ट्रेड, व्यापार और रेयर अर्थ मिनिरल्स... चीन के दौरे पर जाएंगे ट्रंप, जिनपिंग से मुलाकात बढ़ाएगी भारत की टेंशन?

By अभिनय आकाश | May 11, 2026

ईरान से इस वक्त अमेरिका की खूब तनातनी चल रही है। युद्ध विराम हुआ लेकिन शांति नहीं। लेकिन इस बीच अब खबर यह है कि अमेरिका अब नई जगह पर फोकस करने वाला है। खबर है अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप अगले हफ्ते चीन यात्रा पर जा रहे हैं और वहां जब उनसे चीनी राष्ट्रपति शी जिंपिंग की मुलाकात होगी तो ताइवान का मुद्दा इस मुलाकात में उठ सकता है। यह जानकारी अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने खुद दी। वाइट हाउस में एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान मार्को रूबियो ने यह कहा कि ताइवान हमेशा अमेरिका और चीन के बीच बातचीत का हिस्सा रहता है। उन्होंने यह भी बताया दोनों देश समझते हैं कि इस क्षेत्र में कोई भी अस्थिरता उनके हित में नहीं है। रूबियो ने साफ कहा कि अमेरिका नहीं चाहता कि ताइवान या इंडोपेसिफिक रीजन में कोई भी ऐसा घटनाक्रम बने जिससे तनाव बढ़े या फिर हालात बिगड़ जाए। अब ट्रंप 14 और 15 मई को बीजिंग का दौरा करने वाले हैं। इस दौरान उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से भी होगी। जिसमें कई अहम मुद्दों पर चर्चा होना संभव माना जा रहा है और ताइवान भी इस चर्चा में एक हिस्सा होगा। ऐसा कहा जा रहा है। अब यह ऐसा इसलिए भी क्योंकि यह मुद्दा लंबे वक्त से अमेरिका और चीन के बीच एक तनाव की वजह बना हुआ है। 

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अमेरिका के विदेश मंत्री के द्वारा जानकारी दी गई कि चीन की यात्रा पर प्रेसिडेंट ट्रंप नेक्स्ट वीक जाने वाले हैं और बड़े मुद्दे उठने की पूरी आशंका है कि यह मुद्दे उठेंगे। जिसमें एक बहुत बड़ा मुद्दा जो है वो ताइवान को लेकर बात चल रही है कि ताइवान का मुद्दा उठेगा।  पिछले दिनों से जब से अमेरिका ईरान वॉर में उलझा हुआ था तब से लगातार चीन की जो आक्रामकता है वो ताइवान की ओर बढ़ गई थी और ताइवान की सिक्योरिटी का जो जिम्मा है वो अमेरिका ने अपने जिम्मे लिया हुआ है कि ताइवान के लिए हम कुछ भी करेंगे लेकिन ताइवान को हम सिक्योरिटी देंगे। तो अब ऐसा लगता है कि चीन की उस बढ़ती आक्रामकता के बीच अमेरिका की चीन यात्रा प्रेसिडेंट ट्रंप की कहीं ना कहीं ताइवान के मुद्दे को केंद्र विषय रखेगी। चीन मानता है कि ताइवान जो है वह हमारा हिस्सा है। रिपब्लिक ऑफ चाइना 1949 में जब क्रांति हुई थी तो काफी बड़ी मात्रा में जो कोमेतांग के जो सिविल वॉर में शामिल थे एक तरफ कम्युनिस्ट और एक तरफ कोमेतांग यानी नेशनलिस्ट ग्रुप था। वो बड़ी संख्या में भाग कर चले गए थे इसी ताइवान आइलैंड के ऊपर। तब से चीन ये कहता है कि हम उस समय उस द्वीप पर ताइवान पर कब्जा नहीं कर पाए थे।

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लेकिन अब हम कब्जा करेंगे और यह हमारा वन चाइना पॉलिसी का हिस्सा है। 

ताइवान को भी अगर आप देखेंगे तो ताइवान में भी दो पार्टी है जो एक पार्टी कहीं ना कहीं चीन के समर्थन में या चीन के विलय का समर्थन करती है और एक पार्टी जो है वो चीन से दूर रहने का कि हम चीन में शामिल नहीं होंगे। दुनिया आज भी ताइवान को लेकर एक इंडिपेंडेंटली एक स्टेट की तरह कंसीडर नहीं करती है। ताइवान को एक कंट्री की तरह कंसीडर किया जाता है। कोई भी कंट्री स्टेट तब बनता है जब उसको इंटरनेशनल रिकॉग्नाइजेशन मिल जाता है। ताइवान के साथ में भारत की कोई एंबेसी नहीं है बल्कि काउंसिलेट है और ताइवान जो है वह यूएओ का भी मेंबर नहीं है। क्योंकि ताइवान को कहीं ना कहीं वन चाइना पॉलिसी के तहत ही माना जाता है कि वह चाइना का हिस्सा है। ताइवान कहता है कि हम एक संप्रभु राष्ट्र हैं और हम अपनी संप्रभुता को बरकरार रखेंगे और अमेरिका ताइवान की संप्रभुता को बरकरार रखने की जो मांग है उसका समर्थन करता है। लेकिन वही अमेरिका वन चाइना पॉलिसी का भी समर्थन करता है। 

रेयर अर्थ और व्यापार पर ट्रंप-जिनपिंग की संभावित चर्चा

शी जिनपिंग के साथ अपनी आगामी बैठक में डोनाल्ड ट्रंप व्यापार के साथ-साथ दुर्लभ मृदा खनिजों (रेयर अर्थ) का अहम मुद्दा उठा सकते हैं। अमेरिकी तकनीकी उद्योग के लिए ये खनिज बेहद जरूरी हैं, और इन पर चीन के बढ़ते एकाधिकार ने अमेरिका की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ट्रंप पहले भी इस मुद्दे पर अपनी स्पष्ट राय रख चुके हैं।

भारत के लिए इस बैठक के मायने

बीजिंग में होने वाली इस शीर्ष वार्ता पर भारत की भी पैनी नजर रहेगी। अमेरिका और चीन, दोनों ही वैश्विक शक्तियां भारत की विदेश नीति का अहम हिस्सा हैं, इसलिए इस बैठक में लिए गए किसी भी फैसले का सीधा असर नई दिल्ली पर पड़ना तय है। हाल के समय में भारत के इन दोनों ही देशों के साथ रिश्ते काफी उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं, फिर भी दोनों का महत्व कम नहीं हुआ है। भारत के नजरिए से देखा जाए तो चीन हमेशा से एक बड़ी राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती और रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहा है। इसके अलावा, वह पाकिस्तान जैसे भारत के विरोधी देश का करीबी मित्र भी है। हालांकि चीन अक्सर कूटनीतिक मंचों पर भारत के साथ शांति और सौहार्दपूर्ण संबंधों की बात करता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि वह हर दिशा से भारत की घेराबंदी करने और उस पर दबाव बनाने की लगातार कोशिश करता रहता है।

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