Prabhasakshi NewsRoom: न्यायाधीश के खिलाफ 'सत्याग्रह' न्यायिक तंत्र को बदनाम करने की साजिश लगती है

By नीरज कुमार दुबे | Apr 27, 2026

राजनीतिक और न्यायिक हलकों में उस समय नई बहस छिड़ गई जब आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायाधीश स्वर्णा कांता शर्मा को पत्र लिखकर स्पष्ट कर दिया कि वह न तो स्वयं और न ही किसी वकील के माध्यम से अदालत में पेश होंगे। अपने पत्र में केजरीवाल ने कहा कि उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद समाप्त हो चुकी है और इसी कारण उन्होंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह के मार्ग पर चलने का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर लिया है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह न्यायाधीश के आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार सुरक्षित रखेंगे। हम आपको बता दें कि यह मामला दिल्ली आबकारी नीति से जुड़ा है, जिसमें सीबीआई द्वारा उन पर आरोप लगाए गए हैं।

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हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सच्चाई का रास्ता कभी आसान नहीं होता। उन्होंने कहा कि जैसे ही निचली अदालत का फैसला आया, जांच एजेंसी ने उसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी और मामला न्यायाधीश स्वर्णा कांता शर्मा के समक्ष आया। केजरीवाल ने कहा कि यहीं से उनके मन में यह संदेह उत्पन्न हुआ कि क्या उन्हें निष्पक्ष न्याय मिल सकेगा? उन्होंने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के समक्ष पेश नहीं होने के फैसले के पीछे दो मुख्य कारण बताते हुए कहा कि जिस विचारधारा से जुड़े लोगों ने उनके खिलाफ आरोप लगवाये, उसी से संबंधित मंचों से न्यायाधीश का जुड़ाव रहा है, जबकि वह और उनकी पार्टी उस विचारधारा के विरोध में हैं। इसके चलते केजरीवाल ने हितों के टकराव की आशंका जताते हुए यह भी कहा कि इस मामले में केंद्रीय सरकार की जांच एजेंसी पक्षकार है और न्यायाधीश के दोनों बच्चे सरकारी वकीलों के पैनल में शामिल हैं।

हालांकि केजरीवाल ने यह भी कहा कि उनका उद्देश्य न्यायपालिका का अपमान करना नहीं है, बल्कि लोगों के विश्वास को मजबूत करना है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है और उन्होंने ही उन्हें जमानत दी तथा बाद में निर्दोष घोषित किया। लेकिन उन्होंने न्याय के एक मूल सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।

उन्होंने बताया कि इसी आधार पर उन्होंने न्यायाधीश से स्वयं को मामले से अलग करने का अनुरोध किया था, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने सत्याग्रह का मार्ग अपनाने का निर्णय लिया और कहा कि वह अदालत में पेश नहीं होंगे, हालांकि अपने कानूनी अधिकारों का प्रयोग करते रहेंगे।

हम आपको याद दिला दें कि न्यायाधीश स्वर्णा कांता शर्मा ने केजरीवाल की याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया था कि केवल आशंकाओं या धारणाओं के आधार पर स्वयं को अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा था कि ऐसे प्रयास न्यायपालिका में जनता के विश्वास को कमजोर कर सकते हैं। उन्होंने आरोपों को अटकलों और संकेतों पर आधारित बताते हुए कहा कि यह कानूनी मानकों को पूरा नहीं करते।

अपने बच्चों के सरकारी पैनल में होने के आरोप पर उन्होंने कहा था कि यह केवल केजरीवाल द्वारा लगाया गया आरोप है। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि इस प्रकार के आधार पर मामलों की सुनवाई से अलग होना पड़े तो अदालतें किसी भी ऐसे मामले की सुनवाई नहीं कर पाएंगी जिसमें सरकार पक्षकार हो। उन्होंने यह भी जोड़ा था कि जैसे राजनेताओं के बच्चे राजनीति में आते हैं, वैसे ही न्यायाधीशों के बच्चे भी विधि के क्षेत्र में अपना स्थान बना सकते हैं और इसमें कोई अनुचित बात नहीं है।

देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीति और न्यायपालिका के संबंधों पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। केजरीवाल का यह कदम कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है। सत्याग्रह का मार्ग अपनाना एक ऐतिहासिक और नैतिक परंपरा रही है, जिसका उद्देश्य अन्याय के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रतिरोध था। लेकिन क्या किसी न्यायाधीश पर आरोप लगाकर अदालत में पेश होने से इंकार करना उसी भावना के अनुरूप है?यदि हर आरोपी इसी तरह न्यायाधीश की निष्पक्षता पर सवाल उठाकर अदालत में आने से मना कर दे, तो न्यायिक व्यवस्था कैसे चलेगी? यह स्थिति न्यायपालिका की विश्वसनीयता को कमजोर कर सकती है। न्यायालयों का आधार ही यह है कि वह कानून और प्रक्रिया के अनुसार निष्पक्ष निर्णय दें। यदि व्यक्तिगत आशंकाओं के आधार पर प्रक्रिया को ठुकराया जाने लगे तो यह खतरनाक परंपरा बन सकती है।

सत्याग्रह का अर्थ आत्मसंयम और नैतिक बल से अन्याय का विरोध करना है, न कि संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करना। इस प्रकार का कदम न केवल सत्याग्रह की मूल भावना के विपरीत है बल्कि यह न्यायिक तंत्र को बदनाम करने की साजिश जैसा भी प्रतीत हो सकता है। इसलिए यह जरूरी है कि राजनीतिक नेता अपने कदमों के व्यापक प्रभाव को समझें और ऐसी परंपरा न स्थापित करें जो आने वाले समय में न्याय व्यवस्था के लिए चुनौती बन जाए।

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