तत्काल स्वास्थ्य लाभ के चक्कर में डॉक्टर शॉपिंग का नया चलन

By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | Jul 23, 2026

समय के साथ सोच में एक बड़ा बदलाव तेजी से यह देखने में आ रहा है कि यदि जुखाम, बुखार, खांसी जैसी सामान्य बीमारी में भी डॉक्टर की दवा से तत्काल राहत नहीं मिलती तो अब डॉक्टर बदलने में कोई गुरेज नहीं होता। देखा जाएं तो तुरंत स्वास्थ्य लाभ की प्रवृति के कारण डॉक्टर के ईलाज पर विश्वास में कहीं ना कहीं कमी देखने में आने लगी है और इसके परिणाम स्वरुप महानगरों में डॉक्टर शापिंग का नया ही चलन चलने लगा है। खासतौर से मरीज से मिलने-मिलाने वाले चिकित्सक बदलने की सलाह देने में किसी तरह का कोई गुरेज नहीं करते। चिकित्सक बदलने में कोई बुराई नहीं है पर जिस चिकित्सक से ईलाज करवा रहे हैं उससे बीमारी ठीक होने की संभावना के संबंध में चर्चा करना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। अन्य चिकित्सक की सलाह लेना और चिकित्सक बदलने में हमें अंतर करके चलना होगा। बीच ईलाज ही बार बार डाक्टर बदलने के कई साइड इफेक्ट से भी दो चार होना पड़ता है और कई बार तो डॉक्टर बदलने का यह प्रयोग ईलाज पर विपरीत प्रभाव और गंभीर संकट में डाल देता है। मिसाल के तौर पर सामान्य खांसी की बीमारी या पेट में गड़बड़ या वाइरल बुखार होने पर जब डॉक्टर द्वारा दवा का जो कोर्स दिया जाता है उसके पूरा होने के पहले ही यानी की मान लो पांच दिन का कोर्स दिया है तो तीसरे दिन ही अधीर होकर दूसरे डॉक्टर की शरण में जाना आम होता जा रहा है। हांलाकि यह प्रवृति कुछ ही लोगों में है पर महानगरों और बड़े शहरों में इस तरह की प्रवृति जिस तेजी से बढ़ती जा रही है वह गंभीर चिंता का सबब बनती जा रही है। चिकित्सकीय भाषा में कहा जाए तो यह प्रवृति शापिंग का एक नया रुप डॉक्टर शापिंग के रुप में तेजी से फैलती जा रही है। हो यह रहा है कि इसके साइड इफेक्ट से अनजान होकर आगे बढ़ रहे है। 

इसे भी पढ़ें: स्वास्थ्यकर्मियों से मारपीट पर नहीं चलेगा रौब! Bombay HC के आदेश पर Corporator Ramesh Mhatre ने किया सरेंडर

हो यह रहा है कि जब कोई मरीज यह महसूस करता है कि चिकित्सक की दवा से उसकी बीमारी में तेजी से सुधार नहीं हो रहा तो वह ईलाज के बीच ही दूसरे डॉक्टर की शरण में चले जाता है। खासतौर से यह प्रवृति महानगरों और बड़े शहरों में अधिक तेजी से फैल रही है। इसका कारण यह है कि आज सलाहकारों की लंबी फौज होने के साथ ही रोगी या रोगी के परिजन मैजिक टच की सोच रखने लगे हैं। दूसरा यह कि अब चिकित्सा सुविधा का भी तेजी से विस्तार हुआ है। निजी और सरकारी क्षेत्र में चिकित्सा सुविधा की सहज उपलब्धता होने के साथ ही मेडिक्लेम जैसी सुविधाएं प्राप्त होने लगी है। सरकारी और निजी विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता के कारण भी यह होने लगा है। बीमारी चाहे सामान्य हो या गंभीर तत्काल सुधार नहीं दिखने पर दूसरे डॉक्टर को दिखाने चले जाते हैं और डाक्टर बदलने का तत्काल जो प्रभाव पड़ता है वह रीसेट बटन होता है यानी कि दूसरा डॉक्टर फिर अपने तरीके से पहले जॉचों का सिलसिला आरंभ करते हैं क्योंकि पहले की डॉक्टर द्वारा कराई गई जांचों में किसी ना किसी तरह की कमी या अन्य कारण बता कर दुबारा से जांचें करवानी पड़ती है। इसके लिए रक्त जांच से लेकर रोग के अनुसार एक्सरे, एमआरआई या अन्य तरह की जांचें भी हो सकती है। इससे बार बार जांच और एक्सरे किरणों से दो चार होने के साथ ही रुपये पैसे का भार भी पड़ता है। एक तरह से बीमारी के पहचान की नए सिरे से प्रक्रिया आरंभ होती है। दवा का नया सिलसिला आरंभ होता है और पूर्व में चल रही एंटिबायोटिक या अन्य दवाओं के स्थान पर जेनेरिक दवाओं के ही दूसरे ब्राण्ड की दवा दी जाती है व कई बार तो पॉली फार्मेंसी जैसी स्थिति हो जाती है। दवाओं के असर पर विपरीत प्रभाव की संभावनाओं से भी नहीं नकारा जा सकता। ऐसे में सुधार के स्थान पर जटिलताओं की संभावनाओं से नहीं नकारा जा सकता। 

डॉक्टर शापिंग के इस दौर में अन्य चिकित्सक की विशेषज्ञ सलाह लेने और चिकित्सक बदलने में हमें अंतर करना होगा। अन्य विशेषज्ञ की सलाह को तो ईलाज कर रहे चिकित्सक को विश्वास में लेकर लेने से ईलाज में और अधिक सकारात्मकता आती है पर बार बार चिकित्सक बदलना उचित नहीं माना जा सकता। होना यह चाहिए कि जिस चिकित्सक का ईलाज चल रहा है उससे ईलाज के संबंध में स्वयं रोगी या परिजनों द्वारा बीमारी और उसके ईलाज को लेकर विस्तार से चर्चा की जानी चाहिए। यह भी मालूम कर लेना चाहिए कि दवा का असर किस तरह का और कितने समय में दवा असर दिखाना शुरु कर देगी। चिकित्सक को भी मरीज को विश्वास में लेकर आवश्यक सभी जानकारी दे देनी चाहिए, जिससे ईलाज को लेकर किसी तरह के भ्रम के हालात ना रहे। अन्य चिकित्सक से प्राप्त की गई विशेषज्ञ सलाह को भी ईलाज कर रहे चिकित्सक से साझा कर लेना चाहिए। ईलाज कर रहे चिकित्सक की सलाह या रेफर करने पर ही अन्य चिकित्सक की और रुख करना चाहिए। नए चिकित्सक को भी रोगी का रोग कार्ड से पूरी तरह अवगत होते हुए क्या दवा चल रही है? कब से चल रही है? और रोगी के रोग का इतिहास से अवगत कराना चाहिए। डॉक्टर शापिंग को फैशन के रुप में नहीं लिया जाना चाहिए अन्यथा अनावश्यक जांचों, दवाओं, डाक्टरों की नित नई फीस आदि का नुकसान तो उठाना पड़ता ही है। इसके साथ ही अन्य दुष्परिणामों से नहीं नकारा जा सकता।

- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

प्रमुख खबरें

Paper Leak Case: सरकार सीधे हमसे बात करे, Jantar Mantar पर मीटिंग के लिए तैयार CJP नेता Sourav Das

KTR ने CM Revanth Reddy को भेजा Defamation Notice, परीक्षा गड़बड़ी में नाम घसीटने पर छिड़ी कानूनी जंग

हिंसा से समाधान नहीं: Anna Hazare ने Police लाठीचार्ज को बताया गलत, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग की

अपनी पर आ गए यमन के हूती, बीच समुंदर तेल टैंकर को फूंक डाला, तड़प उठा सऊदी