By नीरज कुमार दुबे | Jan 24, 2026
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले नए नियमों को लेकर देश में राजनीति तेज हो गई है। इन नियमों के लागू होते ही सवर्ण समुदाय की नाराजगी की खबरें सामने आने लगी हैं और इसके खिलाफ विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक यह दावा किया जा रहा है कि यह रेगुलेशन एक वर्ग विशेष को निशाना बनाने के लिए लाया गया है और इसका दुरुपयोग कर छात्रों और शिक्षकों को प्रताड़ित किया जाएगा। कई मंचों से भय का वातावरण बनाया जा रहा है और तथ्यों से परे जाकर तरह तरह का दुष्प्रचार फैलाया जा रहा है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि भावनात्मक शोर और राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप से अलग हटकर इन नियमों की वास्तविकता को समझा जाए। सवाल उठता है कि आखिर इन नियमों में ऐसा क्या है जिससे कुछ लोग डरे हुए हैं और क्या सचमुच यह किसी समुदाय के खिलाफ हैं? या फिर यह उच्च शिक्षण संस्थानों में लंबे समय से चली आ रही असमानता और भेदभाव की समस्या से निपटने की एक कोशिश मात्र है? इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने और यूजीसी के इन नियमों की सच्चाई आपके सामने रखने की एक कोशिश इस रिपोर्ट के माध्यम से हम कर रहे हैं।
हम आपको बता दें कि केंद्र सरकार ने उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और समावेशन को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026) को अधिसूचित कर दिया है। ये नियम देश के सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों पर लागू होंगे। इनका उद्देश्य परिसर में भेदभाव से जुड़ी शिकायतों के निवारण के लिए स्पष्ट व्यवस्था बनाना और वंचित सामाजिक समूहों को संस्थागत सहारा देना है।
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, नए नियमों के तहत प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान को समान अवसर केंद्र स्थापित करना अनिवार्य होगा। यह केंद्र न केवल भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की सुनवाई करेगा, बल्कि शैक्षणिक, आर्थिक, सामाजिक और व्यक्तिगत मार्गदर्शन भी उपलब्ध कराएगा। विविधता और समावेशन को बढ़ावा देना भी इसकी मुख्य जिम्मेदारी होगी। जिन महाविद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध नहीं होंगे, वहां यह कार्य संबद्ध विश्वविद्यालय के समान अवसर केंद्र के माध्यम से किया जाएगा।
हम आपको बता दें कि इन नियमों के लागू होने की पृष्ठभूमि में न्यायपालिका की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। वर्ष 2012 में बने भेदभाव विरोधी नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने यूजीसी को अद्यतन नियम प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। यह याचिका रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं द्वारा दायर की गई थी। हम आपको याद दिला दें कि इन दोनों ही छात्रों के मामलों ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत उत्पीड़न और संस्थागत उदासीनता को लेकर देशव्यापी बहस छेड़ी थी।
नए ढांचे के तहत समान अवसर केंद्र के साथ एक समानता समिति का गठन भी अनिवार्य होगा। इस समिति में अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिलाएं और दिव्यांग व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया गया है। समिति का कार्यकाल दो वर्ष का होगा और उसे प्रत्येक छह महीने में अपनी रिपोर्ट संस्थान तथा यूजीसी को भेजनी होगी। इसके अतिरिक्त, परिसर में भेदभाव की रोकथाम के लिए छोटी सतर्कता इकाइयों के रूप में समानता दस्तों का गठन भी किया जाएगा।
नियमों में यह भी प्रावधान है कि समान अवसर केंद्र स्थानीय प्रशासन, पुलिस, गैर सरकारी संगठनों, नागरिक समूहों और विधिक सेवा प्राधिकरणों के साथ समन्वय करेगा, ताकि आवश्यकता पड़ने पर कानूनी सहायता भी उपलब्ध कराई जा सके। प्रत्येक संस्थान में एक वरिष्ठ शिक्षक को इस केंद्र का समन्वयक नियुक्त किया जाएगा, जिसे वंचित समूहों के कल्याण के प्रति प्रतिबद्ध माना गया हो। यदि कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो यूजीसी के पास कड़ी कार्रवाई के अधिकार होंगे। इसमें यूजीसी की योजनाओं से वंचित करना, डिग्री और दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रमों को रोकना, यहां तक कि संस्थान को यूजीसी की मान्यता सूची से हटाना भी शामिल है।
इस बीच, इन नियमों के लागू होने के साथ ही देश के कुछ हिस्सों में विरोध के स्वर भी सुनाई दिए हैं। आलोचकों का कहना है कि इसका दुरुपयोग हो सकता है, जबकि समर्थकों का तर्क है कि यह कदम लंबे समय से चली आ रही असमानताओं को दूर करने के लिए आवश्यक है। हम आपको यह भी बता दें कि आंकड़े दर्शाते हैं कि बीते वर्षों में उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में लगातार वृद्धि हुई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मौजूदा व्यवस्थाएं पर्याप्त नहीं थीं और एक मजबूत, पारदर्शी तंत्र की जरूरत थी।
देखा जाये तो उच्च शिक्षण संस्थान किसी भी समाज की वैचारिक प्रयोगशाला होते हैं। यदि वही स्थान असमानता और भय के केंद्र बन जाएं, तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। समानता को बढ़ावा देने वाले नए नियम किसी एक वर्ग के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे शैक्षणिक तंत्र को अधिक मानवीय और न्यायपूर्ण बनाने की कोशिश हैं। इस पहल को लेकर जो आशंकाएं जताई जा रही हैं, उन्हें संवाद और पारदर्शिता के माध्यम से दूर किया जा सकता है। हर नियम का दुरुपयोग संभव है, लेकिन केवल इस भय से सुधारों को रोक देना समाधान नहीं हो सकता। वास्तविक चुनौती यह है कि संस्थान इन प्रावधानों को कागज तक सीमित न रखें, बल्कि ईमानदारी से लागू करें। बहरहाल, यदि ये नियम सही भावना के साथ जमीन पर उतरते हैं, तो यह न केवल वंचित छात्रों और शिक्षकों में भरोसा जगाएंगे, बल्कि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाएंगे।
-नीरज कुमार दुबे