ऐसी वैक्सीन भी होनी चाहिए (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Jun 02, 2021

विचारों की वैक्सीन मुझे नए ख़्वाब दिखा रही है। पिछले कुछ दिनों में यह बार  बार साबित हो रहा है कि हमारे अंदर विश्वगुरु बनने लायक सभी कीटाणु मौजूद हैं। यह अलग बात है कि वायरस प्रबंधन में हमने महाविश्वगुरु बनना चाहा लेकिन वो कहते हैं न अपने छोटे पंखों को विशाल समझकर ऊंचे आसमान पर उड़ने की जुर्रत नहीं करनी चाहिए। पहले अपने पंखों का आकार सही यंत्र से नाप लेना चाहिए। जो ऐसा नहीं करते, वक़्त उनके पंख कुतरने में देर नहीं लगाता। हमें ऐसा ही बहुत सुहाता है कि पंख नापे नहीं, उड़ चले और धड़ाम से गिर पड़े ।

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वैक्सीन बनाने और लगाने का काम अचुनाव आयोग को देना चाहिए। इसमें कोई परेशानी नहीं आएगी, नेता और अचुनाव आयोग वाले एक दूसरे को अच्छी तरह पहचानते हैं। पहले आयोग को खुद को सेनेटाईज़ करना पड़ेगा क्यूंकि किसी भी टेस्ट यह पता नहीं चल पाएगा कि कौन संक्रमित है, कौन नहीं। चुनाव आयोग को वैक्सीन कौन सप्लाई करेगा इस बारे याचिका दायर की जा सकती है। ऐसा हो जाए तो राजनीति में सुधार की संभावनाएं उग सकती हैं। धार्मिक वैक्सीन की भी हमेशा ज़रूरत रहती है। अगर उचित धार्मिक विचारों की वैक्सीन का आविष्कार हो जाए तो संभव है धर्म के पैरोकार, थोड़ा इंसान होकर नैतिकता, समानता, समरसता, आदमीयत और कर्म जैसे विषयों पर संजीदगी से काम शुरू करें। वैसे इस वैक्सीन को लगाने में परेशानी आशंकित है। एक वैक्सीन ऐसे भी हो जो प्रशासनिक अधिकारियों को दी जाए ताकि उनके शरीर और दिमाग में व्यवहारिक, सकारात्मकता, मानवीय दृष्टिकोण अधिक विकसित हो सके। 

नई आर्थिक वैक्सीन की अभी ज़रूरत नहीं है, भण्डार में खासी है और शासन अपनी जान बचाने के लिए उसे बचाए भी रखता है और लगाए भी।   

- संतोष उत्सुक

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