By नीरज कुमार दुबे | May 21, 2026
अमेरिका और इजरायल के बीच ईरान युद्ध को लेकर रणनीतिक मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच बुधवार को हुई एक महत्वपूर्ण टेलीफोन वार्ता में तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गई। यह बातचीत ऐसे समय हुई जब ट्रंप ने ईरान पर प्रस्तावित सैन्य हमलों को अचानक रोकने का फैसला लिया। इस फैसले से नेतन्याहू स्पष्ट रूप से नाराज बताए जा रहे हैं और दोनों नेताओं के बीच युद्ध को लेकर दृष्टिकोण का अंतर सामने आ गया है।
सूत्रों के अनुसार, ट्रंप ने बातचीत में नेतन्याहू को बताया कि मध्यस्थ देश अमेरिका और ईरान के बीच एक प्रारंभिक समझौता पत्र तैयार कराने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रस्तावित समझौते का उद्देश्य युद्ध समाप्त करना और आगे की वार्ताओं का रास्ता खोलना है। इसके तहत लगभग तीस दिनों तक कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत की योजना बनाई जा रही है। इनमें ईरान का परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने जैसे संवेदनशील विषय शामिल हैं।
हालांकि इजरायल इस पहल को लेकर संतुष्ट नहीं दिख रहा। नेतन्याहू लंबे समय से ईरान के खिलाफ अधिक आक्रामक रुख अपनाने की वकालत करते रहे हैं। माना जा रहा है कि फरवरी के अंत में युद्ध शुरू होने के बाद से ही वह लगातार अमेरिका पर कठोर सैन्य कार्रवाई के लिए दबाव बनाते रहे हैं। यही कारण है कि जब ट्रंप ने इस सप्ताह की शुरुआत में नए लक्षित हमलों की संभावना जताने के बाद अचानक उन्हें रोक दिया, तो इजरायली नेतृत्व को यह फैसला स्वीकार नहीं हुआ।
रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि ट्रंप ने हमले रोकने का निर्णय खाड़ी क्षेत्र के सहयोगी देशों के आग्रह पर लिया। कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ने से रोकने के लिए अमेरिका से संयम बरतने की अपील की थी। इन देशों को आशंका है कि व्यापक युद्ध की स्थिति में पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता प्रभावित हो सकती है और तेल आपूर्ति पर भी गंभीर असर पड़ सकता है।
देखा जाये तो अमेरिका और इजरायल के बीच मतभेद केवल हमलों को लेकर ही नहीं हैं, बल्कि दोनों के युद्ध संबंधी मूल उद्देश्य भी अलग दिखाई दे रहे हैं। ट्रंप जहां एक ओर सैन्य दबाव के साथ बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहते हैं, वहीं नेतन्याहू का जोर निर्णायक सैन्य कार्रवाई पर है। इसी कारण दोनों नेताओं के बीच कई बार रणनीतिक असहमति देखी गई है। बताया गया है कि इजरायल ने दक्षिण फारस तेल क्षेत्र पर हमला करने से पहले अमेरिका को पूरी तरह विश्वास में नहीं लिया था। इस कदम ने भी दोनों देशों के बीच अविश्वास बढ़ाया।
बुधवार को पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि ईरान को लेकर स्थिति अंतिम चरण में पहुंच रही है। उन्होंने कहा कि या तो कोई समझौता होगा या फिर अमेरिका को कठोर कदम उठाने पड़ सकते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि हालात उस दिशा में नहीं जाएंगे। ट्रंप ने यह संकेत दिया कि यदि कूटनीतिक प्रयासों से लोगों की जान बचाई जा सकती है, तो कुछ और दिनों तक बातचीत को अवसर देना उचित होगा।
इस बीच, ईरान युद्ध को लेकर अमेरिका के भीतर भी राजनीतिक मतभेद तेज हो गए हैं। अमेरिकी सीनेट में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव को आगे बढ़ाने की मंजूरी दी गई है, जिसके तहत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कांग्रेस की अनुमति के बिना ईरान के खिलाफ युद्ध जारी रखने से रोका जा सकता है। इस प्रस्ताव के समर्थन में कई रिपब्लिकन सांसदों ने भी डेमोक्रेट सदस्यों का साथ दिया। प्रस्ताव पेश करने वाले सीनेटर टिम केन ने कहा कि युद्ध और शांति जैसे मुद्दों पर अंतिम निर्णय कांग्रेस का होना चाहिए, क्योंकि अमेरिकी संविधान में युद्ध घोषित करने का अधिकार राष्ट्रपति नहीं बल्कि कांग्रेस को दिया गया है। हालांकि यह अभी केवल प्रारंभिक प्रक्रिया है और इसे कानून बनने के लिए प्रतिनिधि सभा तथा सीनेट दोनों में व्यापक समर्थन की आवश्यकता होगी।
अमेरिका में यह बहस भी तेज हो गई है कि ट्रंप ने बिना स्पष्ट रणनीति बताए देश को लंबे संघर्ष की ओर धकेल दिया है। हम आपको बता दें कि वर्ष 1973 के युद्ध अधिकार कानून के अनुसार कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति सीमित समय तक ही सैन्य कार्रवाई कर सकता है, उसके बाद उसे कांग्रेस की अनुमति लेनी होती है। डेमोक्रेट नेताओं और कुछ रिपब्लिकन सांसदों का कहना है कि ट्रंप को ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान के लिए औपचारिक मंजूरी लेनी चाहिए। वहीं व्हाइट हाउस और ट्रंप समर्थक रिपब्लिकन नेताओं का तर्क है कि राष्ट्रपति ने देश की सुरक्षा के लिए अपने संवैधानिक अधिकारों के तहत कार्रवाई की है और यह पूरी तरह वैध है।
इसके अलावा, एक और दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने नेतन्याहू के साथ अपनी बातचीत पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि इजरायली प्रधानमंत्री वही करेंगे जो वह चाहेंगे। इस बयान को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका अब भी खुद को इस पूरे संघर्ष में निर्णायक शक्ति के रूप में देख रहा है।
उधर, ईरान ने भी संकेत दिए हैं कि बातचीत की संभावनाएं अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है कि तेहरान और वाशिंगटन के बीच पाकिस्तान के माध्यम से संदेशों का आदान प्रदान जारी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि पर्दे के पीछे संवाद की प्रक्रिया अब भी चल रही है, भले ही सार्वजनिक रूप से दोनों पक्ष एक दूसरे पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हों।
बहरहाल, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और इजरायल के बीच उभरते मतभेद अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण संकेत माने जा रहे हैं। यदि दोनों देशों की रणनीति में यही अंतर बना रहता है, तो आने वाले दिनों में ईरान युद्ध की दिशा और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।