क्या है ये NRC जिसके देश में लागू होने की बात पर मचा है बवाल, पूरा निचोड़ सरल भाषा में समझिए

By अभिनय आकाश | Nov 22, 2019

एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीज़र्न्स) ये भारत और खासकर असम की राजनीति का एक चर्चित विषय है। अवैध घुसपैठियों की पहचान करने वाले NRC को पूरे देश में लागू किया जाएगा। गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में ये बड़ा ऐलान किया है। वहीं ममता बनर्जी पिछले दो दिनों से कह रही हैं कि वो बंगाल में इसे लागू नहीं होने देंगी। इस पर जमकर राजनीति हो रही है क्योंकि NRC राज्यों में वोटरों पर सीधा असर डाल सकता है। इसलिए हमने सोचा की NRC के पूरे मामले को आसान से तथ्यों के आधार पर आपके सामने रख दें। 

सबसे पहले 4 लाइनों में समझ लीजिए कि आखिर NRC है क्या?

 

बांग्लादेश से असम की सीमा लगती है कोई बैरियर नहीं है। तो वहां से कभी रोजगार कभी अच्छी ज़िन्दगी की चाह लिए कभी जंग से बचने के लिए लाखों बंगला मुसलमान और हिन्दू असम आकर बसने लगे। लेकिन इन्होंने वीजा नहीं लिया न ही कोई दूसरा कागज बनवाया। ऐसे में असम के लोगों को लगा की वो अपने ही राज्य में माइनॉरिटी हो जाएंगे। आंदोलन चला खून खराबा हुआ फिर राजीव गांधी ने 1985 में आंदोलनकारियों से असम एकॉर्ड नामक समझौता किया। वादा किया गया की असम के विदेशी नागरिक बाहर किये जाएंगे। बीच में मामला ठंडा पड़ा लेकिन फिर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एक कवायद शुरू हुई। एक सूची बने जिसमे असम में रहने वाले सभी भारतीयों के नाम हों। यही NRC है।

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असम में अंतिम NRC 31 अगस्त को जारी की गई थी, जिसमें 19 लाख आवेदनकर्ताओं के नाम हटा दिए गए थे। अब यह NRC पूरे देश में लागू किया जाएगा। इसका मकसद देश में गैर-कानूनी तौर पर रह रहे विदेशी लोगों को बाहर करना है। NRC कोई नया या अद्भुत विचार नहीं है। 1950 में ही इस पर काम किया जा चुका है। तारीखों के आइने से समझते हैं असम NRC को लेकर अब तक क्या हुआ।

NRC की 1950 से लेकर अब तक की पूरी कहानी

  • बंटवारे के बाद 1950 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से असम में बड़ी संख्या में शरणार्थियों के आने के बाद प्रवासी अधिनियम लागू किया गया।
  •  1964-1965 में पूर्वी पाकिस्तान से शरणार्थी बड़ी संख्या में आए।
  •  1971 में पूर्वी पाकिस्तान में दंगों और युद्ध के कारण फिर से बड़ी संख्या में शरणार्थी आए और स्वतंत्र बांग्लादेश अस्तित्व में आया।
  •  1979-1985 के दौरान असम से छह साल आंदोलन चला जिसका नेतृत्व अखिल असम छात्र संघ (आसू) ने किया।
  •  1983 में मध्य असम में नरसंहार होता है और इसमें 3 हजार लोगों की मौत हो जाती है, जिसके बाद अवैध प्रवासी अधिनियम पारित हुआ।
  • · 1985 में तत्कालीन पीएम राजीव गांधी की मौजूदगी में केंद्र-राज्य सरकार के बीच असम समझौते पर हस्ताक्षर किए। जिसमें कहा गया 25 मार्च 1971 या उसके बाद आए विदेशी निष्कासित होंगे।
  •  1997 में निर्वाचन आयोग ने उन मतदाताओं के नाम के आगे ‘डी’ (संदेहास्पद) जोड़ने का फैसला, जिनके भारतीय होने पर शक था।
  •  2009 में असम पब्लिक वर्क्स ने मतदाता सूची से विदेशियों के नाम हटाए जाने और NRC के अपडेट की अपील की।
  •  2010 में NRC के अपडेट के लिए चायगांव, बारपेटा में प्रायोगिक परियोजना शुरू हुई। बारपेटा में हिंसा में चार लोगों की मौत हुई।
  •  2013 में सुप्रीम कोर्ट ने एपीडब्ल्यू की याचिका की सुनवाई की। केंद्र, राज्य को एनआरसी के अपडेट की प्रक्रिया आरंभ करने का आदेश दिया।
  •  2015 में NRC अपडेट की प्रक्रिया शुरू की गई।
  •  साल 2017 में 31 दिसंबर को मसौदा NRC प्रकाशित हुआ जिसमें 3.29 करोड़ आवेदकों में से 1.9 करोड़ के नाम प्रकाशित किए गए।
  •  30 जुलाई, 2018 को NRC की एक और मसौदा सूची जारी की गई। इसमें 2.9 करोड़ लोगों में से 40 लाख के नाम शामिल नहीं किए गए।
  •  26 जून 2019 को 1 लाख दो हजार 462 लोगों की अतिरिक्त मसौदा निष्कासन सूची प्रकाशित होती है और 31 अगस्त को अंतिम NRC सूची जारी की गई।
  •  20 नवंबर 2019 को अमित शाह ने राज्यसभा में कहा कि NRC पूरे देश में लागू होगा।
एनआरसी और नागरिकता संशोधन बिल को एक ही जैसे मु्द्दे की तरह देखा जाता है। लेकिन दोनों में बहुत ही ज्यादा अंतर है। चलते-तलते आपको ये भी बता देते हैं कि नागरिकता संशोधन विधेयक और एनआरसी के बीच में अंतर क्या है। 

NRC पड़ोसी देशों से आए घुसपैठियों की पहचान के लिए है वहीं नागरिकता संशोधन विधेयक धार्मिक प्रताड़ना के शिकार शरणार्थियों को नागरिकता देने के लिए है। NRC से धर्म का कोई लेना-देना नहीं है और नागरिकता संशोधन बिल के मुताबिक पाकिस्तान, अफगानिस्तान. बांग्लादेश के 6 धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को नागरिकता मिलेगी जो पलायन करके भारत आए। इनमें हिन्दू, बौद्ध, सिख, जैन, ईसाई और पारसी लोग शामिल हैं। NRC अभी सिर्फ असम में लागू हुई है और मोदी सरकार का इसे पूरे देश में लागू करने का इरादा है वहीं नागरिकता संशोधन बिल किसी एक राज्य नहीं बल्कि पूरे देश में शरणार्थियों पर लागू होगा। अब इस दोनों ही मामले में लड़ाई दो बातों पर हो रही है। ममता बनर्जी कह रही हैं कि वो पश्चिम बंगाल में NRC को लागू नहीं होने देंगी। वहीं गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कर दिया है कि वो इसे पूरे देश में लागू करेंगे। दूसरा मुद्दा नागरिकता संशोधन विधेयक है जिसके बारे में विवाद ये है कि इसे मुस्लिम विरोधी बताया जा रहा है और कहा जा रहा है कि घुसपैठियों को लेकर धर्म के आधार पर अंतर किया जा रहा है। इस पर सरकार का मानना है कि गैर मुस्लिम धार्मिक प्रताड़ना का शिकार होकर भारत आए। इन्हें नागरिकता मिलनी चाहिए।