Prabhasakshi NewsRoom: Balochistan बना महाशक्तियों की जंग का मैदान, BLA को आतंकी संगठन घोषित करवाने के China-Pak के प्रस्ताव पर अमेरिका ने लगाया Veto

By नीरज कुमार दुबे | Jun 11, 2026

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका ने पाकिस्तान और चीन की उस साझा चाल पर ऐसा झटका मारा है, जिसने इस्लामाबाद और बीजिंग दोनों की बेचैनी बढ़ा दी है। पाकिस्तान और चीन ने बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी यानि बीएलए और उसकी मजीद ब्रिगेड को वैश्विक आतंकी सूची में डालने की जोरदार कोशिश की थी, लेकिन अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन ने इस प्रस्ताव को रोक कर पूरी बाजी पलट दी।

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दरअसल यह केवल आतंकवाद का मामला नहीं, बल्कि भू-रणनीतिक दबाव की खतरनाक शतरंज है। बलूचिस्तान इस समय चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का सबसे संवेदनशील केंद्र बना हुआ है। ग्वादर बंदरगाह से लेकर खनिज परियोजनाओं तक चीन ने अरबों की पूंजी झोंक रखी है। लेकिन बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी लगातार इन परियोजनाओं पर हमले कर रही है। कराची हवाई अड्डे के पास हमला, ग्वादर पोर्ट परिसर पर हमला और जाफर एक्सप्रेस अपहरण जैसी घटनाओं ने चीन की नींद उड़ा रखी है। यही वजह है कि बीजिंग बलूच विद्रोह को अपने सामरिक विस्तार के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा मानता है।

उधर, पाकिस्तान की हालत इससे भी ज्यादा खराब है। इस्लामाबाद बलूचिस्तान में वर्षों से सैन्य अभियान चला रहा है, लेकिन विद्रोह खत्म होने की बजाय और उग्र होता जा रहा है। बलूच संगठनों का आरोप है कि पाकिस्तान वहां संसाधनों की लूट कर रहा है जबकि स्थानीय जनता को दमन, गायब किए जाने और सैन्य कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे माहौल में अगर संयुक्त राष्ट्र बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी को वैश्विक आतंकी संगठन घोषित कर देता, तो पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कठोर कार्रवाई का नैतिक आधार मिल जाता। लेकिन अमेरिका और पश्चिमी देशों ने फिलहाल यह रास्ता बंद कर दिया।

यह फैसला चीन के लिए सीधा रणनीतिक झटका माना जा रहा है। चीन वर्षों से संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान आधारित आतंकी सरगनाओं को बचाता रहा है। भारत और अमेरिका जब भी जैश-ए-मोहम्मद या लश्कर जैसे संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते थे, तब बीजिंग तकनीकी रोक लगाकर उन्हें बचाने में जुट जाता था। अब वही चीन अपने हितों की रक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र पहुंचा, लेकिन इस बार अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन ने उसकी चाल रोक दी। यह वैश्विक कूटनीति का बेहद तीखा पलटवार माना जा रहा है।

सामरिक नजरिए से देखें तो यह फैसला चीन पाकिस्तान गठजोड़ के खिलाफ दबाव की नई रणनीति का हिस्सा दिखता है। अमेरिका शायद यह संदेश देना चाहता है कि हिंद महासागर क्षेत्र में चीन का विस्तार बिना चुनौती के नहीं चलने दिया जाएगा। बलूचिस्तान में अस्थिरता जितनी बढ़ेगी, चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे पर उतना ही दबाव बढ़ेगा। यही वजह है कि इस फैसले को केवल आतंकवाद विरोधी कार्रवाई के नजरिए से नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे महाशक्तियों के टकराव की नई परत माना जा रहा है।

देखा जाये तो बलूचिस्तान की राजनीति पर इसका असर बेहद गहरा हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान और चीन की मांग रुकने से बलूच अलगाववादी गुटों का मनोबल बढ़ेगा। उन्हें यह संदेश जाएगा कि वैश्विक ताकतें पूरी तरह पाकिस्तान के पक्ष में नहीं खड़ी हैं। इससे बलूच राष्ट्रवादी आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय चर्चा में जगह मिलने की संभावना बढ़ सकती है। पाकिस्तान के लिए यह बेहद खतरनाक संकेत है क्योंकि वहां पहले ही सेना और विद्रोही गुटों के बीच टकराव तेजी से बढ़ रहा है।

साथ ही चीन के लिए भी खतरा कम नहीं है। ग्वादर और बलूचिस्तान में चल रही परियोजनाओं की सुरक्षा पर अब और भारी खर्च करना पड़ेगा। चीनी इंजीनियर और कर्मचारी पहले ही हमलों के डर में काम कर रहे हैं। अगर बलूच विद्रोह को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह आतंकवाद की श्रेणी में नहीं धकेला जाता, तो चीन की रणनीतिक परियोजनाओं पर हमलों का जोखिम लगातार बना रहेगा।

बहरहाल, संयुक्त राष्ट्र में हुआ यह घटनाक्रम साफ बता रहा है कि दुनिया की राजनीति अब केवल आतंकवाद विरोध तक सीमित नहीं रही। अब हर फैसला सामरिक दबाव, आर्थिक गलियारों और वैश्विक शक्ति संघर्ष से तय हो रहा है। पाकिस्तान और चीन ने जिस प्रस्ताव को अपनी कूटनीतिक जीत समझा था, वही उनके लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर करारा झटका बन गया। बलूचिस्तान अब केवल पाकिस्तान का आंतरिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि वह एशिया की सबसे विस्फोटक भू-राजनीतिक जंग का केंद्र बन चुका है।

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