By कमलेश पांडे | Sep 15, 2026
वैश्विक पटल पर अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा देखते ही बनती है। इस बार मुद्दा कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई बनी है, वो भी ब्रिक्स 2026 बैठक के तुरंत बाद जिसका अपना महत्व है। चूंकि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ब्रिक्स देशों को एआई ओपन सोर्स उपलब्ध कराने की घोषणा की थी, इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रतिक्रिया स्वरूप कहा कि एआई की दौड़ में अमेरिका चीन से आगे है? तो सवाल उठना लाज़मी है कि कितना आगे? और क्या चीन अगले कुछ वर्षों में इस दूरी को पाट सकता है?
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जहां तक भारत की “AI आत्मनिर्भरता” का सवाल है तो उसे विदेशी एआई यानी अमेरिका, चीन, यूरोप के एआई पटल को बंद करना नहीं चाहिए, बल्कि इन्हें इतना सक्षम बनना चाहिए कि भारत अपनी जरूरतों के लिए एआई बना सके और दुनिया को भी बेच सके। आपको पता होगा कि अमेरिका के नेतृत्व वाले एआई "पैक्स सिलिका संगठन" में 34 देश शामिल हैं, जिसमें भारत भी एक है।
वहीं, चीनी नेतृत्व वाले "वर्ल्ड एआई कोआपरेशन ऑर्गेनाइजेशन" में 29 देश शामिल हैं। फिर भी ब्रिक्स देशों को चीन ने जो आकर्षक ऑफर दिया है उससे निकट भविष्य में पूरा खेल बदल सकता है। ऐसा इसलिए कि अमेरिकी एआई कंपनियों ने एआई की प्रगति को 'स्लोडाउन' करने का आह्वान किया है। चूंकि अब अमेरिका के भीतर ही एआई की प्रगति को लेकर विरोधाभास सामने आ रहा है और ट्रंप प्रशासन की तरफ से अमेरिकी कंपनियों को एआई प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल में अमेरिकी हितों को प्राथमिकता की बात हो रही है, इसलिए पैक्स सिलिका संगठन के अन्य 33 देशों का दिग्भ्रमित होना स्वाभाविक है।
ऐसे में यदि चीन, भारत और यूरोप आपसी समझदारी विकसित करके अमेरिका को मात दे दें तो किसी के लिए भी हैरत की बात नहीं होगी। क्योंकि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ब्रिक्स के मंच से कहा है कि चीन ब्रिक्स के लिए ओपन सोर्स एआई समुदाय बनाने में अग्रणी भूमिका निभाएगा, बड़े भाषा मॉडल के विकास व उपयोग में सहयोग देगा, विशेष प्रशिक्षण आयोजित करेगा, और खुला एआई पारिस्थितिकी तंत्र खड़ा करेगा।
खास बात यह कि यह प्रस्ताव उस पृष्ठभूमि में आया है जब चीनी कंपनियां ओपन सोर्स मॉडल पर जोर दे रही हैं, जबकि अमेरिकी दिग्गज कंपनियां अधिक बंद, फ्रंटियर मॉडल पर काम कर रहे हैं। चूंकि भारत इस प्रतिद्वंद्विता को पहचान रहा है, इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स बैठक में चेतावनी देते हुए साफ कहा था कि तकनीक और क्रिटिकल मिनरल्स का हथियार बनाना साझा प्रगति में बाधा बन सकता है। इससे भारत की नीति स्पष्ट है।
देखा जाए तो दुनिया में एआई आधारित प्रौद्योगिकी को लेकर जो तगड़ी लामबंदी चल रही है, उसमें अमेरिका ने बेहद उच्च गुणवत्ता वाले चिप्स, सेमीकंडक्टर उपकरण, क्लाउड एक्सेस और कुछ फ्रंटियर मॉडल पर निर्यात नियंत्रण लागू करते हुए इन्हें सिर्फ 'भरोसेमंद साझेदारों' के साथ साझा करने की व्यवस्था करने का ऐलान किया है। कहने का तात्पर्य यह कि शेष देशों में एआई के मामले में अमेरिका या चीन में से किसी एक को ही चुनने का दबाव बनाया है और दोनों को चुनने का रास्ता अमेरिका ने लगभग बंद कर दिया है।
चूंकि भारत भी पैक्स सिलिका का सदस्य है और ट्रंप ने खाड़ी देशों को भी चिप्स व निवेश के सौदे से जोड़ा है। उन्होंने अपने एआई स्टैक को निर्यात कूटनीति का हिस्सा बनाया है। इसलिए अमेरिका को रणनीतिक जवाब देते हुए चीन ने रेअर अर्थ मिनरल्स के निर्यात को नियंत्रित कर दुनिया को समझा दिया कि वह प्रौद्योगिकी की दुनिया में कितनी अफरातफरी मचा सकता है। आज चीनी गुट में रूस, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और पाकिस्तान समेत 29 देश शामिल हैं।
आपको याद दिला दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि "जो एआई जीतेगा, वही जीतेगा" इस क्षेत्र में जारी वैश्विक प्रतिद्वंद्विता को दर्शाता है। हालांकि, एआई अब एकतरफा अमेरिकी वर्चस्व की कहानी नहीं रही, बल्कि चीन जैसे दूसरे ध्रुव से मिल रही कड़ी तकनीकी प्रतिस्पर्धा की मिशाल बन चुकी है। यदि सितंबर 2026 की स्थिति को देखें, तो तकनीकी रूप से अमेरिका का पलड़ा अभी भी चीन से भारी है, लेकिन यह अंतर पहले की तुलना में काफी कम हुआ है और अगले कुछ वर्षों में चीन इस दूरी को पाटकर आगे भी निकल सकता है, बशर्ते कि भारत जैसे मजबूत पड़ोसी का साथ उसे मिल जाए।
तकनीकी अध्ययन भी जाहिर करते हैं कि एआई अब एकतरफा अमेरिकी वर्चस्व की कहानी नहीं, बल्कि दो ध्रुवों की कड़ी तकनीकी प्रतिस्पर्धा बन चुकी है। इसलिए आइए जानते हैं कि किस क्षेत्र में कौन (अमेरिका या चीन) आगे?
खासकर क्षेत्र, उसमें मिली बढ़त और अद्यतन स्थिति के नजरिए से:-
एक, फ्रंटियर एआई मॉडल में अमेरिका बढ़त में है। उसका मॉडल अभी समग्र प्रदर्शन में आगे है।
दो, एआई चिप्स/जीपीयू में अमेरिका को बढ़त है। Nvidia का बड़ा लाभ उसे मिला है।
तीन, एआई कंप्यूट/आंकड़ा केंद्र में अमेरिका को बढ़त है। विशाल पूंजी, जीपीयू और हाइपरस्केल इंफ्रास्ट्रक्चर में वह आगे है।
चार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता शोध पारिस्थितिकी तंत्र में अमेरिका को बढ़त है। वह विश्वविद्यालय, बड़ी तकनीक और उद्यम पूंजी का संयोजन करने में आगे बढ़ा है।
पांच, वैश्विक कृत्रिम बुद्धिमत्ता पारिस्थितिकी तंत्र में अमेरिका को बढ़त प्राप्त है। उसे सहयोगी देशों, कंपनियों और क्लाउड पारिस्थितिकी तंत्र का लाभ मिला है।
छह, सेमीकंडक्टर विनिर्माण या अर्धचालक निर्माण में चीन को कुछ क्षेत्रों में बढ़त प्राप्त है। उसने बड़े पैमाने का विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखला मजबूत किया है।
सातवां, ओपन सोर्स/कम लागत वाले मॉडल में चीन मजबूत चुनौती बनकर उभरा है। उसके डीपसीक जैसे मॉडल ने लागत-प्रतिस्पर्धा बदली है।
आठवां, एआई मॉडल की स्थापना/औद्योगिक उपयोग में चीन की बड़ी ताकत है। उसके पास विशाल विनिर्माण क्षमता और घरेलू बाजार है।
यानी कि आठ क्षेत्रों में पांच में अमेरिका और तीन में चीन को बढ़त प्राप्त है। यदि आप ब्रुकिंग्स के अप्रैल 2026 के आकलन पर गौर करेंगे तो उसके अनुसार चीन के शीर्ष कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल अभी अमेरिकी फ्रंटियर मॉडल से कुछ महीने या अधिक पीछे हैं और अमेरिकी मॉडल तार्किक क्षमता, गणित, कुटलेखन (coding) तथा लंबे समय वाले स्वायत्त कार्य या दीर्घकालिक एजेंट-आधारित कार्य में समग्र बढ़त रखते हैं।
लेकिन चीन को भी कम आंकना बड़ी गलती होगी। चीन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह AI को पूरे औद्योगिक तंत्र से जोड़ रहा है—मोबाइल, ईवी, रोबोटिक्स, विनिर्माण, निगरानी या चौकसी, समान का प्रबंधन और सरकारी सेवाओं तक काफी मजबूत है। और चीन ने अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद अपने एआई चिप पारिस्थितिकी तंत्र को तेजी से विकसित किया है। हालांकि अभी अमेरिकी Huawei जैसे चीनी विकल्प या अमेरिकी Nvidia की बराबरी के पैमाने पर चीन नहीं हैं और अमेरिकी HBM जैसी महत्वपूर्ण तकनीकों की कमी चीन के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।
एक महत्वपूर्ण संकेत यह भी है कि अमेरिका और चीन मिलकर वैश्विक कंप्यूट, निवेश और एआई मॉडल के लगभग 90 प्रतिशत पर नियंत्रण रखते हैं। सवाल है कि असली अमेरिकी बढ़त कहाँ है? तो जवाब होगा कि अमेरिका के पास एक ऐसा एआई स्टैक (AI stack) है जिसे चीन के लिए पूरी तरह दोहराना कठिन है। उदाहरण स्वरूप Nvidia/एआई चिप्स, सेमीकंडक्टर डिजाइन, क्लाउड, हाइपरस्केल डेटा सेंटर्स, OpenAI/ Anthropic/Google आदि उद्यम पूंजी और ग्लोबल डेवलेपर्स के अमेरिकी विकल्प चीन के पास उस पैमाने पर उपलब्ध नहीं हैं। यही कारण है कि अमेरिका केवल अच्छे AI मॉडल नहीं बना रहा, बल्कि AI की पूरी वैश्विक आधारभूत संरचनात्मक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव रखता है।
यह बात दीगर है कि आज अमेरिका स्पष्ट लेकिन घटती हुई बढ़त पर है और अगले 3–5 साल के दरम्यान ही अमेरिका व चीन का मुकाबला बेहद करीबी हो सकता है। जबकि दीर्घकाल में चीन की विशाल विनिर्माण क्षमता और राज्य-समर्थित निवेश के कारण अमेरिकी बढ़त को स्थायी मानना सुरक्षित नहीं है। इसलिए इसे “अमेरिका बनाम चीन” से ज्यादा अमेरिकी नवोन्मेष, चिप्स और पूंजी बनाम चीनी स्केल, विनिर्माण और राज्य लामबंदी की प्रतिस्पर्धा कहना अधिक सही होगा।
जहां तक भारत की बात है तो उसको किसी एक AI ब्लॉक पर पूरी तरह निर्भर होने के बजाय अमेरिका, चीन, यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया और अन्य साझेदारों के साथ तकनीकी साझेदारी बढ़ानी चाहिए, साथ ही अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए। वहीं, AI को रोजगार-विरोधी नहीं, उत्पादकता क्रांति की मिशाल के तौर पर विकसित करना चाहिए। यह ठीक है कि AI से कुछ नौकरियाँ खत्म होंगी, लेकिन नई नौकरियाँ भी बनेंगी। इसलिए स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय और कार्यबल समूह तक एआई साक्षरता और पुनः कौशल विकास या नया कौशल सीखना को बड़े स्तर पर लागू करना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह किन भारत को केवल “AI का उपभोक्ता” बनने के बजाय “AI का निर्माता और निर्यातक” बनना होगा। इसे एक रणनीतिक सूत्र में ऐसे समझिए:
भारत चिप, कंप्यूट, डेटा, प्रतिभा, स्वदेशी मॉडल, स्टार्टअप, सुरक्षित रेगुलेशन और वैश्विक सहयोग को बढ़ाकर AI महाशक्ति बनने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है।
ऐसा इसलिए कि भारत की विशेष ताकत उसके पास विशाल डिजिटल बाजार, यूपीआई जैसी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, युवा तकनीकी प्रतिभा और दुनिया का बड़ा बहुभाषी उपभोक्ता आधार है। यदि इन ताकतों को कंप्यूट और गहन तकनीकी अनुसंधान के साथ जोड़ा जाए, तो भारत अमेरिका-चीन की सीधी नकल किए बिना अपना अलग AI मॉडल खड़ा कर सकता है।
इस प्रकार भारत तीसरा AI शक्ति-केंद्र बन सकता है बशर्ते कि वह केवल AI का बड़ा बाजार नहीं, बल्कि AI की पूरी वैल्यू चैन का महत्वपूर्ण निर्माता बन जाए। इसके लिए भारत को अमेरिका और चीन से अलग रास्ता अपनाना होगा, क्योंकि भारत की ताकत कम लागत, विशाल बहुभाषी बाजार, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और इंजीनियरिंग प्रतिभा है।
जहां तक भारत की सबसे बड़ी संभावित ताकत की बात है तो अंतर्राष्ट्रीय तकनीकी विशेषज्ञ भी मानते हैं कि।अमेरिका के पास नवोन्मेष और पूंजी है, चीन के पास स्केल और विनिर्माण है, जानकी भारत अपनी प्रतिभा, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, बहुभाषी आंकड़ा, न्यूनतम लागत वाला नवोन्मेष और बृहत बाजार को जोड़कर अपना मॉडल बना सकता है।
इसलिए भारत, अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक संतुलन साधते हुए खुद को किसी एक कैंप का तकनीकी उपग्रह नहीं बनना चाहिए, बल्कि अमेरिका से एडवांस चिप्स/अनुसंधान, जापान-कॉरिया से सेमी कंडक्टर सहयोग, यूरोप से जिम्मेदार एआई मानक और अन्य देशों से डेटासेट्स/मार्केट्स के मद्देनजर सबके साथ साझेदारी करनी चाहिए।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक