एक-एक कर जमा हो रहे ट्रंप के कट्टर दुश्मन, इधर खामनेई के अपने भरोसेमंद 'हार्ट सर्जन' का दिल्ली किस मिशन पर भेजा!

By अभिनय आकाश | Sep 11, 2026

इजराइल के हमले, अमेरिका का दबाव, आर्थिक संकट और पूरे पश्चिम एशिया में युद्ध जैसा माहौल। ऐसे समय में ईरान का एक चेहरा मसूद पेजिश्कियान का सबसे ज्यादा सामने आया। किया। लेकिन सवाल यह है आखिर सुप्रीम लीडर मोजतबा खामनेई को उन्हीं पर इतना भरोसा क्यों था? और अब जब वो ब्रिक्स समिट के लिए दिल्ली आ रहे हैं तो क्या भारत और ईरान के रिश्तों में कोई बड़ा मोड़ आने वाला है? मसूद पेजेश्कियान आज सिर्फ ईरान के राष्ट्रपति नहीं बल्कि वो ऐसे नेता हैं जिन पर ईरान की सत्ता के सबसे कठिन दौर में सबसे ज्यादा भरोसा उन पर किया गया। दिलचस्प बात यह है कि वो कोई कट्टर मौलवी नहीं, कोई सेना के जनरल नहीं बल्कि एक हार्ट सर्जन है। दिल का ऑपरेशन करने वाला डॉक्टर आज पूरे ईरान की राजनीति का सबसे भरोसेमंद चेहरा बन चुका है। और यही वजह है कि जब ईरान पर लगातार बाहरी दबाव बढ़ा तब खामने ने भी उन्हें सिस्टम का अहम हिस्सा माना। 

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दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि चीन, रूस, ईरान और भारत जैसे अलग-अलग हित वाले देश किस तरह से एक साझा एजेंडा बना पाते। पश्चिम एशिया का युद्ध, रूस, यूक्रेन संघर्ष और वैश्विक भुगतान व्यवस्था जैसे मुद्दे जो एजेंडा है उस पर रहेंगे। यानी कि क्या कोई एक ऐसा प्लेटफार्म बनेगा जहां पर जो ब्रिक्स कंट्री है वो आपस में किस तरह से जो पेमेंट है इसको और ज्यादा बेहतर तरीके से करना है और क्या डीडोलराइजेशन की तरफ एक जो कदम है वो भी इसमें बढ़ेगा यह भी एक अहम मुद्दा रहने वाला है। इन सब माहौल में मसूद पेजिश्कियान की मौजूदगी ईरान का संदेश है कि वो खुद को अलग-थलग नहीं दिखाना चाहता इस पूरे वर्ल्ड ऑर्डर में बल्कि बड़े बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती ईरान की इकॉनमी है। वर्षों से लगे प्रतिबंधों ने महंगाई, बेरोजगारी और मुद्रा संकट ईरान के अंदर बढ़ा दिया है। उन्होंने राष्ट्रपति बनने के बाद आर्थिक सुधार, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और विदेशी निवेश बढ़ाने की बात कही और साथ ही परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत के रास्ते भी खुले रखने की इच्छा वह जता चुके। हालांकि सुरक्षा हालात ने कई कोशिशों को मुश्किल भी बना दिया। उनका संदेश साफ रहा। मजबूत सुरक्षा और मजबूत अर्थव्यवस्था दोनों साथ-साथ चलनी चाहिए।

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एक तरफ रूस चीन जैसे साझेदार और दूसरी तरफ भारत और दूसरे ग्लोबल साउथ देश। मसूद फिजिशियान इन सबके बीच संतुलन एक बैलेंस बनाने की कोशिश करते नजर आते हैं। शायद यही वजह है कि संकट के दौर में उनका खत और ज्यादा बड़ा हो गया है और अब दिल्ली में उनकी मौजूदगी सिर्फ एक फोटो ऑफ नहीं रहने वाली। अगर भारत और ईरान के बीच चाबहार ऊर्जा और व्यापार पर नई बातचीत आगे बढ़ती है तो इसका असर पूरे दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की राजनीति पर पड़ सकता है। यह भी संभव है। ब्रिक्स समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मसूद फिजिशियान की मुलाकात पर पूरी दुनिया भर की नजर इसलिए भी रहने वाली है क्योंकि यह दो ऐसे देशों की बातचीत होगी जो अलग-अलग वैश्विक गुटों के बीच संतुलन बनाकर चलने की कोशिश करते हैं।

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