By रेनू तिवारी | Sep 25, 2026
लोककथाओं, देवी-देवताओं और रहस्यमयी जंगलों पर आधारित कहानियों ने हमेशा भारतीय दर्शकों को आकर्षित किया है। फिल्म 'द व्वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' (The Vvan: Force of the Forest) इन्हीं कुछ तत्वों को बड़े पर्दे पर लाती है। कहानी एक पवित्र जंगल, उससे जुड़ी एक स्थानीय मान्यता और एक ऐसे व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती है जो इन सब बातों को अंधविश्वास मानता है। इसमें छठ पूजा, गाँव की संस्कृति, ज़मीन का विवाद और अलौकिक शक्तियों का कॉम्बिनेशन है। कागज़ पर यह विचार काफी दिलचस्प लगता है, लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, यह साफ हो जाता है कि एक साथ इतने सारे आइडियाज़ को संभालने की कोशिश कहानी पर भारी पड़ जाती है।
गाँव पहुँचने पर उसका सामना जंगल से जुड़ी एक पुरानी मान्यता से होता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह जंगल 'वन देवी' का घर है और सूर्यास्त के बाद इसमें प्रवेश करना मना है। ऋषि इन बातों को महज़ अंधविश्वास मानता है, लेकिन जंगल में घटने वाली कुछ घटनाएँ उसके नज़रिए को चुनौती देने लगती हैं। इसी बीच जंगल से होकर सड़क बनाने की योजना सामने आती है, जिससे विकास और आस्था के बीच टकराव पैदा होता है।
द व्वन: दूसरा भाग पूरी तरह भटक जाता है
फिल्म की सबसे बड़ी कमज़ोरी इसका दूसरा भाग है। यहाँ कहानी एक साथ बहुत कुछ करने की कोशिश करती है। लोककथाएँ, पौराणिक कथाएँ, पर्यावरण से जुड़ी चिंताएँ, ज़मीन का विवाद, विकास परियोजना, अलौकिक शक्तियाँ और कॉमेडी - सब कुछ एक साथ लाया जाता है, और इस प्रक्रिया में मुख्य कहानी अपनी मज़बूती खो देती है।
ज़मीन और सड़क का मुद्दा शुरू में महत्वपूर्ण लगता है, लेकिन आखिरकार अलौकिक घटनाओं के सामने गौण हो जाता है। इसी तरह, छठ पूजा और कहानी के बीच का संबंध उतना मज़बूत नहीं बन पाता जितना फिल्म बनाना चाहती है।
स्क्रीनप्ले नए-नए मोड़ लाता रहता है, लेकिन उनमें से कई कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय उसे उलझा देते हैं। कई दृश्यों में ऐसा लगता है कि फिल्म दर्शकों को कहानी समझाने के बजाय अगली घटना की ओर तेज़ी से बढ़ने में ज़्यादा दिलचस्पी ले रही है।
जब तक फिल्म अपने क्लाइमेक्स तक पहुँचती है, उसका अंदाज़ भी काफी बदल चुका होता है। जो कहानी लोककथा और रहस्य के रूप में शुरू हुई थी, वह आखिरकार बड़े पैमाने पर अलौकिक एक्शन में बदल जाती है। असरदार लगने के बजाय, यह बदलाव थोड़ा अजीब लगता है।
द व्वन: दीपक कुमार मिश्रा का निर्देशन
दीपक कुमार मिश्रा इस फिल्म के ज़रिए एक अलग तरह की भारतीय फैंटेसी बनाने की कोशिश करते हैं। भारतीय लोककथाओं और ग्रामीण परिवेश से जोड़कर कहानी को एक अलग पहचान देने का उनका इरादा साफ़ दिखता है।
हालाँकि, निर्देशन के साथ सबसे बड़ी समस्या फिल्म का अंदाज़ है। यह फ़िल्म कभी तय ही नहीं कर पाती कि वह एक गंभीर लोक-कथा, हॉरर फ़िल्म, फ़ैंटेसी एडवेंचर या कॉमेडी एंटरटेनर बनना चाहती है। एक सीन में रहस्य बनाने की कोशिश की जाती है, तो अगला सीन अचानक कॉमेडी में बदल जाता है। इससे बार-बार फ़िल्म का माहौल बिगड़ता है।
मिश्रा 'पंचायत' जैसी कहानी में स्वाभाविकता और स्थानीय रंग लाने के लिए जाने जाते हैं, लेकिन यहाँ वैसी पकड़ नहीं दिखती। बिहार की पृष्ठभूमि पर आधारित होने के बावजूद, यह फ़िल्म वहाँ की संस्कृति को उतनी गहराई से नहीं दिखा पाती।
द वैन: परफॉर्मेंस
सिद्धार्थ मल्होत्रा ऋषि के रोल में ठीक-ठाक हैं, लेकिन उनकी परफॉर्मेंस फिल्म की कमज़ोर स्क्रिप्ट से ऊपर नहीं उठ पाती। उनके किरदार को एक समझदार, शहर में रहने वाले आदमी से ऐसे व्यक्ति में बदलना था जिसे अलौकिक घटनाओं का सामना करना पड़ता है। हालांकि, स्क्रीनप्ले इस बदलाव को काफ़ी इमोशनल गहराई नहीं देता।
मल्होत्रा एक्शन और फिजिकल सीन में सहज लगते हैं, लेकिन इमोशनल सीन में वैसा असर नहीं दिखता। कुल मिलाकर, उनकी परफॉर्मेंस औसत रहती है।
तमन्ना भाटिया को ममता के तौर पर एक इमोशनल गहराई वाले किरदार को निभाने का मौका मिला। उनके किरदार को कहानी के पर्सनल और आध्यात्मिक, दोनों पहलुओं से जोड़ा जा सकता था। तमन्ना अपने रोल को ईमानदारी से निभाती हैं, लेकिन रोल को विकसित होने के लिए काफ़ी गुंजाइश नहीं दी गई है। कई जगहों पर, वह मुख्य कहानी के साथ चलने वाले एक सपोर्टिंग किरदार से ज़्यादा कुछ नहीं लगतीं। उनके किरदार की क्षमता का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता था।
सुनील ग्रोवर को एक गंभीर रोल में देखना दिलचस्प है। वह किरदार में गंभीरता लाने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनकी बनी-बनाई कॉमिक इमेज कई जगहों पर रुकावट बनती है।
मनीष पॉल को मुख्य रूप से कॉमेडी के लिए लाया गया है। उनकी टाइमिंग कुछ सीन में काम करती है, लेकिन उनका ट्रैक अक्सर कहानी में ज़बरदस्ती जोड़ा हुआ लगता है। एक जैसे जोक्स का बार-बार इस्तेमाल भी उनके असर को कम कर देता है।
अनूप सोनी और श्वेता तिवारी अपने-अपने रोल में ठीक-ठाक हैं, लेकिन स्क्रीनप्ले उन्हें काम करने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं देता।
द व्वन: तकनीकी पहलू
तकनीकी तौर पर, सिनेमैटोग्राफी फिल्म के मजबूत पहलुओं में से एक है। घने पेड़ों, परछाइयों और धुंध के साथ जंगल को शूट किया गया है, जिससे कई आकर्षक दृश्य (फ्रेम) बने हैं। जंगल में एक रहस्यमयी माहौल बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन सिर्फ सिनेमैटोग्राफी से वह डर पैदा नहीं हो पाता जिसकी कहानी को ज़रूरत है।
माहौल को और असरदार बनाने के लिए बैकग्राउंड स्कोर और लोक धुनों का इस्तेमाल किया गया है। छठ से जुड़े हिस्से भी फिल्म में क्षेत्रीय रंग लाने की कोशिश करते हैं।
जहाँ तक VFX की बात है, फिल्म बड़े पैमाने पर एक अलौकिक दुनिया बनाने की कोशिश करती है, लेकिन नतीजे एक जैसे नहीं हैं। कुछ सीन ठीक-ठाक काम करते हैं, जबकि कुछ में विजुअल इफेक्ट्स बनावटी लगते हैं।
एडिटिंग एक और कमजोर कड़ी है। कहानी को और कसा हुआ होना चाहिए था। कुछ कॉमेडी सीन और गाने मुख्य कहानी की रफ्तार को धीमा कर देते हैं।
द व्वन: क्या कमी रह गई?
'द व्वन' के साथ सबसे बड़ी समस्या विचारों की कमी नहीं, बल्कि विचारों की अधिकता है। फिल्म एक ही समय में बहुत सारी बातें कहना चाहती है, बिना किसी एक विचार को पर्याप्त गहराई दिए।
जंगल से जुड़ा रहस्य अपना असर खो देता है क्योंकि फिल्म उसे विकसित होने के लिए पर्याप्त समय नहीं देती। छठ और लोककथाएँ कहानी का हिस्सा हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल अक्सर सतही लगता है।
विकास और प्रकृति के बीच का टकराव एक मजबूत सामाजिक पहलू दे सकता था, लेकिन अलौकिक कहानी के कारण यह दब जाता है। कॉमेडी भी हमेशा असरदार नहीं होती। गंभीर घटनाओं के बीच अचानक आने वाले जोक्स फिल्म के मूड को खराब कर देते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्लाइमेक्स उस रहस्य का संतोषजनक समाधान नहीं देता जिसे फिल्म ने शुरुआत में खड़ा किया था।
द व्वन: अंतिम फैसला
'द व्वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' के पीछे का विचार निश्चित रूप से दिलचस्प है। भारतीय लोककथाएँ, वन देवी, छठ पूजा और एक रहस्यमयी जंगल एक अनोखी फैंटेसी फिल्म का आधार बन सकते थे।
फिल्म में कुछ अच्छे दृश्य और कलाकारों की मेहनत भी दिखती है। लेकिन एक अच्छे विचार और एक अच्छी फिल्म के बीच, सबसे महत्वपूर्ण तत्व एक मजबूत कहानी है। यहीं पर 'द व्वन' सबसे ज्यादा चूक जाती है। बिखरी हुई पटकथा, उतार-चढ़ाव वाला टोन, किरदारों का अधूरा विकास, कमज़ोर कॉमेडी और ऐसा क्लाइमेक्स जो उम्मीद के मुताबिक असर नहीं छोड़ पाता-ये सब मिलकर फ़िल्म की अच्छी बातों पर हावी हो जाते हैं।
5 में से 2 स्टार, क्योंकि फ़िल्म में निश्चित रूप से क्षमता और कुछ अच्छे विचार हैं, लेकिन उनका सही इस्तेमाल नहीं हो पाया। 'द व्वन: फ़ोर्स ऑफ़ द फ़ॉरेस्ट' आख़िरकार एक ऐसी फ़िल्म बनकर रह जाती है जो शुरुआत में तो उम्मीद जगाती है, लेकिन अंत तक उस उम्मीद पर खरी नहीं उतर पाती।