By उमेश चतुर्वेदी | Feb 26, 2026
विरोध और मतभिन्नता लोकतंत्र का आभूषण होता है। लेकिन विरोध का तरीका क्या हो या फिर किस जगह पर हो, इसकी समझ होनी चाहिए। कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी है। स्वाधीनता आंदोलन के साथ-साथ इतिहास के हर आगे बढ़ते पग के साथ कांग्रेस आगे बढ़ती रही है। विरोधी आंदोलन चलाने का स्वाधीनता के पहले उसका लंबा इतिहास रहा। आजादी के बाद सबसे ज्यादा वक्त शासन का अनुभव भी उसी के पास है। इस वजह से उससे लोकतांत्रिक विरोध के तरीकों और विरोध के लिए चुने जाने वाले मंचों को लेकर विशेष उम्मीद रखना बेमानी नहीं है। शायद यही वजह है कि इंडिया एआई इम्पैक्ट सम्मेलन में उसकी ओर से किए गए विरोध प्रदर्शनों को राष्ट्रीय समर्थन मिलता नहीं दिख रहा। पूर्व पत्रकार पवन खेड़ा जैसा प्रवक्ता 20 फरवरी के विरोध प्रदर्शन को चाहे जितना भी वाजिब ठहरा रहा हो, कांग्रेस की इस विरोध प्रदर्शन के लिए किरकिरी ही हो रही है।
संसद से लेकर सड़क तक ज्यादातर मुद्दों पर भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ कांग्रेस का साथ देने वाले ज्यादातर विपक्षी दलों को भी युवा कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन नहीं रूचा है। ज्यादातर विपक्षी दलों ने इस प्रदर्शन को अनुचित बताया है। अखिलेश यादव ने शायद सबसे गंभीर बात कही है। उन्होंने कहा है कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन वैश्विक मंच पर ऐसा विरोध प्रदर्शन उचित नहीं था। अखिलेश यहीं तक नहीं रूके, उन्होंने कांग्रेस को एक तरह से नसीहत देते हुए कहा कि देश को विदेशी प्रतिनिधियों के सामने शर्मिंदा करने से बचना चाहिए। कांग्रेस के साथ हर मुमकिन मौके पर गलबहियां डालकर चलने वाले राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सदस्य मनोज झा ने भी एक तरह से कांग्रेस को उपदेश ही दिया है। मनोज झा का कहना है कि शिकायतें हो सकती हैं, लेकिन विरोध का तरीका बेहतर हो सकता है।
ऐसा नहीं कि भारतीय लोकतंत्र में विरोध की परंपरा नहीं रही है। भारतीय राजनीति के चिर विद्रोही कहे जाने वाले लोहिया ने विरोध करने का जो मुहावरा दिया, वह भारतीय राजनीति का सर्वस्वीकार्य रहा है। उन्होंने संसद से सड़क तक विरोध का तरीका बताया। लोहियावादी विरोध कई मायनों में आक्रामक ही कहा जाएगा। लेकिन विरोध कब और कहां किया जाना चाहिए, उसकी जगह क्या होनी चाहिए, इसे लेकर भी भारतीय राजनीति में आमराय रही है। विरोध के मंच ऐसे नहीं होने चाहिए, जिससे भारत की एक राष्ट्र के रूप में वैश्विक शर्मिंदगी उठानी पड़े। इस सूत्र वाक्य को भारतीय राजनीति अपनाती रही है। लेकिन नई दिल्ली के भारत मंडपम में बीस फरवरी को युवा कांग्रेस की ओर से किया गया विरोध प्रदर्शन इस सूत्र वाक्य का एक तरह से उल्लंघन ही माना जाएगा। शायद यही वजह है कि कांग्रेस के समर्थक और साथी दल इसकी आलोचना कर रहे हैं या फिर कांग्रेस को नसीहत दे रहे हैं।
जिस इंडिया एआई इम्पैक्ट सम्मेलन के मंच का इस्तेमाल युवा कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी के विरोध के लिए किया, उसमें दुनिया भर के 118 देशों के सरकारी प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। 16 फरवरी से 21 फरवरी तक चले इस सम्मेलन में 22 देशों के शासनाध्यक्षों और मंत्री स्तर के 59 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन के बाद जो नई दिल्ली घोषणापत्र जारी किया गया, उस पर 88 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने हस्ताक्षर करके अपनी सहमति जताई है। जिसमें अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस जैसे प्रमुख देशों की भी भागीदारी है। इस सम्मेलन में 100 से अधिक वैश्विक स्तर के एआई नेता और 500 से अधिक स्टार्टअप्स ने भी शिरकत की। इस सम्मेलन की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस के घोषणा पत्र में अमेरिका और ब्रिटेन ने भी हस्ताक्षर किए हैं। इससे पहले पेरिस में हुए एआई वैश्विक सम्मेलन के बाद जारी घोषणा पत्र में अमेरिका और ब्रिटेन ने हस्ताक्षर नहीं किया था। जबकि पूरी दुनिया जानती है कि वैश्विक मामलों में फ्रांस, अमेरिका और ब्रिटेन एक ही खेमे के देश हैं। जाहिर है कि ऐसे मंच का महज प्रधानमंत्री के विरोध के लिए इस्तेमाल करना सही कदम नहीं माना जाएगा।
भले ही इस विरोध प्रदर्शन को मायावती भी अनुचित बता चुकी हों, वाईएसआर कांग्रेस के नेता जगनमोहन रेड्डी गलत बता चुके हों, फिर भी कांग्रेस द्वारा इसे वाजिब ठहराया जाना साबित करता है कि पार्टी के केंद्रीय ढांचे में उचित-अनुचित का भेद करने वाली शख्सियतों की कमी हो गई है। कांग्रेस के इस विरोध प्रदर्शन को विपक्षी खेमे में ही उसकी सत्ता से दूरी से उपजी हताशा को माना जा रहा है। लेकिन विपक्षी खेमा इसके लिए कांग्रेस के नेतृत्व को ही जिम्मेदार ठहराता है। कांग्रेस के कुछ अंदरूनी नेता भी मानते हैं कि राहुल गांधी की अगुआई वाली कांग्रेस के केंद्रीय घेरे में दूरगामी सोच वाले नेताओं की बहुत कमी हो गई है। इसलिए पार्टी में एकाधिकारवादी और बेपरवाह सोच हावी होती गई है। विपक्षी खेमे के साथ ही पार्टी के कुछ लोग मानते हैं कि अगर पिछले आम चुनाव से पहले नीतीश कुमार को राहुल की अगुआई वाली कांग्रेस ने अपना नेता मान लिया होता या फिर इंडिया गठबंधन का संयोजक स्वीकार कर लिया होता तो संभवत: देश का इतिहास कुछ और होता। इसकी वजह यह है कि नरेंद्र मोदी के बरक्स नीतीश कुमार ही ऐसे नेता हैं, जिनकी राष्ट्रव्यापी एक छवि है। नीतीश के पास बिहार के अतिरिक्त देश के दूसरे इलाके में जमीनी नेतृत्व और संगठन नहीं है। लेकिन उनकी पहचान पूरे देश में है और उनकी छवि भी विपक्षी खेमे के दूसरे नेताओं की तुलना में कहीं ज्यादा पाक-साफ है। मौजूदा कांग्रेस की कमी यह है कि वह अगले पल उठाए जाने वाले अपने हर कदम के परिणामों का आकलन राहुल गांधी की राजनिक सेहत के लिहाज से करती है। कांग्रेसी आलानेतृत्व की सलाहकार मंडली नहीं चाहती कि विपक्ष में ऐसी कोई शख्सियत उभरे, जिससे राहुल की प्रासंगिकता कमजोर हो। मोदी के बरक्स लड़ाई में वह दूसरे किसी विपक्षी नेता को उभरते हुए नहीं देख सकती। मोदी विरोध में कदम उठाते वक्त वह भूल जाती है कि उन कदमों का राजनीतिक हासिल क्या होगा? फिर राहुल समर्थक मंडली उन्हें मोदी के बरक्स सिर्फ नैरेटिव केंद्रित राजनीति की ही सलाह देती है। इन वजहों से राहुल का विरोध भी देश को उनकी तरफ आकर्षित करने का माध्यम नहीं बन पा रहा है।
भारत मंडपम् में पूरे पांच दिन चले कार्यक्रम के चलते समूची दिल्ली ट्रैफिक जाम से हलकान रही। इसका असर गुड़गांव और नोएडा के ट्रैफिक पर भी पड़ा। दिल्ली ट्रैफिक पुलिस की कल्पनाहीनता से ट्रैफिक में फंसकर दिल्ली तकरीबन पूरे पांचों दिन हांफती रही। इंडिया एआई इम्पैक्ट सम्मेलन का ध्येय वाक्य ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ को भी लोग कोसते दिखे। कहने का मतलब यह है कि इस सम्मेलन की अहमियत के बावजूद इससे एक बड़ा तबका हलकान रहा। अव्वल तो ऐसे माहौल में कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन को समर्थन मिलना चाहिए था, लेकिन ऐसा होता एकदम नहीं दिखा। कांग्रेस हालांकि दावा करती है कि देश अब मौजूदा सरकार से नाराज है। अगर उसके ही दावों को सच मान लें तो होना तो यह चाहिए था कि कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन को देश हाथोंहाथ ले। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसकी वजह यह है कि कांग्रेस आलानेतृत्व के कदम आम लोगों में भरोसा पैदा नहीं कर पाए हैं। कांग्रेस की केंद्रीय सलाहकार मंडली की सलाहें जनता के दिलों में मोदी विरोधी हिलोरें पैदा नहीं कर पा रही हैं, तो इसकी वजह यही है कि पार्टी के विरोध करने के शऊर, मुददे और मंच सही नहीं हैं। इसी वजह से उनकी साख नहीं बन पा रही है। सबसे पुरानी पार्टी होने के नाते कांग्रेस को पता है कि राजनीति में साख का क्या महत्व होता है।
-उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं