आर्थिकी के जरिए नेतृत्व स्थापित करने की कोशिश

By उमेश चतुर्वेदी | Mar 12, 2025

रीगन-थैचर थ्योरी वाली अर्थव्यवस्था आज वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य हो गई है। राजकाज में अर्थव्यवस्था का महत्व हमेशा से रहा है, लेकिन उदारीकरण के दौर में अर्थव्यवस्था राजनीति का केंद्रीय विषय बन गया है। ऐसे माहौल में राजनीतिक कामयाबी की शर्त के लिए बेहतर आर्थिकी ना होती तो ही हैरत होती। शायद यही वजह है कि अब राजनीति चाहे किसी भी विचारधारा वाली क्यों न हो, सत्ता में आने के बाद उसकी प्राथमिकता आर्थिकी को सुधारने और अपने लिए ज्यादा से ज्यादा निवेश हासिल करना हो गई है। इस दौर में जितना ज्यादा निवेश आकर्षित हुआ, राजनीतिक कामयाबी की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है। इन संदर्भों में कह सकते हैं कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव अपने नेतृत्व को राज्य में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं। साल 2023 के विधानसभा चुनावों के बाद बीजेपी ने मध्य प्रदेश की कमान मोहन यादव को जब सौंपी थी, तब उनकी पहचान राज्य से बाहर कम ही थी। जनसंख्या के लिहाज से पांचवां और क्षेत्रफल के लिहाज से दूसरे बड़े राज्य मध्य प्रदेश की बीजेपी में दिग्गज नेताओं की भरमार थी। बेशक मोहन यादव मुख्यमंत्री बनने से पहले शिवराज सरकार में शिक्षा मंत्री के रूप में काम कर रहे थे, लेकिन राज्य के बाहर उनकी बड़ी पहचान नहीं थी। लेकिन बीते 25 और 26 फरवरी को राज्य की राजधानी भोपाल में सफल ग्लोबल इन्वेस्टर मीट के आयोजन और उसमें मिले भारी-भरकम निवेश प्रस्तावों के बाद उनका कद बढ़ना स्वाभाविक है। 

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मध्य प्रदेश में पिछले दस साल के निवेश प्रस्तावों के कार्यान्वयन के आंकड़ों को देखें तो पहले पांच साल में प्रस्तावों के दस प्रतिशत निवेश का ही जमीनी क्रियान्वयन हो पाया है। मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार सुरेश शर्मा बीते पांच सालों के निवेश प्रस्तावों का अध्ययन किया है। उनके मुताबिक, तब भी मध्य प्रदेश की सरकारें निवेश प्रस्तावों के लिए प्रयासरत रहीं और तब जितने निवेश प्रस्ताव मिले, उनमें से करीब चौदह से सोलह प्रतिशत सालाना ही जमीनी हकीकत बन पाए। ग्लोबल इन्वेस्टर समिट में यह सवाल मध्य प्रदेश के मुख्यसचिव अनुराग जैन के सामने उठा भी। अनुराग जैन के अनुसार, यह मसला राज्य सरकार की जानकारी में भी है। इसलिए जिलावार ऐसे प्रस्तावों को साप्ताहिक स्तर पर समीक्षा करने और उसे जमीनी हकीकत बनाने की तैयारी की गई है। जिला अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि उनके जिले के लिए जो भी प्रस्ताव आए हैं,  उन्हें जमीनी हकीकत बनाने, निवेशकों को जरूरी वैधानिक जरूरतों को पूरा करने की कोशिश उनके स्तर पर ही होनी चाहिए। मध्य प्रदेश के मुख्यसचिव के स्तर पर निवेश प्रस्तावों पर मासिक रूप से समीक्षा की जाएगी। 

आधुनिक आर्थिकी का फॉर्मूला है कि अगर एक रूपया कारोबारी अर्थव्यवस्था में डाला जाता है तो वह चार रूपए की आर्थिकी में तबदील होता है और वही रूपया अगर खेती-किसानी में जाता है तो खेती-किसानी की आर्थिकी में वह साढ़े तीन गुना की आर्थिकी बनाता है। मध्य प्रदेश के निवेश प्रस्तावों को इस फॉर्मूले के नजरिए से भी बेहद उम्मीद से देखा जा रहा है। 

मध्य प्रदेश पिछले एक दशक से बड़े राज्यों में तेजी से विकसित होने वाला राज्य है। छोटे राज्यों में यह हैसियत सिक्किम को हासिल  है। मध्य प्रदेश को सबसे ज्यादा करीब आठ लाख 616 हजार करोड़ का निवेश प्रस्ताव औद्योगिक नीति और निवेश विभाग को मिले हैं, जबकि दूसरे स्थान पर करीब पांच लाख  72 हजार करोड़ के निवेश प्रस्ताव नवीकरण ऊर्जा के क्षेत्र के लिए मिले हैं। मध्य प्रदेश की जैसी स्थिति है, उसकी वजह से अगर ये निवेश प्रस्ताव जमीनी हकीकत बने तो आने वाले दिनों में यह राज्य नवीन ऊर्जा का केंद्र बन जाएगा।  

निवेश प्रस्तावों की चर्चा करते वक्त हमें पिछली सदी के आखिरी वर्षों को भी याद कर लेना चाहिए। जब केंद्र में वाजपेयी सरकार थी तो उसने उदारीकरण के अगले चरण की शुरूआत की थी। इसके तहत अर्थव्यवस्था में एफडीआई का जोर बढ़ा। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हासिल करने के लिए राज्य सरकारों में होड़ मची। केंद्रीय स्तर पर भी तेज प्रयास हो रहे थे, लेकिन राज्यों में भी होड़ मची। तब वामपंथ शासित पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के साथ ही बिहार जैसे राज्यों ने एफडीआई में अपनी नीतियों के चलते दिलचस्पी नहीं दिखाई या फिर कानून-व्यवस्था की स्थिति के चलते निवेशक वहां आने से हिचकते रहे। बाद के दिनों में पश्चिम बंगाल की बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार ने पश्चिम बंगाल में तेजी से निवेश करने की कोशिश की तो वहां की राजनीति में भूचाल आ गया। राज्य की मौजूदा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ताजपोशी उसी भूचाल का नतीजा कही जा सकती है। यह बात और है कि अब पश्चिम बंगाल में भी कहा जाने लगा है कि अगर बुद्धदेव भट्टाचार्य की निवेश कोशिशें परवान चढ़तीं और राजनीति नहीं होती तो पश्चिम बंगाल की आर्थिक स्थिति कुछ और होती। बंगाल के सिंगूर प्रोजेक्ट को ही गुजरात में सफलता पूर्वक ले जाकर और उसे स्थापित करने के बाद नरेंद्र मोदी ने विकास के गुजरात मॉडल का फॉर्मूला पेश किया और देखते ही देखते आर्थिक सफलता के साथ वे राजनीति की सीढ़ियों पर चढ़ते चले गए। 

मध्य प्रदेश में भी कुछ उसी अंदाज में निवेश की उम्मीद जताई जा रही है और माना जा रहा है कि अगर ये निवेश सफल हुए तो मध्य प्रदेश की छवि औद्योगिक और कारोबारी राज्य के रूप में उभरेगी। अगर ऐसा होता तो मोहन यादव का नेतृत्व मध्य प्रदेश में नए रूप में उभर सकता है। दिग्गजों से भरी मध्य प्रदेश बीजेपी के अंदरूनी प्रभामंडल में बीजेपी के नए और मजबूत चेहरे के रूप में मोहन यादव स्थापित हो सकते हैं। लेकिन अगर निवेश प्रस्ताव नाकाम हुए, अगर वे पूरी तरह जमीनी स्तर पर नहीं उतरे तो तय है कि इससे राज्य प्रशासन और सरकार की किरकिरी होगी, इसका असर मोहन यादव की राजनीति पर भी पड़ सकता है। इसलिए जरूरी है कि वे इसे पूरा करें। आज की राजनीति जिस मुकाम पर पहुंच चुकी है, उसमें विपक्ष हर मामले में सिर्फ मुखालफत करता ही नजर आता है। लेकिन दिलचस्प यह है कि ग्लोबल इन्वेस्टर समिट को लेकर मध्य प्रदेश के विपक्षी खेमे से कोई आवाज अभी तक नहीं उठी है। मोटे तौर पर मान सकते हैं कि इस समिट की वजह से उसे भी कम से कम अपने राज्य के लिए उम्मीद है। अब देखना यह होगा कि मोहन यादव की अगुआई वाली सरकार इसे किस हद तक जमीनी हकीकत बना पाती है। 

-उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

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