क्या है PTA कानून, जिसे बदलने के लिए श्रीलंका पर पड़ रहा है अंतरराष्ट्रीय दबाव

By टीम प्रभासाक्षी | Mar 22, 2022

मानवाधिकार समूहों का कहना है कि श्रीलंका में PTA कानून का उपयोग सिंहला समुदाय के जबरन गिरफ्तारी के लिए होता रहा है। जिसमें बिना किसी कानूनी कार्रवाई के लोगों को सालों तक हिरासत में रखा जाता है और उन्हें प्रताड़ित करके झूठे काबूलनामें लिखाएं जाते हैं। हालांकि इन आरोपों को श्रीलंका प्राधिकरण खारिज करता रहा है। 40 साल पहले अस्थाई व्यवस्था के तहत यह कानून तब लाया गया जब तमिल राष्ट्र के लिए चल रहा विद्रोह अपने शुरुआती चरण में था। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस कानून का उपयोग अल्पसंख्यक समूहों, सरकार के आलोचकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने के लिए किया जाता रहा है।

यूरोप श्रीलंका पर लगातार मानवाधिकारों के पैमाने पर प्रगति के लिए दबाव डाल रहा है

श्रीलंका में  सिंहला समुदाय के दबदबे वाली सभी सरकारों ने अलगाववादी संगठन तमिल टाइगर्स (LTTE) से जुड़े संदिग्ध लोगों को गिरफ्तार करने के लिए PTA का खूब इस्तेमाल किया। 2009 में LTTE के विद्रोहियों को हरा दिया गया था। श्रीलंका में गृह युद्ध समाप्त होने के एक दशक बाद यह कानून अभी भी इस्तेमाल में है और श्रीलंका सरकार पर दबाव है कि वह इसमें बदलाव लाए। यूरोप श्रीलंका में बने सामान का एक बड़ा बाजार है, और यूरोप लगातार उस पर मानवाधिकारों के पैमाने पर प्रगति के लिए दबाव डाल रहा है।

श्रीलंकाई जेल प्राधिकरण के अनुसार, PTA के तहत अब तक तकरीबन 300 लोग हिरासत में है, जिसमें से कुछ लोग एक दशक से भी ज्यादा समय से जेलों में बंद हैं। सालों तक आलोचना सहने के बाद अब सरकार ने इस कानून में बदलाव का प्रस्ताव पेश किया है। इसका उद्देश्य से अंतरराष्ट्रीय नियम कायदों के हिसाब से बनाना है।

न्याय मंत्री मोहम्मद अली साबरी कहते हैं, कानून में सबसे अहम संशोधन जो किया गया है वह यह है कि अगर किसी की कैदी पर 1 साल से ज्यादा समय तक केस शुरू नहीं होता है तो वह जमानत के लिए आवेदन कर सकता है। उन्होंने बताया कि अधिकारी आतंकरोध से जुड़े लंबित मामलों में जल्द निपटने की कोशिश कर रहे हैं और 86 लोगों को हाल ही में रिहा किया गया है।

क्या बोला संयुक्त राष्ट्र

जिनेवा में आयोजित हो रहे संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के सत्र में इस पर चर्चा हो सकती है। अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी इसे बेहद करीब से देख रही हैं। यूरोपीय संघ पहले ही चेतावनी दे चुका है कि अगर मानवाधिकार के मामलों में प्रगति नहीं होती तो वह श्रीलंकाई कंपनियों के टैरिफ फ्री व्यापार पर प्रतिबंध लगा सकता है। श्रीलंका ने साल 2020 में यूरोपीय संघ को 2 अरब डॉलर के कपड़े निर्यात किए थे।  इस समय श्रीलंका विदेशी मुद्रा संकट से जूझ रहा है और इसके लिए उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से सहायता के रूप में एक विशेष पैकेज चाहिए होगा, इस वजह से भी उसकी नजर मानवाधिकार के मामलों पर होगी।

सिंहला बहुसंख्यक देश में उनके समर्थकों का मानना है कि जिन पर भी गलत काम करने के आरोप हैं, उन्हें करने वालों को लोग हीरो की तरह देखते हैं

बीते साल सदस्य देशों ने उन्हें 26 साल तक चले संघर्ष में दोनों पक्षों की ओर से हुए कथित युद्धापराधों की जांच और सबूत इकट्ठा करने का अधिकार दिया था। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि संघर्ष के दौरान 80 हजारसे लेकर 1 लाख लोग मारे गए थे। राष्ट्रपति राजपक्षे युद्ध अपराधों के आरोपों को लगातार खारिज करते रहे हैं और ऐसी उम्मीद कम ही है कि वह संयुक्त राष्ट्र द्वारा तय की गई शर्तों पर सहमत हों। सिंहला बहुसंख्यक देश में उनके समर्थकों का मानना है कि जिन पर भी गलत काम करने के आरोप हैं, उन्हें करने वालों को लोग हीरो की तरह देखते हैं।

इस महीने संयुक्त राष्ट्र के फैसले की श्रीलंका के विदेश मंत्री ने भी आलोचना की है। जिनेवा के सत्र में जिएल पिएरिस ने कहा, यह सुलह के प्रयासों में बाधाएं पैदा करता है क्योंकि पुराने जख्मों को कुरेदने से नफरतें  बढ़ती हैं और यह समाज का ध्रुवीकरण करता है। श्रीलंका के मंत्रियों का कहना है कि पहले ही कई कदम उठाए जा चुके हैं। जिनमें पूर्व विद्रोहियों का पुनर्स्थापन और युद्ध में लापता लोगों की स्थिति तय करने के लिए एक कार्यालय स्थापित करना है।

हालांकि आलोचकों का कहना है कि इस तरह की पहल बहुत कम हुई है। मुरुगिया कोमहन जैसे लोग इस बात से सहमत हैं। और उन जैसे जो लोग जेलों में जबरन कैद किए गए थे उनका कहना है कि उनकी जिंदगी तबाह हो चुकी है और उनका जो समय कैद में बीता  वह वापस लौटकर नहीं आएगा।

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