लैंगिक समानता की बातें तो बड़ी बड़ी होती हैं मगर हकीकत कुछ और ही है

By डॉ. नीलम महेंद्र | Mar 06, 2024

ईश्वर की बनाई इस सृष्टि में मानव के रूप में जन्म लेना एक दुर्लभ सौभाग्य की बात होती है। और जब वो जन्म एक स्त्री के रूप में मिलता है तो वो परम सौभाग्य का विषय होता है। क्योंकि स्त्री ईश्वर की सबसे खूबसूरत वो कलाकृति है जिसे उसने सृजन करने की पात्रता दी है। सनातन संस्कृति के अनुसार संसार के हर जीव की भांति स्त्री और पुरुष दोनों में ही ईश्वर का अंश होता है लेकिन स्त्री को उसने कुछ विशेष गुणों से नवाजा है। यह गुण उसमें नैसर्गिक रूप से पाए जाते हैं जैसे सहनशीलता, कोमलता, प्रेम, त्याग, बलिदान ममता। यह स्त्री में पाए जाने वाले गुणों की ही महिमा होती है कि अगर किसी पुरुष में स्त्री के गुण प्रवेश करते हैं तो वो देवत्व को प्राप्त होता है लेकिन अगर किसी स्त्री में पुरुषों के गुण प्रवेश करते हैं तो वो दुर्गा का अवतार चंडी का रूप धर लेती है जो विध्वंसकारी होता है। किंतु वही स्त्री अपने स्त्रियोचित नैसर्गिक गुणों के साथ एक गृहलक्ष्मी के रूप में अन्नपूर्णा और एक माँ के रूप में ईश्वर स्वरूपा बन जाती है। 

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तस्वीर का दूसरा रुख है 2021 की एक सर्वे रिपोर्ट जिसमें यह बात सामने आती है कि 37 प्रतिशत महिलाओं को उसी काम के लिए पुरुषों के मुकाबले कम वेतन दिया जाता है। 85 फीसद महिलाओं का कहना है कि उन्हें पदोन्नति और वेतन के मामले में नौकरी में पुरुषों के समान अवसर नहीं मिलते। लिंक्डइन की इस सर्वे रिपोर्ट के अनुसार आज भी कार्य स्थल पर कामकाजी महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है। महिलाओं को काम करने के समान अवसर उपलब्ध कराने के मामले में 55 देशों की सूची में भारत 52वें नम्बर पर है। इसे क्या कहा जाए कि हम वैश्विक स्तर पर महिला दिवस जैसे आयोजन करते हैं जिसमें महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार देने की बातें करते हैं लेकिन जब तनख्वाह, पदोन्नति, समान अवसर प्रदान करने जैसे विषय आते हैं तो हम 55 देशों की सूची में अंतिम पायदानों पर होते हैं। 

जाहिर है कि जब इस मुद्दे पर चर्चा होती है तो अनेक तर्क वितर्कों के माध्यमों से महिला सशक्तिकरण से लेकर नारी मुक्ति और स्त्री उदारवाद से लेकर लैंगिक समानता जैसे भारी भरकम शब्द भी सामने आते हैं और यहीं हम विषय से भटक जाते हैं क्योंकि उपरोक्त विमर्शों के साथ शुरू होता है पितृसत्तात्मक समाज का विरोध। यह विरोध शुरू होता है पुरुषों से बराबरी के आचरण के साथ। पुरुषों जैसे कपड़ों से लेकर पुरुषों जैसा आहार विहार जिसमें मदिरा पान सिगरेट सेवन तक शामिल होता है। जाहिर है कि तथाकथित उदारवादियों का स्त्री विमर्श का यह आंदोलन उदारवाद के नाम पर फूहड़ता के साथ शुरू होता है और समानता के नाम पर मानसिक दिवालियेपन पर खत्म हो जाता है।

हमें यह समझना चाहिए कि जब हम महिलाओं के लिए लैंगिग समानता की बात करते हैं तो हम उनके साथ होने वाले लैंगिग भेदभाव की बात कर रहे होते हैं। इस क्रम में समझने वाला विषय यह है कि अगर यह लैंगिक भेदभाव केवल महिलाओं द्वारा पुरुषों के समान कपड़े पहनने या फिर आचरण रखने जैसे सतही आचरण से खत्म होना होता तो अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे तथाकथित विकसित और आधुनिक देशों  में यह कब का खत्म हो गया होता। लेकिन सच्चाई तो यह है कि इन देशों की महिलाएं भी अपने अधिकारों के लिए आज भी संघर्ष कर रही हैं। दरअसल महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जब हम महिला अधिकारों के लिए लैंगिक समानता की बात करते हैं तो उसके मूल में एक वैचारिक चिंतन होता है कि एक सभ्य और विकसित समाज अथवा परिवार अथवा एक व्यक्ति के रूप में महिलाओं के प्रति हमारा व्यवहार समान, हमारी सोच समान, हमारा दृष्टिकोण समान, समान कार्य के लिए उन्हें दिया जाने वाला वेतन पुरुष के समान और जीवन में आगे जाने के लिए उन्हें मिलने वाले अवसर समान रूप से उपलब्ध हों। जिस दिन किसी भी क्षेत्र में आवेदक अथवा कर्मचारी को उसकी योग्यता के दम पर आंका जाएगा ना कि उसके महिला या पुरुष होने के आधार पर, तभी सही मायनों में हम महिला दिवस जैसे आयोजनों के प्रयोजन को सिद्ध कर पाएंगे।

-डॉ. नीलम महेंद्र

(लेखिका वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)

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