By योगेंद्र योगी | Feb 06, 2025
देश को अंग्रेजों से आजाद हुए 77 साल हो गए लेकिन कानून का राज अभी तक पूरी तरह कायम नहीं हो सका। राजनीतिक दलों के वोट बैंक के कारण जातिगत पंचायतें अभी भी कानून से इतर तुगलकी फरमान दे रही हैं। इन फरमानों के आगे शासन-प्रशासन बौने साबित हो रहे हैं। राजस्थान के करौली जिले में मीणा महासभा की महापंचायत ने लड़की पक्ष द्वारा विवाह से इंकार किए जाने पर ऐसा ही एक फरमान जारी कर दिया और प्रशासन मूक-बधिर बने खड़ा रहा। महापंचायत द्वारा गठित कमेटी ने रौंसी गांव के लड़की पक्ष के लोगों पर 11 लाख रुपए, रिश्ता तय करने में मध्यस्थ रहे दो जनों पर एक-एक लाख रुपए का दंड लगाया गया। साथ ही रौंसी गांव में लड़के पक्ष पर लगाए 11 लाख के दंड को महापंचायत ने खारिज दिया।
जुलाई 2010 में हरियाणा की सर्व खाप जाट पंचायत ने फरमान जारी किया कि लड़कियों की शादी के लिए उनके बालिग होने का इंतजार नहीं करना है। उनकी शादी अब 15 साल में ही कर देनी है। रेप की घटनाओं में हो रही बढ़ोतरी पर अंकुश लगाने के लिए यह आदेश जारी किया गया था। ऑनर किलिंग, समगोत्रिय विवाह और प्रेम विवाह को लेकर खाप पंचायत बेतुका बयान जारी करते रही हैं। खाप पंचायत को सुप्रीम कोर्ट की फटकार का ख्याल है और ना ही आलोचनाओं का, तभी तो उसके बेतुके फैसले तालिबानी औऱ तुगलकी फरमान की तरह लोगों के सिर पर पहाड़ बन कर टूटते हैं। झज्जर की खाप पंचायत का मानना था कि आर्य समाजी ढंग से होने वाली शादियों पर तत्काल से प्रतिबंध लगा देना चाहिेए। खाप ने यह बेतुका फरमान लव मैरज को रोकने के लिए सुनाया था। खाप पंचायत प्रेम विवाह के खिलाफ है। खाप ने आर्य समाज में होने वाली शादियों को दुकानदारी करार दिया था।
खाप और जातिगत पंचायतों के इस तरह के बेबुनियाद तर्क बदस्तूर जारी हैं। एक खाप ने कहा था कि बलात्कार और यौन शोषण जैसी घटनाओं को रोकने के लिए लड़कियों का बाल विवाह कर देना चाहिए ताकि वो जवान होने से पहले ही किसी की पत्नी बन जाये औऱ पुरूष उनकी और आकर्षित ना हो। महाराष्ट्र के बीड में एक महिला और उसके परिवार के सामाजिक बहिष्कार का आदेश देने पर जाति पंचायत के 9 सदस्यों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। महिला का सामाजिक बहिष्कार इसलिए किया गया था क्योंकि उसके ससुर ने उस महिला से शादी की थी, जिससे वह प्यार करता था।
राजस्थान के चाकसू कस्बे में आपसी सहमति से 2022 में तलाक लेने की जानकारी समाज के अन्य लोगों को लगी तो उन्होंने जातीय पंचायत बैठाकर तलाक लेने के लिए प्रताडि़त किया और 1,51,000 रुपए आर्थिक दंड के रूप में देने का फैसला सुनाया। झारखंड ऐसी पंचायतों के फैसलों के लिए बदनाम रहा है। पलामू गढवा और लातेहार में 65 से अधिक पंचायतों पर एफआईआर दर्ज हुई। कई ऐसे भी मामले हैं जिन पर एफआईआर दर्ज नहीं हुई, शिकायतकर्ता सामने नहीं आए हैं। झारखंड में पंचायत के फैसले के बाद 36 से अधिक लोगों की मौतें हुई। 40 से अधिक दुष्कर्म के मामले में पंचायत बैठी है, जिनमें आरोपियों को बचाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने ऑनर किलिंग मामले की सुनवाई करते हुए खाप पंचायत पर बड़ा फैसला सुनाया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि खाप पंचायत का किसी भी शादी पर रोक लगाना अवैध है। अदालत ने कहा था कि अगर कोई भी संगठन शादी को रोकने की कोशिश करता है, तो वह पूरी तरह से गैर कानूनी होगा। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों की रोकथाम और सजा के लिए गाइडलाइन जारी की। इसके बावजूद देश के किसी न किसी कोने से पंचायतों के मनमाने निर्णय सामने आते रहते हैं। राजनीतिक दल जातिगत पंचायतों के ऐसे फैसले रोकने के बजाए इनमें वोट बैंक के हित ढूंढती नजर आती हैं। यह निश्चित है जब तक राजनीतिक दल वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर कानून का शासन करने पर एकराय नहीं होंगे, तब तक ऐसे गैरकानूनी पंचायती फैसले आते रहेंगे।
- योगेन्द्र योगी