By अभिनय आकाश | Jul 13, 2026
28 फरवरी के बाद से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कभी शांति दूत बन जाते हैं। कभी दुनिया के सबसे बड़े सेनापति, लेकिन ईरान के मामले में चिट भी मेरी और पट भी मेरी का इरादा रखने वाले ट्रंप की एक न चली। अमेरिका ने ईरान के साथ युद्ध विराम खत्म करके दोबारा हमले की शुरुआत ऐसे समय में की, जब ईरान अयातुल्लाह अली खामनेई को सुपर्द-ए-खाक करने के लिए एक विश्वस्तर का बड़ा आयोजन शुरू कर चुका था। अमेरिकी अखबरा गार्डियन की खबर के अनुसार 6 दिनों के आयोजन में अली खामनेई के तकरीबन 3 करोड़ समर्थकों के शामिल होने की बात सामने आई है। अली खामनेई का पार्थिव शरीर इराक के नजफ हवाई अड्डे से मशहद तक लाया गया। ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को उत्तर-पूर्वी शहर मशहद में सुपुर्द-ए-खाक (दफ़न) किया गया। यह दफ़न एक हफ़्ते से चल रही उस ऐतिहासिक और लंबी शवयात्रा का अंतिम पड़ाव थी, जो ईरान और इराक के सबसे मुकद्दस (पवित्र) धार्मिक केंद्रों तेहरान, कोम, नजफ और कर्बला की गलियों से गुज़रती हुई... आज अपने आखिरी ठिकाने मशहद पहुंची है।
मशहद... जो ईरान में शिया मुसलमानों के सबसे पवित्र धार्मिक स्थल, 'इमाम रज़ा दरगाह' का घर है। यह वही पावन दरगाह है जहाँ शिया इस्लाम के आठवें इमाम, इमाम रज़ा का मक़बरा है जो ईरान की सरज़मीं पर दफ़न होने वाले इकलौते शिया इमाम हैं। ऐसे में इसी पाक दरगाह के साए में अयातुल्ला खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक किया जाना... न सिर्फ बेहद गहरा धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि उनके पूरे जीवन और उनकी विरासत को हमेशा-हमेशा के लिए शिया इस्लाम के इस सबसे पवित्र मुकाम से जोड़ देता है।
इमाम रज़ा श्राइन ईरान की कई जानी-मानी हस्तियों के लिए भी अंतिम विश्राम स्थल बन गया है। 2024 में हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मौत के बाद पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी को वहीं दफ़नाया गया था। इस श्राइन में खामेनेई को दफ़नाए जाने से इस्लामिक रिपब्लिक के नेताओं के लिए एक प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण विश्राम स्थल के तौर पर इसकी अहमियत और बढ़ जाती है।
इस्लाम में आम तौर पर शव को जल्द से जल्द, अक्सर 24 घंटे के भीतर दफ़ना दिया जाता है। इसलिए खामेनेई के अंतिम संस्कार में हुई देरी बहुत असामान्य थी। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि उनकी हत्या के बाद देश की सुरक्षा स्थिति को देखते हुए अंतिम संस्कार को टाल दिया गया था। खामेनेई की मौत का कारण बने हमले उस समय हुए जब ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच ज़बरदस्त सैन्य टकराव चल रहा था। अधिकारियों का तर्क था कि हमले के तुरंत बाद बड़े पैमाने पर सार्वजनिक अंतिम संस्कार करने से सुरक्षा का गंभीर ख़तरा पैदा हो सकता था, क्योंकि लाखों शोक मनाने वाले लोग और हमलों की चपेट में आ सकते थे। साथ ही, अधिकारियों को देश के भीतर अशांति का भी सामना करना पड़ रहा था; जहाँ एक तरफ़ उनके समर्थक शोक मना रहे थे, वहीं सरकार-विरोधी समूह उनकी मौत का जश्न मना रहे थे, जिससे सुरक्षा से जुड़ी और चुनौतियाँ पैदा हो गई थीं। जून में एक नाज़ुक युद्धविराम समझौता होने के बाद ही ईरानी अधिकारियों ने देश भर में अंतिम संस्कार के कार्यक्रम आयोजित किए।
इतनी लंबी देरी की वजह से यह अटकलें भी लगने लगीं कि खामेनेई का शव कहाँ रखा गया था। ईरान के सरकारी मीडिया के अनुसार, चार महीने की इस पूरी अवधि के दौरान उनके शव को सुरक्षित और तापमान-नियंत्रित मेडिकल रेफ्रिजरेशन सुविधा में रखा गया था। केमिकल एम्बामिंग (रसायनों से शव को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया) के विपरीत, जिसे आमतौर पर इस्लामी परंपराओं में सही नहीं माना जाता, रेफ्रिजरेशन से शव में कोई बदलाव किए बिना उसे सुरक्षित रखा जा सकता है। जानकारों का कहना है कि शिया इस्लामी कानून युद्ध या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे जैसी असाधारण स्थितियों में शव को दफनाने में देरी करने और उसे कोल्ड स्टोरेज में रखने की इजाज़त देता है। इससे ईरानी अधिकारियों को धार्मिक नियमों का पालन करते हुए खामेनेई के शव को सुरक्षित रखने में मदद मिली।
खामेनेई के अंतिम संस्कार की रस्में सात दिनों तक चलीं और आज मशहद में दफ़नाए जाने से पहले कई शहरों से गुज़रीं।
तेहरान, जहाँ मुख्य राजकीय अंतिम संस्कार शुरू हुआ
कोम, जो शिया धार्मिक शिक्षा का ईरान का प्रमुख केंद्र है
इराक में नजफ़ और कर्बला, जो शिया इस्लाम के दो सबसे पवित्र शहर हैं
मशहद, जहाँ इमाम रज़ा दरगाह में खामेनेई को दफ़नाया गया।
मशहद में दफ़नाए जाने के साथ ही, खामेनेई के हफ़्ते भर चलने वाले अंतिम संस्कार की रस्में पूरी हो गई।
18वीं सदी में ईरान के बादशाह नादिर शाह जिसे ईरान का नेपोलियन भी कहा जाता था। उसने मशहद को अपनी राजधानी बनाया। नादिर शाह वही बादशाह है जिसने 1739 में दिल्ली पर हमला किया था और कोहिनूर हीरा लूट कर अपने साथ ले गया था। 1747 में नादिर शाह की हत्या के बाद यह हीरा अफगान सेनापति अहमद शाह दुरानी को मिल गया। इसके बाद यह शाह शुजा दुरानी के पास पहुंचा। जिन्होंने सैन्य सहायता और राजनीतिक शरण के बदले कोहिनूर महाराजा रणजीत सिंह को दे दिया था। उनकी मौत के बाद लाहौर की संधि के तहत नाबालिग महाराजा दिलीप सिंह से कोहिनूर ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया गया। जहां से यह क्वीन विक्टोरिया के पास पहुंचा और तब से अब तक यह ब्रिटिश शाही खजाने का हिस्सा है।