साक्षात्कार- कोरोना वैक्सीन को लेकर सर गंगाराम अस्पताल के कोविड इंचार्ज से बातचीत

By डॉ. रमेश ठाकुर | Dec 14, 2020

सब कुछ ठीक रहा तो जनवरी में कोरोना के टीके को केंद्र सरकार मंजूरी दे देगी। उसके बाद दवा सार्वजनिक हो जाएगी, आम दवाओं की तरह मुहैया होने लगेगी। वैक्सीन के सफल ट्रायल को लेकर चिकित्सा विज्ञान जगत गदगद है। उम्मीद है टीके के मंजूरी के बाद कोरोना से मुक्ति मिलेगी। दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल के गेस्टो प्रमुख व देश के प्रख्यात चिकित्सक प्रो. डॉ. अनिल अरोड़ा कहते हैं किसी भी दवा को जारी करने से पहले उसका ठीक से क्लिनिकल ट्रायल होना चाहिए। कोरोना की वैक्सीन की एबीसीडी को समझने के लिए डॉ. रमेश ठाकुर ने उनसे विस्तृत बातचीत की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश।

उत्तर- समूचा हिंदुस्तान कोविड-19 से ग्रसित ही नहीं, बल्कि अब भयभीत होने लगा है। इसलिए बहुत जरूरी है, टीका जल्द से जल्द मुहैया हो। ज़िम्मेदारी मेडिकली हब ‘भारत बायोटेक‘ के कंधों पर है। लेकिन मैं फिर भी कहूँगा कि चाहे कोरोना की वैक्सीन हो या फिर किसी अन्य हारी-बीमारी के लिए किसी भी किस्म की दवा-टीका को प्रोड्यूस करना। जारी करने से पहले उसका विधि पूर्वक प्रॉपर ढंग से क्लीनिकल ट्रायल जरूर होना चाहिए। पर, कोरोना के लिए जो टीका मुहैया होने वाला है उसका तीन फेसों में ट्रायल हुआ है जिसमें सफलता मिली है, इसलिए अब उम्मीदें ज्यादा बढ़ गई हैं।

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प्रश्न- प्रधानमंत्री ने भी भरोसा दिलाया है कि कुछ दिनों के बाद टीका जारी हो जाएगा?

उत्तर- वैक्सीन देश में प्रभावी रूप से मुहैया हो इसकी आस सभी लगाए बैठे हैं। प्रधानमंत्री ने खुद इस बात को दोहराया है तो भरोसा और बढ़ गया है। टीके का तीसरा फेस अंतिम चरण में है। पिछले दो चरणों में परिणाम अच्छे आए, किसी तरह का दुष्परिणाम नहीं दिखा। ये अच्छी खबर है हमारे लिए। डब्यूएचओ ने भी स्वीकृति प्रदान की है। चिकित्सा विज्ञान ने भी अपने विश्लेषण में सुरक्षित और उपयोगी पाया है। 

प्रश्न- हरियाणा के गृहमंत्री पर ट्रायल होने के बाद भी खामियां सामने आईं?

उत्तर- खामियां नहीं थीं, प्रॉपर तरीके से टीके का डोज पूरा नहीं हुआ था। टीके के दो स्टेज होते हैं। प्री और सेकेंड। उन्हें प्री टीका दिया गया था, दूसरा नहीं। इसलिए उन पर टीके ने असर नहीं किया। खैर, अच्छा ही हुआ इससे हमें टीके का व्यवहार भी पता चला। इतनी सीख हमें लेनी चाहिए, टीके के कोर्स को अधूरा छोड़ना किसी खतरे से खाली नहीं। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि भारत बायोटेक अपने मिशन में सफल हो और कोरोना से सभी को मुक्ति मिल सके। टीके को जारी करने की घोषणा शायद जनवरी तक केंद्र सरकार कर देगी। सभी को बेसब्री से इंतजार है।

प्रश्न- ऐसा तो नहीं जब तक टीके को मंजूरी मिलेगी, उससे पहले कोरोना खुद खत्म हो जाएगा?

उत्तर- अगर खत्म हो जाए तो अच्छी बात है। बहरहाल, कोरोना इतनी जल्दी जाने वाला नहीं, उसे खत्म करने के लिए तोड़ खोजना ही होगा। फिलहाल उस खोज की तैयारी अंतिम चरण में है। जनवरी में केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद सार्वजनिक रूप से टीका मुहैया हो जाएगा। कोरोना को हमें अभी हल्के में नहीं लेना। सरकार की गाइडलान को फॉलो करते रहना है। जागरूकता के नियमों को अपनाना होगा। इसमें किसी और का नहीं, बल्कि खुद का भला है। मास्क का प्रयोग और दो गज की दूरी बनाकर रखनी होगी।

प्रश्न- टीके के प्रयोग के बाद कोरोना नहीं होने की गारंटी रहेगी?

उत्तर- साक्ष्यों के आधार पर यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। कोरोना अपना व्यवहार बदल रहा है, जहां से इसका असर कम हो जाता है, वहां कुछ समय बाद फिर से पैर पसार लेता है। इसलिए मेरी व्यक्तिगत सोच यही है टीके के बाद हमें मरीज को सतर्क रहने की जरूरत होगी। हां, इतना जरूर है इस टीके की प्रतिरोध क्षमता बेजोड़ है। यह शरीर की एंटीबॉडी को क्षमतावान बनाता है। दूसरे वायरस भी इससे खत्म होंगे।

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प्रश्न- कोरोना के बीच दूसरी बीमारियाँ भी चुनौती बनीं हुई हैं?

उत्तर- देखिए, समूचा चिकित्सा विज्ञान कोविड से निपटने में लगा है। दूसरी बीमारियों से ग्रसित मरीज़ों की देखरेख पहले जैसी नहीं हुई ये बात सच है। प्रभावी लॉकडाउन में मरीज कई तरह की चुनौतियों से जूझे। बच्चों को समय पर टीका मुहैया नहीं हुआ। कोरोना से लड़ने के लिए पूरा संसार एक हुआ है, होना भी चाहिए। हमारे यहां आज भी कोविड की पहली लहर चल रही है, जबकि कई जगहों पर दूसरी-तीसरी आ गई है। केंद्र सरकार ने कोविड से लड़ने के लिए मजबूत ढाँचा तैयार किया हुआ है। लेकिन इसके साथ-साथ हमें दूसरी बीमारियों पर भी उचित प्रबंध करने होंगे।

प्रश्न- कोविड काल में कई लोगों ने हताश होकर अपने जीवन को समाप्त कर लिया?

उत्तर- ये आंकड़ा बहुत ही भयावह है। जब कभी कोरोना काल खत्म होगा और हानि की समीक्षा होगी, तब पता चलेगा, इस क्रूरकाल ने हमसे कितना कुछ छीना। इस बेहद मुश्किल समय को लोग ज्यादा सहन नहीं कर पा रहे। सैंकड़ों में नहीं, हजारों की संख्या में लोगों ने आत्महत्याएँ कीं। यह सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है। अवसाद से ग्रस्त लोगों की तादाद भी अस्पतालों में दिनोंदिन बढ़ रही है। हमारे पास आने वाले करीब चालीस फीसदी मरीज डिप्रेशन से पीड़ित होते हैं।

-जैसा डॉ. रमेश ठाकुर से कहा।

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