चीन से क्या हम भाषायी बोध सीख सकते हैं

By उमेश चतुर्वेदी | Jan 12, 2026

हिंदी के संदर्भ में देखें तो राजभाषा और राष्ट्रभाषा के बीच शाब्दिक ही नहीं, भावात्मक फर्क भी है। फिर भी एक बड़ा वर्ग हिंदी को राष्ट्रभाषा भी मानता है। यही वजह है कि हर साल ग्रेगोरियन कैलेंडर के नौंवे महीने की दस्तक के साथ ही, हर सरकारी दफ्तर राजभाषा पखवाड़े या महीने को लेकर उत्साह से भर उठता है। कुछ ऐसा ही पड़ोसी चीन में भी अब होता नजर आ रहा है। अब वहां सितंबर का तीसरा सप्ताह ‘राष्ट्रीय सामान्य भाषा और लिपि’ को समर्पित होगा। भारत और चीन के सितंबर महीने के भाषायी उत्साह में एक अंतर रहेगा, राष्ट्रभाषा बनाने की आस में हिंदी के राजभाषा ओहदे को याद किया जाएगा, जबकि चीन अपनी मंदारिन भाषा को बाकायदा राष्ट्रभाषा के तौर पर और आगे बढ़ाने की ओर अग्रसर होगा। 


भाषायी चिंतन और व्यवहार को लेकर भारत और चीन को लेकर तकरीबन एक ही सोच है। भारत में एक मानस ऐसा है, जिसे हिंदी की कीमत पर भी पर अंग्रेजी स्वीकार्य है। यह धारा मानती है कि वेगवान आर्थिक विकास की वजह से चीन का भाषायी व्यवहार भी इसी भारतीय मानस की तरह बदल चुका है। बेशक चीन ने अंग्रेजी सीखने-सिखाने की दिशा में भरपूर निवेश किया है। अपनी आर्थिक ताकत के चलते पश्चिम के नामी विश्वविद्यालयों में चीनी सत्ता प्रतिष्ठान अपने लिए अध्ययन पीठ स्थापित कर चुका है। गौर करने की बात है कि उसने यह सब अलग और अतिरिक्त अनुशासन और ज्ञान के साधन के तौर पर किया है, भारत की तरह अपनी भाषा, विशेषकर हिंदी की कीमत पर ऐसा नहीं किया है। 


अंग्रेजी का पहला वैश्विक विस्तार ब्रिटिश उपनिवेशीकरण के दौर में हुआ और दूसरी बार उसका प्रसार रीगन-थैचर की जोड़ी के आर्थिक उदारीकरण के बढ़ते कदमों के साथ हुआ। इस संदर्भ में चीन और भारत के भाषायी चिंतन और व्यवहार फर्क साफ नजर आता है। पिछली सदी के अस्सी के दशक में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख देंग झिआओपिंग ने आर्थिक खुलेपन की नींव रखी। यह 1978 का साल था। इसके ठीक दो साल बाद भारत में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई और उन्होंने भी धीरे-धीरे इंस्पेक्टर राज कम करने की शुरूआत की। उनकी उदारीकरण की सोच को राजीव गांधी ने परवान चढ़ाया। 1991 के आम चुनावों के घोषणा पत्र में कांग्रेस ने पहली बार समाजवादी आर्थिक नीतियों के बरक्स उदारीकरण का वादा किया। तब से अब तक की दोनों देशों की आर्थिक विकास यात्रा को देखें तो अंतर साफ नजर आता है। चीन आज अमेरिका के बाद दुनिया की दूसरी बड़ी आर्थिक महाशक्ति है। उसकी तेज आर्थिक यात्रा के समानांतर अंग्रेजी का विस्तार नहीं दिखता। जबकि भारत में इसके ठीक उलट नजारा दिखता है। 

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उदारीकरण के बरक्स दोनों देशों के भाषायी चिंतन में भी फर्क नजर आता है। यह फर्क ही है कि चीन अब अपनी मंदारिन भाषा और उसकी लिपि को लेकर सितंबर महीने के तीसरे हफ्ते को समर्पित कर रहा है। चीन की सर्वोच्च विधि निर्माता संस्था ‘राष्ट्रीय जन प्रतिनिधि सभा’ की स्थाई समिति द्वारा बीते 27 दिसंबर को इससे जुड़ा कानून पारित करना इसी सोच का प्रतीक है। इस कानून में हर वर्ष सितंबर के तीसरे सप्ताह को ‘राष्ट्रीय सामान्य भाषा और लिपि संवर्धन एवं प्रचार सप्ताह’ के रूप में मनाना तय किया गया है। यह कानून पुराने राष्ट्रीय भाषा कानून में संशोधन के बाद आया है। चीन में दो तरह की मंदारिन का प्रयोग होता है, एक लिखित और दूसरी मौखिक। इस कानून में दोनों तरह की भाषाओं का ध्यान रखा गया है। 


चीन अपनी भाषा और लिपि को अपने राष्ट्र का प्रतीक मानता है। चीन में इन दिनों प्रौद्योगिकी और डिजिटल जगत में लगातार प्रगति हो रही है। यहां ऑडियो-विजुअल प्रोग्रामिंग और गेमिंग भी बढ़ी है। चीन का भाषायी कानून इन सबमें इस्तेमाल होने वाली भाषा के साथ कदमताल करने का प्रयास है। कहा जा सकता है कि चीनी राष्ट्रभाषा और लिपि कानून में यह संशोधन तेजी से विकसित हो रही संचार प्रौद्योगिकियों और ऑनलाइन सामग्री के विस्तार के बीच भाषा के मानकीकरण को मजबूत करने की कोशिश है। इस कानून में साइबरस्पेस प्रशासन को लेकर भी व्यवस्था की गई है। इसके तहत अब ऑनलाइन सांस्कृतिक कार्यक्रमों, वेब सीरीज, ऑनलाइन फिल्मों, ऑनलाइन गेम और अन्य डिजिटल प्रकाशनों में मानक चीनी भाषा  यानी मंदारिन और मानकीकृत चीनी अक्षरों को मूल भाषा के रूप में उपयोग करना जरूरी होगा। इसके साथ ही चीन में होने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों, कॉन्फ्रेंस, इवेंट्स आदि के साइनबोर्ड, लेबल या प्रमोशनल मैटीरियल में विदेशी भाषाओं के साथ ही मानक चीनी भाषा भी शामिल करने पर जोर दिया गया है। इसकी तुलना में भारतीय राष्ट्रभाषा और आधुनिक प्रौद्योगिकी संग उसके तालमेल पर नजर डालें साफ फर्क नजर आता है। भारत अब भी राष्ट्रभाषा से दूर है। हिंदी को राष्ट्रभाषा मानने वाली ताकतों के सुर भी अब धीमे पड़ते जा रहे हैं। लेकिन चीन अपने आर्थिक उदारीकरण के बावजूद अपनी भाषा की ओर लौटता नजर आ रहा है।

 

इसके साथ ही चीन के भाषायी आंकड़ों पर भी नजर डालना जरूरी है। यहां की करीब 80 प्रतिशत से ज़्यादा आबादी मंदारिन बोल सकती है। चीन में करीब 97.33 प्रतिशत लोग साक्षर हैं। इनमें करीब 95 प्रतिशत से ज़्यादा लोग मानक चीनी अक्षरों का प्रयोग करते हैं। चाइना इंटरनेट नेटवर्क इन्फॉर्मेशन सेंटर की ताजा रिपोर्ट के अनुसार बीते जून तक चीन में एक अरब 12 करोड़ से ज़्यादा इंटरनेट यूज़र थे। इसी रिपोर्ट के अनुसार, चीन में इंटरनेट इस्तेमाल की दर 79.7 प्रतिशत तक पहुँच गई है। भाषायी कानून में इन आंकड़ों के मद्देनजर सरकारी और पब्लिक सर्विस वेबसाइट और मोबाइल एप्लिकेशन के लिए भी सरकारी नियमों और मानकों के अनुसार, राष्ट्रीय मानक भाषा का इस्तेमाल जरूरी हो गया है। इस कानून का लक्ष्य "चीनी राष्ट्र के प्रति मजूबत सामुदायिक भावना का विकास "और "सांस्कृतिक आत्मविश्वास की मज़बूती" है। कानून इस बात पर भी ज़ोर देता है कि बोली और लिखी जाने वाली मानक चीनी भाषा के इस्तेमाल का मकसद राष्ट्रीय संप्रभुता, एकता और जातीय एकजुटता बनाना होना चाहिए। यह कानून शिक्षा में भी मानक चीनी भाषा की भूमिका पर ज़ोर देता है। कानून के अनुसार, शिक्षण और पाठ्य सामग्री में मानक मंदारिन ही बुनियादी भाषा होगी। यह भारत की नई शिक्षा नीति जैसा ही है, जिसमें प्राथमिक स्तर पर भारतीय भाषाओं के जरिए शिक्षण पर जोर दिया गया है। इस कानून के तहत संस्कृति, पर्यटन और ट्रांसपोर्ट जैसे सेक्टर में सर्विस देने वाले कर्मचारियों के लिए मानक मंदारिन जानना जरूरी होगा। इस कानून में मानक चीनी सीखने या प्रयोग में बाधा डालने पर सजा का प्रावधान भी है। हालांकि पहले उन्हें इसके लिए आगाह किया जाएगा। यहां ध्यान देने की जरूरत है कि भारत में भाषा को नकारने को लेकर कोई सजा का प्रावधान नहीं है। 


वैसे इस कानून के दुरूपयोग की चिंता भी जताई जा रही है। चीनी संविधान और जातीय स्वायत्तता व्यवस्था के तहत, स्वायत्त क्षेत्रों मसलन, तिब्बत, शिनजियांग, इनर मंगोलिया, गुआंग्शी, निंग्शिया आदि को क्षेत्रीय स्वायत्तता कानूनों के अनुसार, सरकारी कार्यों, शिक्षा और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में राष्ट्रीय भाषा के साथ-साथ एक या अधिक स्थानीय भाषाओं के इस्तेमाल का प्रावधान है। लेकिन शी चिनफिंग के शासन में ये प्रावधान कमज़ोर होते गए हैं। इसका असर तिब्बत में दिखता है, जहां कई सालों से चल रहे मातृभाषा आंदोलन और सांस्कृतिक शिक्षा का दमन किया गया। इसकी वजह से वहां निजी स्कूल बंद कर दिए गए और उनके संस्थापक गिरफ्तार कर लिए गए। तिब्बतियों को आशंका है कि इस कानून के तहत उनके खिलाफ दमन का एक और चक्र शुरू हो सकता है। 


साल 1994 में फ्रांस ने अपने यहां अंग्रेजी के बिलावजह प्रयोग को कानून के जरिए रोक लगाई थी। अब चीन का अपनी मानक भाषा को स्थापित करने का कानून आया है। यह सब देखते हुए भी भारत की मौजूदा राजनीतिक हालात के मद्देनजर ऐसे कानून का सुझाव देना भी संभव नहीं लगता। लेकिन चीन के इस भाषायी बोध के बहान अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि एक दिन भारत में भी ऐसी सोच जरूर विकसित होगी। 


-उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

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