सम्मान के सामने पदक क्या है (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Aug 26, 2021

पिछले दिनों ओलम्पिक में हारी टीम के सदस्यों ने मंत्रीजी से मुलाक़ात के दौरान कहा कि उन्हें दी जाने वाली सम्मान राशी बढाकर जीते हुए खिलाड़ियों के बराबर दी जाए। उन्हें प्लाट दिया जाए ताकि मकान का जुगाड़ हो। पदक तो नहीं ला सके लेकिन हार या जीत ज़्यादा मायने नहीं रखती। पदक मिले या नहीं अच्छा खेलना ज़रूरी होता है। अच्छा खेलकर सम्मान तो बरकरार रखा ही है। मंत्रीजी को न सही उनके दिमाग को लग रहा होगा कि उन्होंने सम्मान राशि देने की घोषणा क्यूं की। वैसे सम्मान के सामने पदक की क्या बिसात है।

यह भी सम्मान है कि सरकार करोड़ों का ऑफर देती है। उसे लगता है इतने पैसे का ईनाम सुनकर खिलाड़ी का दिमाग, शरीर और भावना उसकी परफॉरमेंस में चमत्कार भर देंगी और पदक हाथ में होगा। इस बार अखिलाड़ियों के लिए नया सम्मान भी रखा गया, जो एथलीट अच्छा प्रदर्शन नहीं करेंगे उन पर कारवाई की जाएगी। संभवत यह चेतावनी ली नहीं गई। यहां तो ट्रायल भी फिटनेस के लिए रखे गए। क्या यह वैसा ही नहीं रहा जैसे चुनाव राजनेताओं की बुद्धि के राजनीतिक ट्रायल होते हैं। जिनका जातीय, आर्थिक, साम्प्रदायिक और धार्मिक प्रशिक्षण और अभ्यास बेहतर होता है वह जीत जाते हैं। खिलाड़ी कहते हैं कि उनका खान पान और अभ्यास बेहतरीन हुआ है लेकिन वोटर खा पीकर भी हरा देता है।

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राजनीति में भी तो हारे हुए खिलाड़ियों को किसी न किसी रंग व आकार की कुर्सी दी जाती है ताकि वे हारने की थकान उतार सकें। कुर्सी से चिपके रहने का मेहनताना भी मिलता है। जीत जाएं तो खुद को ओलंपियन से बेहतर खिलाड़ी समझने लगते हैं। हारे हुए राजनेता भी सम्मान को सामान समझकर पूरा हथिया लेते हैं। जनता ख़्वाब देखती रहती है कि इन्हें वापिस बुलाकर वापिसी सम्मान देने की रीत शुरू की जाए ताकि उन्हें समझ आए कि वे ठीक से खेल नहीं पाए। यह सम्मान शुरू हो जाए तो...

कहते रहो, लिखते रहो कि छोटे छोटे देश हमारे से कहीं ज़्यादा पदक ले गए हैं तो उचित जवाब यही रहेगा सम्मान के सामने पदक कुछ नहीं होता।

- संतोष उत्सुक

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