कुतुबुद्दीन ऐबक, रजिया सुल्तान, औरंगजेब क्यों नहीं डिगा सके शिवलिंग, क्या है ज्योर्तिलिंग को महादेव के आदेश की कहानी

By अभिनय आकाश | May 18, 2022

सभ्यता को तलवार के बल पर बदलने की कोशिश हुई, संस्कृति को कट्टरता से कुचलने की कोशिश हुई। काशी का इतिहास मिटाने की हर बार कोशिश हुई। लेकिन हर बार कोई न कोई योद्धा भारतीय इतिहास को बचाने के लिए खड़ा हुआ। हिन्दुस्तान ने दुनिया को बताया कि तोड़ने से ज्यादा शक्तिशाली जोड़ने वाला होता है। काशी भगवान शिव की नगरी जहां पर साक्षात शिव वास करते हैं। इतिहास गवाह है कि कुतुबुद्दीन ऐबक से लेकर रजिया सुल्तान तक और सिंकदर लोदी से लेकर औरंगजेब तक ने काशी के देवालयों में जबरदस्त उत्पात मचाया। इतिहास के अलग अलग कालखंडों में शिवालय पर हमला किया, लूट पाट भी मचाई, खजाना भी साथ ले गए। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वो शिवलिंग को अपने साथ नहीं ले जा सके। आखिर क्या है इसकी वजह आज आपको इतिहास के हवाले से इसके बारे में बताएंगे। साथ ही महादेव के दिव्य आदेश की कहानी भी सुनाएंगे। 

मोहम्मद गोरी ने की शुरुआत

चौथी से नौंवी सदी के बीच लिखे गए पुराणों में भी काशी विश्वनाथ मंदिर का कई बार उल्लेख मिलता है। इसमें बताया गया है कि प्रचानी काल में बनारस शहर का एक ही मुख्य केंद्र था। वो भगवान शिव का प्राचीन मंदिर जिसे अविमुक्तेश्वरा के रूप में पूजा जाता था। कहा जाता है कि 11वीं सदी के अंत में विश्वनाथ मंदिर को मोहम्मद गोरी ने लूटा और तुड़वाया था। बीएचयू के रिसर्च पेपर के मुताबित 12वीं सदी के अंत में उत्तर भारत का काफी हिस्सा गौर सामाज्य के अधीन चला गया। तो मोहम्मद गोरी के विश्वासपात्रों में से एक और दिल्ली सल्तनत के गुलाम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ने काशी पर हमला किया। इस हमले में तब वहां भगवान शिव के प्राचीन मंदिर को तोड़कर उसे नष्ट कर दिया गया था। इस हमले कुछ वर्षों बाद रजिया सुल्तान ने उस जगह पर एक मस्जिद का निर्माण करा दिया। जहां पहले भगवान शिव को समर्पित ज्योर्तिलिंग था। रजिया सुल्तान दिल्ली सल्तनत की पहली महिला मुस्लिम शासक थी। इसी के बाद काशी में बनी इस मस्जिद को बीबी रजिया मस्जिद कहा जाता है। इस रिसर्च पेपर में कहा गया है कि रजिया सुल्तान द्वारा बनाई गई मस्जिद के पास मंदिर को बनवाया गया और 1211 में ये काम गुजरात के एक व्यापारी द्वरा करवाया गया। हालांकि इस मंदिर पर भी मुस्लिम शासकों द्वारा दो बार बड़े हमले किए गए। पहला हमला 15वीं शताब्दी में हुआ। साल 1490 में सिंकदर लोगी ने इस मंदिर पर हमला करने की योदना बनाई। वो हिंदुओं से इस कदर नफरत करता था कि उसने मंदिर के बचे हुए अवशेषों को भी गिरा दिया। 1585 में राजा टोडरमल ने  मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। 

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औरंगजेब के फरमान पर किया गया था मंदिर ध्वस्त

औरंगजेब के फरमान के बाद 1669 में मुगल सेना ने विशेश्वर का मंदिर ध्वस्त कर दिया था। हमले के दौरान मुगल सेना ने मंदिर के बाहर स्थापित विशाल नंदी की प्रतिमा को तोड़ने का प्रयास किया था लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी वे नंदी की प्रतिमा को नहीं तोड़ सके। 

शिव के आदेश का पालन कर रहे 

इतिहास के अलग अलग कालखंडों में शिवालय पर हमला किया, लूट पाट भी मचाई, खजाना भी साथ ले गए। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वो शिवलिंग को अपने साथ नहीं ले जा सके। शिवमहापुराण में एक श्लोक है-‘अविमुक्तं स्वयं लिंग स्थापितं परमात्मना। न कदाचित्वया त्याज्यामिंद क्षेत्रं ममांशकम्।’ पं. ब्रह्मानंद त्रिपाठी ने इस श्लोक की व्याख्या की है-‘शिवलिंग काशी से बाहर अन्यत्र नहीं जा सकते क्योंकि स्वयं शिव ने अविमुक्त नामक शिवलिंग की स्थापना की। शिव ने आदेश दिया कि मेरे अंश वाले ज्योतिर्लिंग तुम इस क्षेत्र को कभी मत छोड़ना।’ ऐसा कहते हुए देवाधिदेव महादेव ने इस ज्योतिर्लिंग को अपने त्रिशूल के माध्यम से काशी में स्थापित कर दिया। नारद पुराण में इस शिवलिग के बारे में बड़ी ही रोचक कथा है। कहते हैं कि एक समय राक्षस शिवलिंग लेकर भाग रहे थे। जब वह काशी में पहुंचे तो भगवान शिव ने विचार किया कि वह काशी को छोड़कर नहीं जाएंगे और वह कुछ उपाय सोचने लगे कि कैसे काशी में उनका निवास बन जाए। शिव की लीला से उस समय मुर्गा बांग देने लगा जिससे राक्षस डर गए कि सुबह हो गई है और वह शिवलिंग को वहीं छोड़कर भाग गए। बाद में देवाताओं ने इस शिवलिंग को स्थापित करके पूजन किया और अविमुक्तेश्वर नाम दिया। मंदिर के पास एक कुंड है जिसके विषय में नारद पुराण में बताया गया है कि जो इस कुंड का जल पीता है उसे जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।

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