मोजतबा की 15 हजार मिसाइलें तैनात! अगला टारगेट कौन?

जॉर्डन के पास तेल के भंडार है नहीं। यानी वह तेल बेचकर पैसा नहीं कमा पाता। यही वजह है कि अपनी तमाम जरूरतों के लिए जॉर्डन अमेरिका, इसराइल और ख्ते के दूसरे मुल्कों पर निर्भर है। एक्सपर्ट कहते हैं कि जॉर्डन डबल गेम खेलता है। एक तरफ तो फिलिस्तीन की बात करता है।
मिडिल ईस्ट यानी वेस्ट एशिया में रीजनल वॉर होने जा रही है। मिडिल ईस्ट से आ रही मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान के पास 15,000 इंटरकॉन्टिनेंटल बैलस्टिक मिसाइल तैयार हैं। इंटरकॉन्टिनेंटल बैलस्टिक मिसाइलें दुनिया के किसी भी हिस्से में एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक जा सकती हैं और अपने निशाने पर सटीक लगती हैं। ईरान सीधे अमेरिका पर भी मार सकता है। इसराइल पर अटैक तो उसने शुरू कर ही दिया है और अब नंबर एक और अरब देश जॉर्डन का लग गया है। दरअसल अमेरिका और इसराइल का करीबी जॉर्डन वेस्ट एशिया या अरब खित्ते का एक ऐसा मुल्क है जिसका बॉर्डर इसराइल से लगता है। वहां अमेरिका की फोर्स और डिफेंस सिस्टम तैनात है। जॉर्डन को इसराइल और अमेरिका दोनों का सुरक्षा कवच माना जाता है। ईरान की इसराइल की तरफ दागी गई मिसाइलें सबसे ज्यादा जॉर्डन से इंटरसेप्ट की जाती हैं।
ईरान ने जॉर्डन पर जो हमला किया है उसमें उसने एडवांस अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम थर्ड को तबाह कर दिया है। थर्ड काफी महंगा अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम माना जाता है। एक्सपर्ट कहते हैं कि ईरान ने इस बार जॉर्डन को इसलिए लपेटा क्योंकि वहां अमेरिका के 12 मिलिट्री बेस हैं। जॉर्डन अमेरिकी सेंट्रल कमांड का हब माना जाता है। वहां नेवल से लेकर एयरबेस सब कुछ है अमेरिका के। लेकिन ईरान ने जॉर्डन में अमेरिका की सारी ताकत अपनी मिसाइलों और ड्रोन की रेंज में ले लिया है। देखा जाए तो अमेरिका जॉर्डन में बैठा हुआ अपनी खुद की और इसराइल की सुरक्षा के लिए है। लेकिन वो एहसान जॉर्डन पर जताता है कि हम यहां ईरान से आपकी हिफाजत के लिए आए हैं। लेकिन अब ईरान ने ताड़ लिया है। जॉर्डन के पास तेल के भंडार है नहीं। यानी वह तेल बेचकर पैसा नहीं कमा पाता। यही वजह है कि अपनी तमाम जरूरतों के लिए जॉर्डन अमेरिका, इसराइल और ख्ते के दूसरे मुल्कों पर निर्भर है। एक्सपर्ट कहते हैं कि जॉर्डन डबल गेम खेलता है। एक तरफ तो फिलिस्तीन की बात करता है।
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मस्जिद अक्सा की कस्टडी को भी देखता है। दूसरी तरफ इसराइल के लिए ढाल बनता है और अमेरिका पर डिपेंड करता है। इसीलिए ईरान ने जॉर्डन को टारगेट करना शुरू कर दिया है। अगर मिडिल ईस्ट में जॉर्डन धाराशाही हो गया तो अमेरिका इसराइल अपने आप कमजोर पड़ जाएंगे। देखा जाए तो गल्फ कंट्रीज में अमेरिकी ठिकानों को ईरान ने 40 दिनों की जंग में भारी नुकसान पहुंचाया है। अब यूएस इसराइल की कमजोर नब्ज़ जॉर्डन पर ईरान ने फोकस कर लिया है। बड़ी बात तो यह है कि खुद को पैगंबर इस्लाम की नस्ल से बताने वाले उनके वंशज कहलाने वाले ईरान के इस्लामिक रेवोल्यूशन के दुश्मन बने हुए हैं। जॉर्डन के किंग अब्दुल्लाह सेकंड खुद को पैगंबर अकरम के खानदान से बताते हैं। यरूशलम में मौजूद मुसलमानों के क़िबला-ए-अव्वल यानी मस्जिद अल अा के केयरटेकर भी हैं। 10 और 11 जून को भी ईरान ने जॉर्डन पर हमला किया था। उस वक्त अमेरिकी ठिकानों पर भारी नुकसान हुआ था। यहां तक कि एयरबेस पर खड़े एडवांस अमेरिकी फाइटर जेट भी तबाह हो गए थे।
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जॉर्डन किंग अब्दुल्लाह पैगंबर मोहम्मद साहब के वंशज माने जाते हैं। लेकिन इसराइल अमेरिका से दोस्ती ने उनको ईरान का दुश्मन बना दिया है। इस बार ईरान ने जॉर्डन, बहरीन, कुवैत और क़तर तक को जबरदस्त निशाने पर लिया था। किंग अब्दुल्ला दोयम भले ही पैगंबर के खानदान से हैं लेकिन खुलकर ईरान के खिलाफ अपने दोस्त इसराइल का साथ देते हैं। दोस्त इसलिए क्योंकि जॉर्डन ने अब्राहम अकॉर्ड के तहत इसराइल को मान्यता दे रखी है। साथ ही जॉर्डन की सीमाएं वेस्ट बैंक से लगती हैं। बावजूद इसके गजा पर इसराइल की आक्रामकता के दौर में जॉर्डन की तरफ से ना तो कोई कड़ी प्रतिक्रिया आई और ना ही मदद। किंग अब्दुल्लाह पैगंबर मोहम्मद साहब के सीधे वंश्रम में 41वीं पीढ़ी हैं। किंग अब्दुल्लाह सैद्धांतिक और कानूनी रूप से अल अक्सा मस्जिद के संरक्षक हैं। उसकी देखरेख, सुरक्षा और जरूरत पड़ने पर रक्षा की जिम्मेदारी उन्हीं की है।
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