जानिए उन अपराधों के बारे में जिनमें अदालतें सिर्फ़ नाममात्र का जुर्माना लगाकर अपराधियों को छोड़ देती हैं, बशर्ते कि अपराधी अपना गुनाह कबूल कर ले

By कमलेश पांडे | Jun 10, 2023

अपराध करना एक मानवीय प्रवृति है, जिसको करने के तरह-तरह के कारण हो सकते हैं। ऐसे में किसी भी अपराधी को सजा मुकर्रर करने से पहले न्यायालय जिरह के दौरान उसके द्वारा किये गए अपराध पर बरीकीपूर्वक गौर करती है, फिर भारतीय दंड संहिता के मुताबिक यथोचित सजा प्रदान करती है। हालांकि, निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को ऊपरी अदालत में चुनौती देने का भी प्रावधान है। 

अनुभव बताता है कि देश में ऐसे कुछ छोटे-मोटे अपराध हैं जहां अदालत के पास एक माह से लेकर छह माह तक के कारावास की सज़ा देने की शक्ति है। हालांकि, अदालतें उदारता पूर्वक ऐसे छोटे-मोटे अपराधों में कारावास की सज़ा नहीं देकर नाममात्र का जुर्माना लगा देती हैं। क्योंकि भारत की जेलों में अब तक इतने अपराधी बन्द हो चुके हैं कि अपराधियों को रखने एवं उनकी देखरेख की व्यवस्था मुश्किल हो जाती है। 

इसलिए अब अदालतें भी सिर्फ गंभीर अपराधों में ही अपराधी को जेल में रखने पर अपना ध्यान आकर्षित करती हैं। यहां पर मैं आपको उन अपराधों के बारे में बता रहा हूँ, जिनमें अदालत महज आरोपी द्वारा जुर्म स्वीकार करने पर कुछ जुर्माना लगा देती हैं, पर जेल नहीं भेजतीं। हालांकि ऐसा तब ही होता है जब अभियुक्त अपना गुनाह स्वीकार कर लेता है। समझा जाता है कि इससे अदालत का कीमती समय भी बच जाता है, जिससे बचे हुए समय में अन्य गंभीर प्रकरणों को सुना जा सकता है। इसलिए यह परंपरा जोर पकड़ चुकी है।

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पहला, भारत के कानून में जुआ और किसी भी तरह का सट्टा खेलना या खेलवाना दोनों ही पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसे अपराध घोषित कर जेल की सज़ा का उपबंध किया गया है। भारत में जुएं को प्रतिबंधित करके अपराध बनाने वाला कानून "सार्वजनिक जुआ अधिनियम, 1867" है, जिसके अंतर्गत जुआ खेलना और खिलवाना दोनों ही कारावास योग्य दंडनीय अपराध है।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट यह स्पष्ट कर चुकी है कि बगैर मजिस्ट्रेट की इजाज़त के पुलिस द्वारा ऐसे प्रसंग में छापा नहीं मारा जा सकता, क्योंकि इस अधिनियम के अंतर्गत अपराध गैर संज्ञेय अपराध है। जिसमें पुलिस को सीआरपीसी की धारा 155 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट से इजाज़त लेनी होती है। इसी तरह से सट्टे के लिए सट्टा अधिनियम भी है जो सट्टे को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर अक्षम्य अपराध बनाता है।

वैसे इन दोनों ही अपराधों में यदि अदालत चाहे तो प्रकरण को समरी ट्रायल के रूप में सुनकर अभियुक्त को कारावास की सजा से भी दंडित कर सकती है, लेकिन आमतौर पर अदालत इन अपराधों में अभियुक्त के अपराध स्वीकार कर लेने पर महज सौ या दो सौ रुपए का जुर्माना कर देती है और जुएं में पकड़ाए रुपए सरकार द्वारा जब्त यानी राजसात कर लिए जाते हैं।

दूसरा, शराब और भांग से संबंधित अपराध भी राज्य सरकार के अंदर में आते हैं। हालांकि, सभी राज्यों के शराब अधिनियम अलग अलग होते हैं, जिनमें वहां की जरूरतें व परम्परा शामिल होती हैं। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि अब लगभग सभी राज्यों में सार्वजनिक रूप से शराब पीने को प्रतिबंधित किया जा चुका है। लिहाजा ऐसे अपराधों में यदि पुलिस कोई प्रकरण बनाती है तो अदालत सिर्फ जुर्माना लगाकर छोड़ सकती है। अब इन अपराधों में ट्रायल फेस नहीं करना पड़ता है, क्योंकि अपराध स्वीकार कर लेने पर जुर्माना कर दिया जाता है और उसकी वसूली होते ही अभियुक्त को छोड़ दिया जाता है।

इसी तरह से कभी कभी अदालत भी उदार दृष्टिकोण रखते हुए एनडीपीएस एक्ट के अंतर्गत आने वाले पदार्थों के सेवन करने वाले व्यक्ति पर जुर्माना लगाकर छोड़ देती है। हालांकि यह थोड़ा गंभीर मामला है, इसलिए अदालत इस अपराध में अधिकांश जुर्माना लगाकर नहीं छोड़ती है, बल्कि कम मात्रा में शराब ज़ब्त होने पर भी अदालत अपराध स्वीकार करने पर मामला खत्म कर अभियुक्त के ऊपर जुर्माना लगा देती है और उसकी वसूली होते ही छोड़ने का हुक्म जारी कर देती है।

तीसरा, किसी भी व्यक्ति द्वारा लापरवाही से कोई भी मोटरयान चलाने वाले पर या फिर कोई अन्य सवारी चलाने वाले व्यक्ति पर आईपीसी की धारा 279 लागू होती है। इस धारा के लागू होने के लिए किसी व्यक्ति को चोट पहुंचनी ही ज़रूरी नहीं है, बल्कि केवल लापरवाही से सवारी चलाने पर ही इस धारा में अपराध बन पाता है। वहीं, यदि ऐसे वाहन चलाने से किसी व्यक्ति को साधारण चोट लगी है तब भारतीय दंड संहिता की धारा 337 लागू होती है। इन दोनों ही अपराधों में अदालत अभियुक्त को जुर्माना लगाकर छोड़ सकती है। हालांकि यदि किसी पीड़ित को गंभीर चोट लगी है, जैसे फ्रेक्चर इत्यादि हुआ है तब धारा 338 प्रयोज्य हो जाती है। इसमें अदालत जुर्माने पर नहीं छोड़ती है, बल्कि ऐसे में यदि अभियुक्त अपराध स्वीकार कर ले तो उसे कारावास का दंड दिया जा सकता है।

चतुर्थ, इसी प्रकार से आईपीसी के अधीन अन्य छोटे-मोटे अपराध भी हैं जिनमें गाली गलौज, झूमाझटकी इत्यादि शामिल हैं। बताया जाता है कि इन अपराधों में भी अदालत जुर्माना लगाकर अभियुक्त को छोड़ सकती है। कुल मिलाकर यह कहना न्यायसंगत होगा कि ऐसे अपराध जो अधिक गंभीर अपराध की श्रेणी में नहीं आते हैं और जिनमें कारावास की सज़ा एक-दो महीने से लेकर छह महीने तक ही है, वहां अदालत अभियुक्त के अपराध कबूल करने पर महज जुर्माना लगाकर छोड़ सकती है।

इस प्रकार अब आप यह समझ गए होंगे कि यदि भूलचूक बस या फिर मित्रों की शोहबत में किसी व्यक्ति से कोई गलती हो जाती है तो गुनाह कबूल लेने से उसकी परेशानी एक हद तक कम हो जाएगी, बशर्ते कि वह क्षम्य अपराध ही किया हो।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

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