काहे को दुनिया बनाई... (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Oct 14, 2020

पिछले कुछ महीनों से हम स्वीकार कर रहे हैं ज़िंदगी की असलियत भी स्वादिष्ट होती है। जीवन में दुःख ज़्यादा हैं, लेकिन हम विकासजी के साथ नाच, गाने, खाने पीने में मस्त रहे। कल रात बिजली गई तो कहीं बजता, ‘दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई’ कान में ऐसा पड़ा कि दुनिया बनाने वाले पर हैरानी होने लगी। किसी ज़माने में इस गीत के माध्यम से कई संजीदा सवाल ऊपरवाले से किए थे जिनके जवाब अभी तक किसी को भी नहीं मिले। दिमाग में, ‘जवाब जिनका नहीं वो सवाल होते हैं’, जैसी बातें भी आती रही। दुनिया में इतना कुछ होने के बावजूद ऊपरवाला अभी तक गुपचुप तमाशा देख रहा है, क्या हमें मान लेना पडेगा कि वास्तव में उसकी खुदाई यही है। वह संकेत देकर नीचेवालों को समझाता है, लेकिन नीचे वाले अपनी खोटी सोच के कारण, इशारे तो क्या थपेड़े भी नहीं समझते। आज का सच यह है कि इंसान ने विकास की हद कर दी मगर स्वयं मिट्टी का पुतला ही बना रहा। उगाऊ दिमाग मिला लेकिन कचरा ज्यादा उगाया। यह ऊपर वाले की ही गलती मानी जाएगी कि इतनी खूबसूरत सृष्टि रची लेकिन अगली गलती यह की, कुपात्र के हाथों में सेब जैसा आकर्षक व स्वादिष्ट फल सौंप दिया। ज्यादा बड़ी गलती यह की, उसे सेब खाने भी दिया।

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अगर यह दुनिया न बनाई होती तो कोई पंगा नहीं होता, न कोरोना होता न ही कोई दूसरा रोना होता। इतिहास गवाह है, मुफ्त में मिली इस सृष्टि में समझदार दुनिया वालों ने अपना काम बेहद कर्मठता, संजीदगी व ईमानदारी के साथ किया ही है। 

- संतोष उत्सुक

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