधता मिल गई तो संयुक्त राष्ट्र केवल एक औपचारिक संस्था बनकर रह जाएगी। इसके उलट मध्य पूर्व के कई देश इसे अवसर के रूप में देख रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इस मंच के जरिये वे सीधे अमेरिका के साथ अपने हित साध सकते हैं।
भारत के लिए यह स्थिति बेहद नाजुक है। एक ओर वह वैश्विक मंचों पर बड़ी भूमिका चाहता है तो दूसरी ओर वह किसी ऐसे ढांचे का हिस्सा नहीं बनना चाहता जो नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को कमजोर करे। भारत का झुकाव फिलहाल प्रतीक्षा और मूल्यांकन की नीति की ओर दिखता है।
रूस की भूमिका इस पूरे खेल को और खतरनाक बना देती है। पुतिन बोर्ड ऑफ पीस को शांति मंच से ज्यादा सौदेबाजी के मंच के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं। उनका प्रस्ताव यह दिखाता है कि वह फ्रीज संपत्तियों को भी कूटनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने को तैयार हैं। यह कदम रूस को प्रतिबंधों से राहत दिलाने की कोशिश भी है और अमेरिका के साथ सीधा संवाद बनाने की चाल भी।
बहरहाल, सवाल यह है कि क्या बोर्ड ऑफ पीस वास्तव में शांति ला पाएगा या यह दुनिया को नए ध्रुवों में बांट देगा। फिलहाल जो संकेत हैं वह बताते हैं कि यह बोर्ड शांति से ज्यादा शक्ति संतुलन को बदलने का औजार बन सकता है। ट्रंप की यह पहल दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि आने वाले समय में शांति किसी सिद्धांत से नहीं बल्कि सौदे से तय होगी।
-नीरज कुमार दुबे