मारने के दीवाने हम (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Mar 29, 2022

मारना ऐसा शब्द है जिससे घुमा फिराकर खतरा जुड़ा हुआ है। वैसे इस शब्द में सौम्य, अच्छे व सकारात्मक भाव भी हैं। वह बात दीगर है कि हमारे समाज में मारने और मरवाने का शौक बढ़ता जा रहा है। तथाकथित माननीय कहे जाने वाले प्रभावशाली लोग तो आम लोगों को ज़बान से ही मारने की पूरी कोशिश करते हैं और वास्तव में कई बार तो आधा या पूरा मार ही देते हैं। आम लोग भी बातचीत में सुबह से रात तक इस शब्द का बहुतेरा प्रयोग करते हैं। कपड़ों पर प्रेस मार दो, थप्पड़ मारना, कार पर पानी मारना या फेंकना, स्विच पर हाथ मारना, बातें मारना, धक्का मारना, मिस्ड कॉल मारना, प्यास के मारे, पैसे मार लिए, लकड़ी में कीलें मारना, खीर या कढ़ी में कडछी मारना, खराटे मारना व दाल में छौंका मारना आदि अनेक छोटे वाक्य हैं जिनमें अन्य उपयुक्त शब्दों जैसे करना, लगाना, डालना या कारण की जगह मारना शब्द प्रयुक्त किया जाता है। यानी हम वास्तव में मारते नहीं पर कहते हैं ।

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मारने का काम आजकल सेल फोन ने ज़्यादा बढ़ा दिया है। मित्र परिचित, यार रिश्तेदार फोन करते हुए डायलाग बोलते हैं, ‘मैं तो आज आपको फोन मारने (करने) की सोच ही रहा था’। एक दूसरे को भेजे चित्र, संदेश, सुबह से शाम तक भेजे वीडियो को समय मिलने पर डिलीट मारते हैं। क्या उपलब्ध उचित शब्दों की जगह, मारना शब्द प्रयोग करना, मानव जीवन में ईमानदार प्रयासों से उगाई आक्रामकता के कारण नहीं है। मारना शब्द में इंसान को पसंद, गति और शक्ति है शायद इसी कारण हमारे विकसित होते जाते जीवन में बोलचाल की बदहाली सदियों से जारी है।  


डिक्शनरी में भी मारना शब्द सैंकड़ों वर्ष से है। मिसाल के तौर पर, मुक्का मारना, मार गिराना, मार भगाना, किसी का पैसा मार लाना, किसी को भूखा मारना, लात मारना, सेंध मारना जैसे अनेक छोटे वाक्य हैं जो दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। कीड़े मारना, डुबकी मारना, टक्कर मारना, नकल मारना या मछली मारना जैसे प्रयोग भी हैं। इन शब्दों ने व्यवहारिक प्रयोग में आते आते काफी समय लिया होगा। शब्दकोष की इमारत भी तो भाषा के इंसानी कारीगरों ने चिनी है। बोलचाल की भाषा में यह हमारा शॉर्टकट ही तो है तभी तो कितनी ही क्रियाओं के लिए मार या मारना आदि प्रयोग किया जा रहा है।

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शुरुआत में जब यह शब्द वाक्यों में लाए जा रहे थे तो उस भाषाई घटना के समय बात या क्रिया के भाव के अनुसार प्रयोग शुरू नहीं हो पाए। ऐसा किया गया होता तो हम ज़िंदगी में ‘मारना’ कम कर रहे होते। आशंका तो यही है, तब भी समय और इच्छाशक्ति का अभाव रहा होगा। क्या ऐसा हो सकता है कि अब इस सन्दर्भ में बदलाव बारे सोचा जाए, वह बात दीगर है कि उचित व सही शब्द का प्रयोग शुरू करने का समय किसी के पास भी कहां है। जनाब, और भी ग़म हैं ज़माने में सही शब्द चुनने और बोलने के सिवाय।


- संतोष उत्सुक

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