US Tariff की धमकी ने बदला तेल का पूरा खेल, रूस-भारत डील पर मंडराया बड़ा संकट।

By Ankit Jaiswal | Jan 08, 2026

केपलर में रिफाइनिंग, सप्लाई और मॉडलिंग के लीड रिसर्च एनालिस्ट सुमित रितोलिया के अनुसार, अगर सरकार की ओर से कोई सीधा हस्तक्षेप नहीं होता है तो भारत रूस से रोजाना करीब 11 से 13 लाख बैरल कच्चा तेल आयात करता रहेगा।


गौरतलब है कि अमेरिका की ओर से 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की धमकी ने इस मुद्दे को नई गंभीरता दी है। मौजूद जानकारी के अनुसार, रितोलिया का कहना है कि इतनी बड़ी दंडात्मक कार्रवाई भारत की खरीद नीति को पूरी तरह बदल सकती है और ऐसे में केंद्र सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि रूस से तेल को लेकर उसकी आधिकारिक नीति क्या है। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक सरकार खुद आयात रोकने का निर्देश नहीं देती, तब तक रूसी तेल की खरीद अचानक बंद करना आसान नहीं है, क्योंकि रिफाइनरियां नीति संकेतों के आधार पर ही फैसले लेती हैं।


विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत के पास रूसी कच्चे तेल के विकल्प मौजूद हैं। बता दें कि मध्य पूर्व के देशों से अधिकांश जरूरतें पूरी की जा सकती हैं और इसके अलावा अमेरिका तथा पश्चिमी अफ्रीका से भी आपूर्ति संभव है। हालांकि, रितोलिया ने आगाह किया कि ऐसा करने पर भारत को सस्ता यानी डिस्काउंट वाला रूसी तेल छोड़ना पड़ेगा, जिससे औसत कच्चे तेल की कीमत बढ़ेगी और कुल आयात बिल पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।


उन्होंने यह भी कहा कि अगर सप्लाई में किसी तरह का बड़ा व्यवधान आता है तो भारत को दीर्घकालिक अनुबंधों पर ज्यादा निर्भर होना पड़ेगा, सप्लायरों में विविधता लानी होगी और रिफाइनरियों को अपनी तकनीकी क्षमता के हिसाब से ऑप्टिमाइज करना होगा। इससे संकेत मिलता है कि अस्थिर वैश्विक तेल बाजार में जोखिम और लागत को संतुलित करने के लिए भारत की रणनीति में बदलाव हो सकता है।


गौरतलब है कि यह चर्चा ऐसे समय तेज हुई है, जब अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने कहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस पर नए प्रतिबंधों से जुड़े एक द्विदलीय विधेयक को मंजूरी दे दी है। इस प्रस्तावित कानून के तहत उन देशों को दंडित किया जा सकेगा, जो रूस से सस्ता तेल खरीद रहे हैं, जिनमें भारत का नाम भी शामिल है। यह कदम यूक्रेन पर 2022 में हुए रूसी हमले के बाद शांति वार्ता न होने के संदर्भ में उठाया जा रहा है।


लिंडसे ग्राहम ने सोशल मीडिया पर कहा कि यह बिल राष्ट्रपति ट्रंप को भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों पर दबाव बनाने का मजबूत हथियार देगा, ताकि वे रूस से सस्ता तेल खरीदना बंद करें, जिससे युद्ध को मिलने वाली आर्थिक मदद पर रोक लगाई जा सके।


केपलर के विश्लेषक सुमित रितोलिया का मानना है कि अगर यह कानून लागू होता है तो भारत की कच्चे तेल की सोर्सिंग रणनीति में बड़ा बदलाव आ सकता है। हालांकि, मौजूदा स्तर पर आयात जारी रखने से भारत को कीमतों में छूट और रिफाइनरियों के स्थिर संचालन का फायदा मिलता रहता है, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

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