Gyan Ganga: विशाल सागर के तट पर पहुँचते ही वानर सेना क्या करने लगी थी?

By सुखी भारती | Sep 13, 2022

जैसा कि हमने पहले भी यह चर्चा की है, कि भगवान श्रीराम जी लंका नगरी की ओर, प्रस्थान करने का कदम तब उठाते हैं, जब उन्हें लगता है, कि अब समस्त वानर श्रीसीता जी से भेंट व एकाकार होने हेतु, उतने ही व्यग्र हैं, जितना कि वे स्वयं हैं। वानरराज सुग्रीव ने तत्काल ही समस्त वानरों, रीछ, भालुओं व अन्य बलवान योद्धाओं की सेनाओं के समूहों को एकत्र किया। सारे ही योद्धा एक से बढ़कर एक हैं। उनका उत्साह व बल देखेते ही बनता है। सभी एक स्थान पर एकत्रित हो गए। सभी अपने जीवन की इस महान यात्र पर निकलने को आतुर थे। ऐसा नहीं कि वानरराज सुग्रीव ने बस आदेश सा दिया और सभी वानर भालु चल पड़े। वास्तव में सभी लोग भगवान श्रीराम जी के आदेश व आर्शीवाद की प्रतीक्षा कर रहे थे। भगवान श्रीराम जी भी इस विशाल समूह के समक्ष आन पहुँचे।

इसे भी पढ़ें: Gyan Ganga: मंदिर प्रांगण में आकर भी प्रभु से माया ही क्यों मांगते हैं भक्त?

‘प्रभु पंकज नावहिं सीसा।

गर्जहिं भालु महाबल कीसा।।

देखी राम सकल कपि सेना।

चितइ कृपा करि राजिव नैना।।’

अब देखिए, श्रीराम जी की पावन दृष्टि समस्त वीरों पर क्या पड़ी, सब में एक से एक कलायें जन्म लेने लगी। आज से पूर्व तो केवल श्रीहनुमान जी ही आकाश मार्ग में उड़े थे, लेकिन आज एक नहीं, अपितु अनेकों वानर आकाश मार्ग के अनुगामी हो गए। जो वानर अथवा रीछ आकाश मार्ग से नहीं गए, वे पृथ्वी मार्ग का अनुगमन करते हैं। उनके शस्त्र के तो कहने ही क्या थे। उनके हाथों में बड़े-बड़े शिला खण्ड व वृक्ष ही उनके शस्त्र थे। उनके नखों रूपी शस्त्र से तो काल भी घबराता होगा-

‘नख आयुध गिरि पादपधारी।

चले गगन महि इच्छाचारी।।

केहरिनाद भालु कपि करहीं।

डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।’

वानर व भालु इतने उत्साहित हैं, कि उनकी चिंघाड़ों की गर्जना से, वनों के हाथियों के दिल भी पतले हो उठे हैं। वे दसों दिशायों से चिंघाड़े जा रहे हैं।

इसे भी पढ़ें: Gyan Ganga: भगवान श्रीराम के मुख से अपनी भरपूर प्रशंसा सुनकर हनुमानजी क्या सोच रहे थे?

इतना ही नहीं, इस महान इतिहासिक घटना में, एक ओर सुंदर घटना घट रही थी। वह यह कि श्रीराम जी सेना सहित जैसे ही सागर की ओर कूच करते हैं, चारों और शुभ शगुन होने लगते हैं। श्रीसीता जी के बाएँ अंग फड़कने लगते हैं। हालाँकि आज के युग में कुछ तथाकथित आधुनिक सोच के लोग शगुन-अपशगुन को नहीं मानते। लेकिन वास्तव में इसमें किसी भी प्रकार की अविज्ञानिक्ता अथवा अँधविश्वास नहीं है। अपितु यह तो एक स्वभाविक से प्राकृतिक लक्षण हैं। जैसे बारिश होने से पहले बादलों की गर्जना व काले मेघों के समूह हो जाना स्वाभाविक है। वैसे ही जब श्रीहरि किसी महाअभियान पर निकलते हैं, तो शगुन होना उनकी लीला की एक मर्यादा भर है-

‘जासु सकल मंगलमय कीती

तासु पयान सगुन यह नीती।

प्रभु पयान जाना बैदेहीं।

फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।’

चारों ओर जय-जयकार है। सेना के चलने से रास्ते में बिछी संपूर्ण घास ने भी, स्वयं को प्रभु के श्रीचरणों में न्यौछावर कर दिया। और इस प्रकार से श्रीराम जी, संपूर्ण सेना सहित सागर के तट पर जा उतरे। अनेकों रीछ वानर यहाँ तहाँ फल खाने लगे।

लंका प्रवेश से पहले, इतने विशाल सागर को पार करना एक बड़ी चुनौती थी। श्रीराम जी सागर पार करने के लिए, कौन से उपाय अपनाते हैं, जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।

-सुखी भारती

प्रमुख खबरें

Iran में Khamenei के लिए मातम, USA-Israel को चेतावनी- जरा सी गलती पर होगा बड़ा हमला

Nothing Phone 4a खरीदने वालों को बड़ा झटका, New Launch से पहले तीसरी बार बढ़े दाम

Pro League में Team India का खराब प्रदर्शन, दिग्गज PR Sreejesh ने कोच Craig Fulton से पूछे चुभते सवाल।

FIFA World Cup 2026: Airport Security पर शांत खड़े रहे Lionel Messi, वायरल वीडियो ने मचाई धूम