नकली बुद्धि की असली बातें (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | May 12, 2025

सच, यहां वहां पता नहीं कहां कहां बिखरा पड़ा है। हर लम्हा बढ़ती जनसंख्या सामाजिक सच है। यह सच है लेकिन दुखदायी है। प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। ठोस कचरे का उचित निष्पादन नहीं हो रहा। सार्वजनिक प्रबंधन की कमियों के कारण अनियोजित शहरीकरण अब समस्या है और अवैध निर्माण के कारण प्राकृतिक सुन्दरता और पर्यावरण उदास परेशान है। इतने सख्त कानूनों के बावजूद जंगलों की कटाई, नदियों के किनारे विकास के अतिक्रमण ने बाढ़ और भूस्खलन के खतरे बढ़ाए हैं। यह सच्ची बातें, नैसर्गिक बुद्धि वाला कोई व्यक्ति नहीं कर रहा बल्कि इंसान द्वारा बनाई नकली बुद्धि यह आइना दिखा रही है।

कुछ और भी खरे खरे सच हैं जो कृत्रिम बुद्धि, पारदर्शी तरीके से नैसर्गिक बुद्धि के मालिकों के सामने रखती है। बुनियादी ढांचे और सेवाओं पर, दबाव बढ़ता जा रहा है। सीवेज पर नगरपालिकाओं का कोई नियंत्रण नहीं है। यातायात के नियमों का उल्लंघन सब पसंद करते हैं। वाहनों की बढ़ती संख्या, पार्किंग की कमी, संकरे रास्ते, सार्वजनिक परिवहन कम होने के कारण घंटों जाम में फंसे रहने के कारण सडकों पर समय की बर्बादी हो रही है। लगातार खराब विध्वंस गतिविधियों से उडती धूल, कचरा जलाने से वायु गुणवत्ता परेशान है। बिजली की अनियमित आपूर्ति, पानी की फैलती कमी, पेयजल के लिए संघर्ष, जल स्रोतों पर बढ़ता दबाव, मोहल्लों में टैंकरों से पानी की सप्लाई, नगर निगम की व्यवस्था में नल में जल योजना सूख गई है। कचरे के निस्तारण की उचित योजना के अभाव की वजह से, सड़क के किनारे पर जगह जगह कूड़े के ढेर लगे हैं। लोगों में जागरुकता की कमी है। नकली बुद्धि को सब पता है। 

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उपर लिखा सब कुछ, नकली बुद्धि की चार जानदार, शानदार वैश्विक संस्थाओं, ग्रोक, मेटा एआई, जेमिनी, चैटजी पीटी ने बताया है। वैसे किसी भी जागरूक, समझदार, विचारवान इंसान पर इन बातों का कोई असर नहीं पड़ेगा क्यूंकि संदर्भित सवाल पूछने वाले अपने आपको ज्यादा समझदार मानते होंगे और असर न लेने वाले खुद को। यह भी स्पष्ट रूप से कह दिया जाएगा कि हमने तो यह सवाल पूछे ही नहीं, यह सब झूठ है।  इंसानियत के दुश्मन, विकास के विरोधियों की राजनीतिक चाल है तभी नकली बुद्धि के चारों चारों स्तम्भ अलग अलग  जवाब दे रही हैं। इनमें तो आपसी मतभेद हैं। कुछ लोग इन चारों पर अविश्वास जताते हुए कहेंगे कि असली बुद्धि वालों ने अपने धुर विरोधियों, हर बात की काट करने वालों व्यंग्य बाणों की परवाह नहीं की तो इन नकली बुद्धि वालों की बातों की कौन चिंता करता है। इस तरह के जवाब तो हम कई दशकों से सुनते आए हैं।   

राजनेता कहेंगे, जब हम विपक्ष में बैठते थे तो इस तरह के सवाल किया करते थे। हमें पक्ष यानी सरकार की तरफ से सवाल करने और ठोक कर जवाब देने का अच्छा खासा अनुभव है। हमारे पास सृष्टि रचयिता की दी हुई नैसर्गिक, असली बुद्धि है जिसे हमने अपने प्रयासों से खूब तराशा हुआ है।

- संतोष उत्सुक

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